केरल के सतीशन: पार्टी के बजाय खुद के पीछे बड़ा वोट बैंक खड़ा किया, अब कांग्रेस उन पर निर्भर
वी.डी. सतीशन केरल के निर्विवाद नेता के रूप में उभरे हैं. उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अब वह कांग्रेस पर निर्भर नहीं हैं; बल्कि कांग्रेस उन पर निर्भर है. तात्कालिक रूप से, इसका मतलब यह होगा कि कांग्रेस के विधायकों और मंत्रियों का प्रभाव या महत्व बहुत कम रह जाएगा. मध्यम अवधि में, केरल की जन-राजनीति पर उनका यह एकल नेतृत्व किस तरह का रुख लेगा, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा.
‘द हिंदू’ में वर्गीस के. जॉर्ज लिखते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए हुए सड़क प्रदर्शनों से यह संकेत मिला कि कांग्रेस आलाकमान केरल में अपनी राजनीतिक साख के लिए सतीशन की लोकप्रियता पर निर्भर है. निश्चित रूप से, नवागत मुख्यमंत्री पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा की कसम खाते रहेंगे, लेकिन हर कोई जानता है कि असली कमान किसके हाथ में है.
उनके बारे में यह एक बात कही जाती है कि वह मलयाली जनता के नेता हैं; लेकिन इसका थोड़ा विश्लेषण करने पर इसमें शामिल सामुदायिक समीकरण सामने आते हैं. अन्य कारणों के अलावा, ईसाई और मुस्लिम समुदायों के बीच तथा प्रत्येक समुदाय के भीतर पैदा हुए मतभेदों के कारण कांग्रेस को 2021 के विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा था. दोनों समुदायों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस और यूडीएफ से दूर चला गया था, जिसने पिनाराई विजयन को राज्य में लगातार दूसरी बार ऐतिहासिक जीत दर्ज करने में मदद की थी. विजयन की राजनीति ने इस सामाजिक समीकरण को और बढ़ावा दिया. वामपंथी नेता (विजयन), जो निस्संदेह धर्मनिरपेक्ष हैं, उन्होंने इस चुनाव में हिंदू भावनाओं को साधा, यहाँ तक कि सबरीमाला अयप्पा भक्तों के एक राज्य-प्रायोजित समागम की अध्यक्षता भी की. दूसरी ओर, सतीशन— जिन्हें 2021 में यूडीएफ की हार के बाद विधानसभा में विपक्ष का नेता नियुक्त किया गया था — ने अल्पसंख्यकों को वापस कांग्रेस और यूडीएफ के पाले में ला खड़ा किया, और वह भी बेहद शानदार तरीके से.
सतीशन अब केरल के मुसलमानों और ईसाइयों के निर्विवाद नेता हैं, जो मिलकर राज्य की आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं. पिछले पांच वर्षों में, उनके सोच-समझकर तय किए गए राजनीतिक रुख को — जिसे वे स्पष्टता और प्रभाव के साथ पुरजोर तरीके से व्यक्त कर सकते हैं — एक बेहतरीन 'रील फैक्ट्री' (सोशल मीडिया) द्वारा हवा दी गई. इसने केरल के सामूहिक मानस को उस पैमाने पर प्रभावित किया, जो राज्य के इतिहास में आज तक कोई नहीं कर पाया है. जब उन्होंने 2021 में विपक्ष के नेता के रूप में कमान संभाली, तो अधिकांश विश्लेषक आशंकित थे. के. सी. वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला, तथा उनसे पहले के नेताओं जैसे के. करुणाकरन, ए. के. एंटनी और ओमन चांडी, जिनका नेटवर्क पूरे राज्य में फैला हुआ था, के विपरीत सतीशन का प्रभाव केवल एर्नाकुलम जिले तक ही सीमित था. उन्होंने सोशल मीडिया के जादू के जरिए इस कमी को दूर कर लिया. आज भी राज्य में पार्टी नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध सीमित हैं, लेकिन उन्होंने आम जनता के साथ ऐसा रिश्ता बनाया है जो अब विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों को नए भावी मुख्यमंत्री के पीछे खड़े होने के लिए मजबूर कर रहा है.
सतीशन ने अपने विधायी कार्यों में लगन और नीतियों की समझ के लिए एक साख स्थापित की है. लेकिन, यह उनकी लोकप्रियता का निर्णायक कारक नहीं है. उनकी लोकप्रियता के केंद्र में जनता की यह धारणा है कि वे धर्मनिरपेक्षता के एक कट्टर समर्थक हैं. यह छवि काफी हद तक राज्य के दो जातिगत नेताओं — एझावा समुदाय के संगठन एसएनडीपी के वेल्लापल्ली नटेशन, और नायर समुदाय के संगठन एनएसएस के महासचिव सुकुमारन नायर — के साथ उनके लगातार होने वाले खुले विवादों से बनी है. उन्होंने उनके साथ अपने टकराव को हिंदू सांप्रदायिकता के खिलाफ एक निरंतर लड़ाई के रूप में पेश किया, जिसने उन्हें ईसाइयों और मुसलमानों का चहेता बना दिया.
हालाँकि इन दोनों का सामना करना राजनीतिक रूप से फायदेमंद सौदा है, लेकिन खुद नायर होने के बावजूद सतीशन अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता को लेकर उतने मुखर नहीं हैं, जिसकी केरल में कोई कमी नहीं है. वे अक्सर ऐसे ईसाई पादरियों के साथ नजर आते हैं जिनका संदेश शायद ही कभी समावेशी होता है, और उन्होंने जमात-ए-इस्लामी के प्रति भी नरम रुख अपनाया — उन्होंने यूडीएफ के लिए इस संगठन के चुनावी समर्थन का सार्वजनिक रूप से यह तर्क देकर बचाव किया कि यह अब एक धार्मिक राज्य की वकालत नहीं करता और इसका समर्थन "पूरी तरह से राजनीतिक" था. वे आसानी से बाइबिल वचन और पैगंबर मोहम्मद के जीवन के प्रसंग सुना सकते हैं. इस सफर के हर कदम पर, उन्होंने यह साबित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा कि उनका रुख कांग्रेस की तुलना में अधिक शुद्ध था, और खुद को पार्टी से ऊपर एक नैतिक पायदान पर रखा. मौजूदा दौर के सभी सर्वोच्च नेताओं की तरह, उनकी अधिकांश बातचीत खुद के संदर्भों से शुरू और खत्म होती है, और कभी-कभी वे तीसरे पुरुष (थर्ड पर्सन) में खुद का जिक्र करते हैं. कुल मिलाकर, उन्होंने पार्टी के बजाय व्यक्तिगत रूप से अपने पीछे एक बड़ा वोट बैंक मजबूती से खड़ा कर लिया है — और भविष्य ही बताएगा कि यह समीकरण क्या मोड़ लेता है.
अब केवल कांग्रेस ही पार्टी से बड़े नेता होने के अच्छे और बुरे नतीजों को नहीं भुगत रही है, बल्कि उसकी प्रमुख सहयोगी पार्टी, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) भी इससे प्रभावित है. आईयूएमएल ने कांग्रेस पर सतीशन को चुनने के लिए दबाव इसलिए नहीं बनाया कि उसके नेता उन्हें पसंद करते थे, बल्कि इसलिए बनाया क्योंकि उसके कार्यकर्ता उनके पीछे लामबंद हो गए थे. यह रिपोर्टिंग कि आईयूएमएल ने सतीशन के लिए हस्तक्षेप किया, कहानी का केवल एक हिस्सा है; दूसरा हिस्सा यह है कि अपने ही अनुयायियों के राजनीतिक रुख पर आईयूएमएल की पकड़ कमजोर हो रही है. आईयूएमएल के लिए इसके मायने यह हैं कि केरल का सबसे लोकप्रिय मुस्लिम नेता पार्टी से बाहर का है. ऐसा प्रतीत होता है — कम से कम अभी के लिए — कि सतीशन ने आईयूएमएल को दरकिनार करते हुए राज्य के मुस्लिम जनमानस के साथ सीधा संपर्क स्थापित कर लिया है. आम जनता के साथ भी उनका जुड़ाव जरूरी नहीं कि कांग्रेस के माध्यम से हो. यह उन्हें केरल की राजनीति में एक अभूतपूर्व और अनूठा उदाहरण बनाता है — सोशल मीडिया और रील पॉलिटिक्स की पूरी क्षमता का दोहन करने वाले वे पहले व्यक्ति हैं. अभी तो सिर्फ ट्रेलर रिलीज हुआ है; पिक्चर अभी बाकी है.

