सुभाष चंद्रा को करोड़ों की राहत कैसे मिली? कॉरपोरेट कर्ज और बैंकिंग का पूरा खेल #harkara

सुभाष चंद्रा से जुड़े कर्ज और इनसॉल्वेंसी मामले ने भारत की कॉरपोरेट गवर्नेंस और बैंकिंग व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं. करीब 226.57 करोड़ रुपये के दावों के मुकाबले लगभग 6.5 करोड़ रुपये में मामला निपटाने की प्रक्रिया से "हेयरकट" को लेकर बहस तेज हुई है. हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने आर्थिक मामलों के पत्रकार राकेश कायस्थ के साथ विस्तार से समझा कि हेयरकट क्या होता है, एनसीएलटी और आईबीसी की प्रक्रिया कैसे काम करती है और बड़े कॉरपोरेट कर्ज के मामलों में आखिर कितना पैसा वसूल हो पाता है. बातचीत में पिछले एक दशक में करीब 16 से 17 लाख करोड़ रुपये की रिकवर न हो सकने वाली रकम, वीडियोकॉन जैसे बड़े कॉरपोरेट मामलों, विजय माल्या, किसानों की कर्जमाफी और आम आदमी बनाम बड़े कॉरपोरेट्स के लिए कर्ज की अलग-अलग लागत पर भी चर्चा हुई. क्या कॉरपोरेट कर्ज के मामलों में आम लोगों और बड़े उद्योगपतियों के लिए अलग-अलग मापदंड लागू होते हैं? बैंकों में जमा आम लोगों के पैसे पर बड़े कॉरपोरेट डिफॉल्ट का क्या असर पड़ता है? और क्या सरकार इस पूरे सिस्टम में जवाबदेही सुनिश्चित कर पा रही है? देखिए पूरी बातचीत और समझिए भारत की कॉरपोरेट कर्ज व्यवस्था के पीछे का पूरा गणित. #HarkaraDeepDive #RakeshKayastha #NidheeshTyagi #SubhashChandra #CorporateDebt #NCLT #IBC #Banking #CorporateGovernance #IndianEconomy

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