भंवर मेघवंशी | इस सकल हिंदू समाज को अकल कब आयेगी ?

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील के  बराना गांव में विगत आठ माह से जारी श्री खाकुल देव जी मंदिर का विवाद सिर्फ एक मंदिर का विवाद मात्र नहीं है.यह उस गहरे सामाजिक यथार्थ का आईना है,जिसे हिंदू एकता,सामाजिक समरसता और सकल हिंदू समाज जैसे आकर्षक नारों के पीछे लगातार छिपाया जाता रहा है.

बराना गांव के श्री खाकल देव जी मंदिर के दलित पुजारी विष्णु कुमार बलाई द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत को लिखा गया पत्र भारतीय समाज के उस क्रूर अंतर्विरोध को उजागर करता है,जिसमें दलितों से हिंदू होने की अपेक्षा तो की जाती है,लेकिन उन्हें बराबरी का अधिकार देने से इंकार कर दिया जाता है.

यह कोई सामान्य आरोप नहीं है.यह एक ऐसे दलित पुजारी परिवार की पुकार है,जो लगभग चार सौ वर्षों से एक मंदिर की पूजा-अर्चना करता आया है,जिसके पूर्वजों ने मंदिर की स्थापना की,उसे संरक्षित किया, उसकी परंपरा को जीवित रखा,लेकिन आज वही परिवार अपने ही मंदिर से बेदखल किए जाने के भय में जी रहा है.

पत्र में वर्णित घटनाएँ भयावह हैं.आरोप है कि संघ से जुड़े स्थानीय कार्यकर्ताओं और प्रभावशाली जातियों के लोगों ने पहले मंदिर के वार्षिक मेले का आयोजन स्थल बदलवाया,फिर दलित पुजारी परिवार के खिलाफ माहौल बनाया और अंततः मंदिर परिसर में हमला कर यह घोषणा कर दी कि अब मंदिर का संचालन दलित पुजारी नहीं करेंगे.यह केवल हिंसा नहीं है,यह सामाजिक सत्ता का प्रदर्शन है.

मैं संघ का स्वयंसेवक रह चुका हूँ,मैंने संघ की शाखाओं में एकात्मता,समरसता और हिंदू एकता की बहुत बातें सुनी हैं,लेकिन मैंने यह भी देखा है कि जब वास्तविक सामाजिक बराबरी की बात आती है,तब वही संगठन वर्ण-व्यवस्था और जातिगत वर्चस्व के प्रश्न पर मौन हो जाता है.

दलितों को संघ और हिंदुत्व राजनीति में अक्सर संख्या के रूप में देखा जाता है ,केवल सकल हिंदू समाज की जनसंख्या बढ़ाने के लिए,राजनीतिक समर्थन जुटाने के लिए या मुस्लिम विरोधी उन्माद में सहभागी बनाने के लिए.मगर जैसे ही कोई दलित सम्मान,नेतृत्व, धार्मिक अधिकार या सामाजिक बराबरी की मांग करता है,उसके खिलाफ वही सकल हिंदू समाज उठ खड़ा होता है.बराना मंदिर की घटना इसी राजनीति का सबसे निकृष्ट नग्न उदाहरण है.

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि यह मंदिर सदियों से दलित पुजारी परिवार द्वारा संचालित था,तो अचानक सकल हिंदू समाज को उसकी याद क्यों आई? और यह सकल हिंदू समाज केवल दलित पुजारी के खिलाफ ही क्यों सक्रिय होता है? क्या किसी सवर्ण पुजारी के मंदिर पर कब्जा करने के लिए भी ऐसी पंचायतें बुलाई जाती हैं? क्यों बराना के दर्जनों मंदिरों में से सिर्फ दलित स्वामित्व वाले श्री खाकुल देव जी मंदिर पर ग्रामीण ट्रस्ट बनाने पर उतारू होते हैं,गांव के बाकी मंदिरों पर क्यों नहीं ?

असल में यह संघर्ष केवल मंदिर का नहीं है.यह धार्मिक सत्ता और सामाजिक बराबरी के बीच संघर्ष है.हिंदू धर्म की पारंपरिक व्यवस्था में दलित को मंदिर के भीतर प्रवेश तक का अधिकार नहीं था,पुजारी होना तो बहुत दूर की बात थी.ऐसे में किसी दलित का पुजारी होना स्वयं मनुवादी सामाजिक ढांचे के लिए चुनौती है,इसलिए दलित पुजारी को हटाना केवल प्रशासनिक या धार्मिक फैसला नहीं,बल्कि सामाजिक वर्चस्व की पुनर्स्थापना है.

इस पूरे प्रकरण का एक और खतरनाक पक्ष है कि राज सत्ता और जातीय वर्चस्व का गठजोड़ हो गया है.पत्र में आरोप लगाया गया है कि शिकायतों तथा मुकदमा दर्ज होने और पुलिस जांच में आरोपियों पर आरोप प्रमाणित पाए जाने के बावजूद आरोपियों पर कार्रवाई नहीं हुई.यदि यह सच है तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि संविधान के प्रति असम्मान है.भारत का संविधान समानता की गारंटी देता है,लेकिन जमीन पर आज भी जाति अनेक स्थानों पर संविधान से अधिक शक्तिशाली दिखाई देती है.

आज देश में रामराज्य,हिंदू राष्ट्र और सभ्यतागत पुनर्जागरण की बातें हो रही हैं,लेकिन सवाल है कि उस हिंदू राष्ट्र में दलित की जगह क्या होगी? क्या वह केवल जय श्रीराम बोलने वाला अनुयायी होगा या बराबरी का नागरिक भी माना जाएगा? क्या उसे मंदिर बनाने के लिए चंदा देने का अधिकार होगा लेकिन मंदिर चलाने का नहीं? क्या वह हिंदू समाज का हिस्सा केवल तब तक है,जब तक वह अपनी जातिगत सीमा में रहे?

बराना का यह मंदिर प्रकरण हमें याद दिलाता है कि भारत में जाति केवल सामाजिक पहचान नहीं,बल्कि सत्ता का ढांचा है और जब तक इस ढांचे को चुनौती नहीं दी जाएगी,तब तक सामाजिक समानता केवल एक राजनीतिक नारा बनी रहेगी.

मोहन भागवत अक्सर कहते हैं कि जाति व्यवस्था अब अप्रासंगिक हो चुकी है.यदि ऐसा है तो उन्हें बराना जैसे मामलों पर खुलकर बोलना चाहिए.उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या संघ दलित पुजारियों के अधिकारों के साथ खड़ा है या उन ताकतों के साथ जो उन्हें मंदिरों से बाहर करना चाहती हैं.इस गांव में तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय वर्ष शिक्षित स्वयंसेवक तक दलित पुजारी को मंदिर से हटाने और प्रशासनिक और राजकीय सहयोग से दलितों से मंदिर हड़पने की साजिश में शामिल है.

यह मामला केवल बराना गांव का नहीं है.यह उस भारत का प्रश्न है,जहाँ दलितों से हिंदू बने रहने की अपेक्षा तो की जाती है,लेकिन उन्हें सम्मानपूर्वक हिंदू बने रहने का अधिकार नहीं दिया जाता.दलित समाज को भी यह समझना होगा कि केवल धार्मिक पहचान से सम्मान नहीं मिलता.सम्मान समान अधिकारों, सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान की लड़ाई से मिलता है.

बराना के दलित पुजारी परिवार की लड़ाई दरअसल भारतीय लोकतंत्र और संविधान की लड़ाई है.यह लड़ाई केवल एक मंदिर बचाने की नहीं,बल्कि उस विचार को बचाने की है कि इस देश में कोई भी मनुष्य जन्म के आधार पर छोटा या बड़ा नहीं है.यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जवाबदेही मांगने की भी लड़ाई है,जहां उसका शीर्ष नेतृत्व समरसता का ढोल पीटता है,दलित वंचित तबके को गले लगाने की बात गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाता है,लेकिन उसका स्थानीय कैडर भयंकर जातिवादी और दलित विरोधी बना रह कर दलितों को औकात रखने का काम करता है, बराना मंदिर मामला आरएसएस का टेस्ट है कि उसकी कथनी और करनी में कितना फ़र्क है और वह दलित हितैषी है या दलित विरोधी,वह संविधान को मानता है या उसी मनुवादी सोच से ग्रस्त है जो धार्मिक मामलों में दलितों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करता है.

कितनी गंभीर बात है कि जिन दलितों का आरएसएस के स्थानीय कैडर ने जमकर उपयोग किया,जिनको कारसेवा में ले गए,जिनसे राम मंदिर हेतु रसीद काट कर चंदा लिया,जिनसे अपने पथ संचलन पर पुष्प वर्षा करवा कर गदगद हुए,आज उन्हीं दलितों से उनका पुश्तैनी निजी मंदिर भी हड़प लिया गया है और अब दलित पुजारी परिवार दर दर की ठोकरें खा कर न्याय की गुहार लगा रहा है.जिस पंचायत में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहता,वहां भी सकल हिंदू समाज महापंचायत करके दलितों के खिलाफ गरज रहा है,इस मंदिर प्रकरण में आरएसएस का दलित विरोधी चेहरा तो उजागर किया ही है,यह भी प्रश्न खड़ा कर दिया है कि इस सकल हिंदू समाज को अकल कब आयेगी और कब वह दलितों के विरुद्ध अपना रवैया बदलेगा ?

(भंवर मेघवंशी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उन्होंने अपने फेसबुक पर आरएसएस के स्वयंसेवकों द्वारा राजस्थान के दलित पुजारी से मंदिर छीने जाने और पुजारी द्वारा आरएसएस प्रमुख को लिखे गए पत्र पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.)

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