“बच्चों को भी नहीं बख्शा”: राउरकेला स्टील प्लांट की रेलवे लाइन का विरोध कर रहे आदिवासियों पर पुलिस की कार्रवाई, 15 वर्षीय लड़की हिरासत में

‘मकतूब मीडिया’ में निकीता जैन की रिपोर्ट के मुताबिक, ओडिशा के बरकानी गांव में राउरकेला स्टील प्लांट की नई दोहरी रेलवे लाइन के विरोध में चल रहे धरने पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने कार्रवाई की. इस दौरान 15 वर्षीय लड़की समेत कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया गया. आदिवासी ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें बिना सहमति और मुआवजे के उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है.

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के राउरकेला में पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने बरकानी गांव में चल रहे धरने पर कार्रवाई करते हुए 15 वर्षीय लड़की समेत कई लोगों को हिरासत में लिया. यह प्रदर्शन राउरकेला स्टील प्लांट (आरएसपी) की ओर से बिछाई जा रही नई दोहरी रेलवे लाइन के विरोध में किया जा रहा है.

राउरकेला के अधिकार क्षेत्र में आने वाले बोंडामुंडा इलाके में आदिवासी समुदाय के लोग लगातार इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं. यह इलाका अपने विस्तृत कृषि क्षेत्रों के लिए जाना जाता है. आरएसपी बोंडामुंडा के व्यस्त रेलवे मार्ग पर दबाव कम करने के लिए बरकानी के रास्ते दूसरी दोहरी रेलवे लाइन बना रहा है. इससे कोईड़ा के खनन क्षेत्रों से कच्चे माल की ढुलाई आसान हो सकेगी.

यह रेलवे लाइन आरएसपी से डुमेरता तक बनाई जाएगी, जहां से बासुआन रेलवे लाइन से सीधा संपर्क स्थापित होगा. दक्षिण पूर्व रेलवे (एसईआर) की इस परियोजना के लिए बरकानी और डुमेरता में जमीन का अधिग्रहण किया जाना है.

भारत के सबसे पुराने इस्पात संयंत्रों में शामिल राउरकेला स्टील प्लांट की स्थापना 1950 और 1960 के दशक में हुई थी. इसके निर्माण के कारण उस समय भी कई गांवों के लोगों को विस्थापित होना पड़ा था. अब निर्माणाधीन रेलवे लाइन से आदिवासी समुदायों की जमीन पर एक बार फिर खतरा मंडरा रहा है. कई परिवार पहले ही अपनी कृषि भूमि खो चुके हैं.

राउरकेला और आसपास के सुंदरगढ़ जिले में मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों की आबादी है. यहां उरांव, किसान, खड़िया, मुंडा और हो प्रमुख जनजातियां हैं. हालांकि, विशेषज्ञों ने 'मकतूब' को बताया है कि लगातार हो रहे खनन और अवैध विस्तार के कारण इन समुदायों की आबादी घट रही है.

'मकतूब' वर्ष 2024 से इस रेलवे परियोजना के खिलाफ चल रहे आंदोलन की जमीनी रिपोर्टिंग कर रहा है. इस आंदोलन के दौरान गांव के एक प्रदर्शनकारी की जेसीबी मशीन से कुचलकर हत्या भी कर दी गई थी.

सोमवार को जब ग्रामीण रेलवे लाइन के निर्माण स्थल पर धरने पर बैठे थे, तब हजारों की संख्या में पुलिसकर्मी इलाके में पहुंचे और प्रदर्शनकारियों को जबरन वहां से हटाने लगे.

आंदोलन में शामिल बरकानी गांव के निवासी पांडू ने 'मकतूब' को बताया कि सुबह करीब सात बजे पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया था.

उन्होंने कहा, “उन्होंने हमें धरना स्थल से जबरन हटाना शुरू कर दिया. उन्होंने बच्चों और महिलाओं तक को नहीं बख्शा, चाहे वे युवा हों या बुजुर्ग. वे हमें गालियां दे रहे थे और किसी दूसरी जगह जाकर प्रदर्शन करने के लिए कह रहे थे. जब स्थिति बिगड़ने लगी तो हमने भी उनका विरोध किया और उनसे कहा कि वे खुद को इस स्थिति का निर्णायक न समझें.”

पांडू के मुताबिक, मौके पर मौजूद बुजुर्ग महिलाओं समेत कई लोगों को घसीटकर गाड़ियों में बैठाया गया और हिरासत में ले लिया गया. उन्होंने बताया कि हिरासत में लिए गए लोगों में नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक लड़की भी थी, जो केवल शोरगुल देखने के लिए अपने घर से बाहर आई थी. पुलिस ने बल प्रयोग शुरू किया तो उसे भी पकड़ लिया गया.

पांडू ने बताया कि रात आठ बजे तक लड़की अपने माता-पिता के साथ पुलिस थाने में हिरासत में थी.

उन्होंने आरोप लगाया, “सरकार हमारी जमीन बर्बाद करने पर आमादा है और चाहती है कि हम चुप रहें. आदिवासी इलाकों में सरकार की कार्रवाई से यह साफ दिखाई देता है. पुलिस भी खुद को कॉरपोरेट कंपनियों के लुटेरों का मध्यस्थ समझने लगी है और भूल गई है कि उसे जनता के लिए काम करना चाहिए.”

आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता और पांचवीं अनुसूची संघ के सदस्य सुनील खलखो ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ पुलिस सख्ती से कार्रवाई कर रही है.

उन्होंने 'मकतूब' से कहा, “बरकानी के लोग लंबे समय से विस्थापन और मुआवजे का मुद्दा उठा रहे हैं. इस्पात संयंत्र और अब रेलवे परियोजना के कारण जिन लोगों को विस्थापित किया गया है, उन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिला है. सरकार जिस जमीन को अपनी बता रही है, उसके मालिकाना हक को लेकर भी विवाद है. ऐसे में आदिवासियों के साथ इस तरह का टकराव किस आधार पर किया जा रहा है?”

ग्रामीणों की सहमति नहीं मिलने के बावजूद आरएसपी ने अक्टूबर की शुरुआत में रेलवे लाइन का निर्माण शुरू करने के लिए मशीनें और कर्मचारी तैनात कर दिए थे. इसके बाद ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया, जिसके चलते निर्माण कार्य रोकना पड़ा.

इस साल अप्रैल से अगस्त के बीच राज्य सरकार और पुलिस के हस्तक्षेप से आरएसपी ने बरकानी और झरबेड़ा में अपने 1,200 एकड़ के विस्तार क्षेत्र पर दोबारा कब्जा हासिल कर लिया था. इस प्रक्रिया में कई परिवारों का पुनर्वास किया गया, लेकिन कुछ अन्य परिवार विस्थापित होने के बावजूद मुआवजे से वंचित रह गए. यह स्थिति आरएसपी के दावों से अलग है.

खलखो ने आरोप लगाया कि आरएसपी ने पूरी प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया. उनके मुताबिक, कानूनी दृष्टि से जमीन अधिग्रहण की कोई निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई हो, ऐसा दिखाई नहीं देता. उन्होंने यह भी कहा कि आरएसपी ने ग्रामीणों से बातचीत करने की कोई पहल नहीं की, जबकि पुलिस को उनके खिलाफ बल प्रयोग करने की छूट दे दी गई है.

पांडू ने बताया कि हाल के दिनों में पुलिस की हिंसक कार्रवाई के कारण स्थिति तनावपूर्ण हो गई है. उन्होंने कहा कि कई लोग अब भी हिरासत में हैं और धरना स्थल से सभी प्रदर्शनकारियों को हटा दिया गया है.

आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने 'मकतूब' को बताया कि लगातार खनन, औद्योगिक विस्तार और जबरन विस्थापन के कारण आदिवासी समुदायों के बिखरने का खतरा है. इससे लोग अपनी पारंपरिक आजीविका छोड़कर मजदूरी करने को मजबूर हो सकते हैं. कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया से उनकी संस्कृति और पहचान भी खतरे में पड़ सकती है.

Previous
Previous

मोहम्मद ज़ियाउल्लाह खान | घुसपैठियों की बड़ी तलाश: 10 करोड़ मतदाताओं की जांच, मिले सिर्फ 1,600 संदिग्ध विदेशी नागरिक

Next
Next

राजेश चतुर्वेदी | चुनावी चंदे के नाम पर करोड़ों का लेनदेन