कई महीनों से मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को राष्ट्रीय सुरक्षा के बड़े अभियान के रूप में पेश किया जा रहा है. दावा किया गया कि अवैध प्रवासियों की पहचान कर उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जाएंगे और उन्हें देश से निर्वासित किया जाएगा. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अक्टूबर 2025 में सरकार की नीति को तीन शब्दों में बताया था—'पहचानो, हटाओ और निर्वासित करो'. दिसंबर 2025 में संसद में भी उन्होंने कहा कि घुसपैठियों को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के चयन को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
लेकिन अब सामने आए आंकड़े सवाल खड़े करते हैं कि आखिर वे घुसपैठिए कहां हैं, जिनके बारे में लगातार चेतावनी दी जा रही थी? 29 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित हिंदुस्तान टाइम्स की पड़ताल के अनुसार, छह राज्यों में लगभग 9.86 करोड़ मतदाताओं की जांच के दौरान करीब 1,600 संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान हुई. राजनीतिक दावों और उपलब्ध आंकड़ों के बीच का अंतर गंभीर पड़ताल की मांग करता है.
10 करोड़ मतदाताओं की जांच, सिर्फ 1,600 संदिग्ध विदेशी नागरिक
आंकड़े उपलब्ध कराने वाले छह राज्यों में कर्नाटक में सबसे अधिक 716 संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान हुई. इनमें से 545 कथित तौर पर बेंगलुरु उत्तर में रहने वाले नेपाली नागरिक थे. केरल में लगभग 500 और गोवा में 419 लोगों की पहचान की गई. वहीं, झारखंड में तीन और मेघालय में दो संदिग्ध विदेशी नागरिक मिले, जबकि मिजोरम में एक भी मामला सामने नहीं आया. इस तरह छह राज्यों में कुल संख्या लगभग 1,640 रही.
हालांकि, ये आंकड़े अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं हैं कि सभी संबंधित लोग अवैध प्रवासी हैं. इसी तरह, मतदाता सूची से किसी नाम को हटाया जाना अपने आप में उस व्यक्ति के विदेशी नागरिक होने का प्रमाण नहीं है.
आंकड़ों का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था ही नहीं
इस पड़ताल का सबसे चिंताजनक पहलू संदिग्ध विदेशी नागरिकों की कम संख्या के साथ-साथ आंकड़ों को व्यवस्थित तरीके से दर्ज न करना है. हिंदुस्तान टाइम्स ने उन 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालयों से संपर्क किया, जहां एसआईआर पूरा हो चुका था या मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित की गई थी. इनमें से 11 ने जवाब दिया, लेकिन केवल छह राज्यों ने संदिग्ध विदेशी नागरिकों की संख्या बताई.
पंजाब, दिल्ली, उत्तराखंड और तेलंगाना ने कहा कि वे ऐसे आंकड़े अलग से नहीं रखते. ओडिशा के अधिकारियों ने संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान की बात स्वीकार की, लेकिन उनकी संख्या दर्ज नहीं की थी.
निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अखबार को बताया कि राज्यों को यह जानकारी अलग से जुटाने के लिए कहा ही नहीं गया था. आयोग के पास भी कोई समेकित या राज्यवार आंकड़ा उपलब्ध नहीं था. ऐसे मामलों को एएसडीडीओ वर्गीकरण की व्यापक 'अन्य' श्रेणी में रखा गया.
जब एसआईआर को घुसपैठियों की पहचान करने का बड़ा अभियान बताया गया, तब संदिग्ध विदेशी नागरिकों का अलग रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई? बिना व्यवस्थित आंकड़ों के इस अभियान की सफलता का आकलन कैसे किया जा सकता है?
13 करोड़ नाम हटने का मतलब 13 करोड़ घुसपैठिए नहीं
एसआईआर के विभिन्न चरणों में देशभर की मतदाता सूचियों से लगभग 13 करोड़ नाम हटाए गए हैं. लेकिन इनमें मृत मतदाता, स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोग, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत मतदाता और निर्धारित प्रक्रिया के तहत सत्यापित नहीं हो सके लोग शामिल हैं.
इन सभी श्रेणियों को विदेशी घुसपैठियों के साथ जोड़ना गलत होगा. किसी मृत व्यक्ति का नाम हटना घुसपैठ का मामला नहीं है. दूसरे शहर में जाने वाला व्यक्ति अपने आप विदेशी नागरिक नहीं हो जाता. दो जगह दर्ज नाम अवैध प्रवास का प्रमाण नहीं है. दस्तावेजों का सत्यापन न हो पाना भी किसी व्यक्ति को घुसपैठिया घोषित करने का आधार नहीं बन सकता.
मतदान का अधिकार पात्र भारतीय नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है. मतदाता सूची से अपात्र नाम हटाना जरूरी है, लेकिन यह प्रक्रिया ठोस प्रमाण, पारदर्शी नियमों और अपनी बात रखने के उचित अवसर पर आधारित होनी चाहिए.
राष्ट्रीय सुरक्षा के दावों पर सवाल
इस बात पर विवाद नहीं है कि भारतीय चुनावों में केवल भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार है. सवाल यह है कि क्या एसआईआर को उसी पारदर्शिता और गंभीरता के साथ लागू किया गया, जिसके दावे उसके समर्थन में किए गए?
यदि घुसपैठ चुनावी लोकतंत्र के लिए इतना बड़ा खतरा थी, तो निर्वाचन आयोग ने सभी राज्यों में संदिग्ध मामलों का रिकॉर्ड रखने की एक समान व्यवस्था क्यों नहीं बनाई? आंकड़ों का अभाव यह साबित नहीं करता कि मतदाता सूचियों में कोई विदेशी नागरिक नहीं था. लेकिन इसके आधार पर बड़े पैमाने पर घुसपैठ के दावों को भी सही नहीं ठहराया जा सकता.
सरकार और निर्वाचन आयोग को देने होंगे जवाब
इन आंकड़ों के बाद गृह मंत्रालय और निर्वाचन आयोग को तीन सवालों के जवाब देने चाहिए. पहला, यदि विदेशी नागरिकों की पहचान एसआईआर का प्रमुख उद्देश्य था, तो राज्यों को ऐसे मामलों का अलग रिकॉर्ड रखने का निर्देश क्यों नहीं दिया गया? दूसरा, सामने आए लगभग 1,600 मामलों में से कितनों की पुष्टि हुई और कितने लोगों के नाम विदेशी नागरिक होने के आधार पर वास्तव में हटाए गए? तीसरा, मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर घुसपैठ के राजनीतिक दावों के समर्थन में स्वतंत्र प्रमाण क्या हैं?
मतदाता सूची का पुनरीक्षण सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है. इससे तय होता है कि कौन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा ले सकेगा. किसी व्यक्ति को प्रशासनिक चूक, अस्पष्ट दस्तावेजी शर्त या रिकॉर्ड में गलती के कारण मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. खासकर प्रवासी मजदूरों और आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों को ऐसी प्रक्रिया में अनावश्यक संदेह का सामना नहीं करना चाहिए.
लगभग 10 करोड़ मतदाताओं की जांच के बाद छह राज्यों में करीब 1,600 संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान हुई. चार राज्यों ने ऐसे आंकड़े रखे ही नहीं, ओडिशा ने संख्या दर्ज नहीं की और निर्वाचन आयोग ने स्वीकार किया कि उसने राज्यों से यह जानकारी अलग से जुटाने को नहीं कहा था. इससे घुसपैठ की आशंका पूरी तरह खारिज नहीं होती, लेकिन व्यापक दावों के लिए ठोस प्रमाण की जरूरत जरूर सामने आती है. लोकतंत्र राजनीतिक नारों और अपुष्ट दावों के आधार पर नहीं चल सकता. उसे तथ्यों, पारदर्शिता और ऐसे निर्वाचन आयोग की जरूरत है, जो हर पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की रक्षा करे.
(मोहम्मद ज़ियाउल्लाह खान का यह लेख काउंटरकरंट्स में प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित सारांश है.)

