उमर खालिद के 6 साल: क्या यह भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा है? | प्रो. अपूर्वानंद #harkara
हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी एवं अपूर्वानंद के साथ उमर खालिद की जेल में बीत रहे छह वर्षों और उससे जुड़े लोकतांत्रिक, न्यायिक और सामाजिक सवालों पर विस्तार से बातचीत हुई. 13 सितंबर 2026 को उमर खालिद को जेल में छह साल पूरे हो जाएंगे. अभी तक उनके खिलाफ आरोप तय नहीं हुए हैं और मुकदमे की सुनवाई भी शुरू नहीं हुई है. ऐसे में सवाल सिर्फ उमर खालिद की गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, न्याय व्यवस्था और असहमति की जगह का भी है. बातचीत में 2016 के जेएनयू प्रकरण से लेकर 2019 के नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन और 2020 की दिल्ली हिंसा तक उमर खालिद की राजनीतिक यात्रा को समझने की कोशिश की गई. अपूर्वानंद बताते हैं कि किस तरह एक छात्र और शोधार्थी को धीरे-धीरे एक राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया गया. जेएनयू की छात्र राजनीति, उमर खालिद और कन्हैया कुमार के बीच अंतर, मीडिया नैरेटिव, विश्वविद्यालयों के प्रति बदलता रवैया और मुस्लिम पहचान को लेकर पैदा हुए सवालों पर भी चर्चा हुई. दिल्ली हिंसा मामले में उमर खालिद पर लगाए गए आरोपों, अमरावती के भाषण और अदालत में पेश किए गए तर्कों को लेकर भी बातचीत हुई. साथ ही यह सवाल उठाया गया कि हिंसा के लिए खुले तौर पर बयान देने वाले नेताओं और उमर खालिद जैसे आरोपित लोगों के मामलों में पुलिस तथा न्यायपालिका का रवैया अलग क्यों दिखाई देता है. अंत में चर्चा इस सवाल पर पहुंचती है कि जेल में बीते छह साल एक व्यक्ति के जीवन, उसकी शिक्षा, शोध और भविष्य से कितने महत्वपूर्ण वर्ष छीन लेते हैं. अपूर्वानंद के शब्दों में, “उमर खालिद एक ऐसा पैमाना है, जिस पर आप हिंदुस्तान के कद को नाप सकते हैं.” पूरी बातचीत देखिए और इस महत्वपूर्ण बहस को अपने हमख्याल लोगों के साथ साझा कीजिए. अब लोग मुझे मेरे नहीं, उमर के पिता के तौर पर जानते हैं Dr. SQR Ilyas | Umar Khalid https://youtu.be/oGvsW8TPrL8 https://indianexpress.com/article/opinion/columns/umar-khalid-my-son/

