मोदी के राज में 1 लाख सरकारी स्कूल बंद हो गए, बच्चों के नामांकन में 2.26 करोड़ की आई गिरावट

बातें चाहे जितनी बड़ी-बड़ी की जाएं, मगर नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2014 से 2024 के बीच (मोदी सरकार के दस वर्ष) देश में लगभग एक लाख सरकारी स्कूल बंद हो गए, जिसने इस दशक के दौरान बच्चों के नामांकन में 2.26 करोड़ की गिरावट आने में एक बड़ी भूमिका निभाई है.

बसंत कुमार मोहंती के अनुसार, पिछले हफ्ते जारी की गई इस रिपोर्ट — 'स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया: टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एन्हांसमेंट' — में पाया गया कि जहाँ 2014-15 में स्कूलों में 26.95 करोड़ बच्चों का नामांकन था, वहीं 2024-25 में यह संख्या घटकर 24.69 करोड़ रह गई. इस अवधि के दौरान, सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख हो गई, जबकि सरकारी सहायता प्राप्त (गवर्नमेंट-ऐडेड) स्कूलों की संख्या 83,000 से घटकर 79,000 पर आ गई. हालांकि, इसी दशक में निजी (प्राइवेट) स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख हो गई.

रिपोर्ट में कहा गया, "पिछले दशक के अधिकांश समय में कुल स्कूली नामांकन लगभग 26 करोड़ पर स्थिर रहा, लेकिन 2024-25 तक यह घटकर 24.69 करोड़ हो गया. यह गिरावट आंशिक रूप से जनसांख्यिकीय बदलावों (डेमोग्राफिक शिफ्ट्स), विशेष रूप से गिरती प्रजनन दर (फर्टिलिटी रेट) के कारण स्कूल जाने की उम्र वाले बच्चों की आबादी कम होने की वजह से है. इसके साथ ही स्कूलों के विलीनीकरण (स्कूल कंसॉलिडेशन) और उच्च शिक्षा के स्तर पर बच्चों को स्कूल में बनाए रखने (रिटेंशन) की चुनौतियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार हैं." 'स्कूल कंसॉलिडेशन' का मतलब है कि छात्रों की संख्या कम होने की स्थिति में आस-पास के स्कूलों का आपस में विलय कर देना. केंद्र और नीति आयोग राज्यों से संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए कम नामांकन वाले स्कूलों का विलय करने को कहते रहे हैं.

शिक्षा कार्यकर्ता और 'राइट टू एजुकेशन फोरम' के समन्वयक मित्र रंजन ने कहा कि इस तरह के विलय के कारण स्कूलों की संख्या में कमी आई है.

रंजन ने कहा, "समेकन या कंसॉलिडेशन के नाम पर स्कूलों का विलय ही बच्चों के नामांकन में भारी गिरावट का मुख्य कारण है. आस-पास के स्कूल बंद होने के बाद कई बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं (ड्रॉपआउट हो जाते हैं). इससे नामांकन में गिरावट आती है."

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, ड्रॉपआउट दर सबसे अधिक माध्यमिक स्तर (सेकेंडरी लेवल) यानी कक्षा 9वीं और 10वीं में देखी गई. प्राथमिक स्तर (प्राइमरी लेवल) पर, 2014-2024 के दशक में ड्रॉपआउट दर केवल 0.3 प्रतिशत थी, जो शुरुआती वर्षों में बच्चों के स्कूल में बने रहने की मजबूत स्थिति को दर्शाती है. उच्च प्राथमिक चरण (अपर प्राइमरी स्टेज) में यह आंकड़ा बढ़कर 3.5 प्रतिशत हो गया. रिपोर्ट में पाया गया कि माध्यमिक स्तर पर यह समस्या और अधिक गंभीर हो गई, जहाँ ड्रॉपआउट दर 11.5 प्रतिशत जितनी उच्च थी.

परिवर्तन दर— जो कि छात्रों के सिस्टम में बने रहने और अगली कक्षा में प्रमोट होने का एक संयोजन है — उच्च प्राथमिक से माध्यमिक स्तर पर वर्ष 2014-15 के 91.58 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 86.6 प्रतिशत रह गई. परिवर्तन दर पुडुचेरी और केरल में सबसे अधिक 99.6 प्रतिशत थी. यह दर मेघालय (65 प्रतिशत), बिहार (66.7 प्रतिशत), मिजोरम (77.8 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (77.8 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश (78.1 प्रतिशत), झारखंड (81.3 प्रतिशत), अरुणाचल प्रदेश (83.3 प्रतिशत) और नागालैंड (83.8 प्रतिशत) में तुलनात्मक रूप से कम थी.

रंजन ने बताया कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में मिलाकर लगभग 40,000 स्कूलों का विलय देखा गया है.

उन्होंने कहा, "स्कूलों का विलय स्कूली शिक्षा को सार्वभौमिक (यूनिवर्सलाइजेशन) बनाने के उद्देश्य को विफल करता है. भारत सरकार ने सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के तहत 2030 तक स्कूली शिक्षा का सार्वभौमिकरण हासिल करने की प्रतिबद्धता जताई है. स्कूलों के विलय की इस नीति के साथ भारत इस एसडीजी लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकता."

नीति आयोग की रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि बच्चों को माध्यमिक स्तर पर पढ़ाई के साथ तालमेल बिठाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था. उदाहरण के लिए, गणित में कक्षा 9वीं के छात्र न केवल बीजगणित (अलजेब्रा), ज्यामिति (ज्योमेट्री) और प्रमेयों (थ्योरम्स) जैसे एडवांस विषयों के साथ संघर्ष कर रहे थे, बल्कि दैनिक जीवन में काम आने वाले गणितीय अनुप्रयोगों जैसे प्रतिशत (परसेंटेज), भिन्न (फ्रैक्शंस) और अनुपात-आधारित तर्क (रेशियो-बेस्ड रीजनिंग) में भी उन्हें कठिनाई हो रही थी.

रिपोर्ट में कहा गया, "यह दर्शाता है कि जैसे-जैसे छात्र शिक्षा प्रणाली में आगे बढ़ते हैं, उनकी शुरुआती सीखने की कमियों (अर्ली लर्निंग डेफिसिट्स) को ठीक से दूर नहीं किया गया है."

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