क्या भारत में हर नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करनी होगी? श्रवण गर्ग #harkara

हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने उस बहस को केंद्र में रखा, जो पासपोर्ट को लेकर विदेश मंत्रालय के एक बयान के बाद देशभर में शुरू हुई. चर्चा की शुरुआत पासपोर्ट से होती है, लेकिन जल्द ही यह नागरिकता, सरकारी नीतियों और नागरिकों के अधिकारों पर व्यापक सवालों तक पहुंच जाती है. श्रवण गर्ग का कहना है कि असली मुद्दा पासपोर्ट नहीं, बल्कि वह माहौल है जिसमें आम लोगों के मन में यह डर पैदा किया जा रहा है कि उन्हें कभी भी अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ सकती है. चर्चा में बिहार की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहा गया कि जब बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाने या सत्यापन की बातें होती हैं, तो लोगों के मन में यह आशंका पैदा होना स्वाभाविक है कि कहीं भविष्य में नागरिकता भी दस्तावेजों के आधार पर न तय की जाने लगे. श्रवण गर्ग ने सवाल उठाया कि यदि पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी और पैन कार्ड जैसे दस्तावेज नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हैं, तो फिर करोड़ों भारतीय अपनी नागरिकता किस आधार पर सिद्ध करेंगे, खासकर वे लोग जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र या अन्य औपचारिक दस्तावेज कभी बने ही नहीं. बातचीत में यह भी कहा गया कि देश के दूर-दराज के गांवों, आदिवासी समुदायों और हाशिए पर रहने वाले करोड़ों लोगों के पास आज भी ऐसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं जिनकी मांग भविष्य में की जा सकती है. ऐसे में यदि नागरिकता का प्रश्न दस्तावेजों से जुड़ता है तो सबसे अधिक प्रभावित वही वर्ग होगा जो पहले से सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर है. इसी संदर्भ में यह सवाल भी उठाया गया कि जब सरकार करोड़ों लोगों को राशन, आवास, पेंशन और अन्य योजनाओं का लाभ देती है, तो क्या यह मानकर नहीं दिया जाता कि वे इसी देश के नागरिक हैं. श्रवण गर्ग ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में नागरिक और सरकार के बीच विश्वास सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है. यदि नागरिकों को लगातार संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा और हर नए विवाद के साथ उनकी पहचान पर सवाल खड़े होंगे, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर हो सकता है. उन्होंने यह आशंका भी व्यक्त की कि अलग-अलग सरकारी विभागों द्वारा अलग-अलग दस्तावेजों और नियमों की मांग भविष्य में और अधिक भ्रम पैदा कर सकती है.

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