आरएसएस की वैश्विक छवि, इज़राइल और हिंदुत्व राजनीति | प्रो. अपूर्वानंद #harkara
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और प्रोफेसर अपूर्वानंद ने आरएसएस की वैश्विक छवि निर्माण की कोशिशों, हिंदुत्व राजनीति, इज़राइल के साथ भारत के रिश्तों और भारत की बदलती विदेश नीति पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से होती है कि आखिर क्यों आरएसएस दुनिया भर में जाकर यह कह रहा है कि भारत में मुसलमानों के साथ कोई भेदभाव नहीं हो रहा, जबकि देश के भीतर कई भाजपा नेता खुले तौर पर मुसलमान विरोधी बयान दे रहे हैं. प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि आरएसएस अपना “शताब्दी वर्ष अभियान” चला रहा है, जिसके तहत भारत और विदेशों में अपनी छवि सुधारने की कोशिश की जा रही है. उनके अनुसार अमेरिका और यूरोप में बढ़ते हिंदू प्रवासी समुदाय को संघ आर्थिक और वैचारिक समर्थन के बड़े स्रोत के रूप में देखता है. उन्होंने कहा कि कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के कमजोर होने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ माहौल बनने की बात कही गई है, जिससे संघ अपनी छवि को लेकर चिंतित है. बातचीत में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और बंगाल भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी के बयानों का उल्लेख करते हुए अपूर्वानंद ने कहा कि भाजपा और आरएसएस की राजनीति में मुसलमान विरोध एक स्थायी तत्व बन चुका है. उन्होंने आरएसएस पर “दोहरी भाषा” बोलने का आरोप लगाया और कहा कि संगठन एक तरफ समानता की बात करता है, दूसरी तरफ नफरत की राजनीति को बढ़ावा देता है. इंटरव्यू में इज़राइल और हिंदुत्व राजनीति के वैचारिक संबंधों पर भी चर्चा हुई. अपूर्वानंद ने कहा कि आरएसएस की शुरुआती प्रेरणा यूरोपीय फासीवाद और मुसोलनी जैसे नेताओं से जुड़ी रही है. उनके अनुसार हिंदुत्व और जियोनिज्म दोनों में “बहुसंख्यक श्रेष्ठता” और “पवित्र भूमि” की राजनीति समान रूप से दिखाई देती है. नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतिन्याहु के रिश्तों पर टिप्पणी करते हुए बातचीत में कहा गया कि आज भारत की विदेश नीति पहले जैसी नैतिक स्थिति में नहीं दिखती. अपूर्वानंद ने कहा कि कभी भारत फिलिस्तीन, दक्षिण अफ्रीका और वियतनाम जैसे संघर्षों में उत्पीड़ित समाजों की आवाज माना जाता था, लेकिन अब वह ताकतवर देशों के साथ खड़ा दिखाई देता है. बातचीत के अंत में हिंदू प्रवासी समुदाय से अपील की गई कि वे यह सोचें कि जिन देशों में वे बराबरी और लोकतांत्रिक अधिकारों का लाभ उठा रहे हैं, क्या वही अधिकार भारत में मुसलमानों और अल्पसंख्यकों को मिल रहे हैं. इंटरव्यू का समापन इस बात के साथ हुआ कि लोगों को नफरत और हिंसा की राजनीति पर सवाल पूछने चाहिए और चुप्पी को समर्थन में नहीं बदलने देना चाहिए.

