मतदाता सूची में नाम शामिल करने के खिलाफ 10 में से 4 अपीलें चुनाव आयोग की तरफ से आईं: बंगाल ट्रिब्यूनल जज

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर उठे विवादों के बीच एक गंभीर और चौंकाने वाला प्रशासनिक मामला सामने आया है. मुर्शिदाबाद जिले के 11 विधानसभा क्षेत्रों—55-फरक्का से लेकर 65-नबाग्राम तक—के मतदाताओं के मामलों की सुनवाई अपीलीय ट्रिब्यूनल संख्या 11 में चल रही है. राज्यभर में इस प्रक्रिया से कुल 6,35,983 अपीलें उत्पन्न हुई हैं. ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता कर रहे कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश इंद्रजीत चटर्जी के अनुसार, इनमें से लगभग 2.54 लाख अपीलें (यानी हर 10 में से 4 अपीलें) खुद बंगाल के अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी (अतिरिक्त सीईओ) द्वारा दायर की गई थीं. ये याचिकाएं नाम बहाल कराने के लिए आम नागरिकों द्वारा नहीं, बल्कि पहले से शामिल किए जा चुके मतदाताओं को सूची से हटाने के लिए चुनाव अधिकारियों द्वारा दर्ज की गई थीं.

चुनाव आयोग की भूमिका और आंतरिक अनभिज्ञता

अपर्णा भट्टाचार्य की रिपोर्ट के अनुसार, 16 सितंबर, 2026 को भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने सर्वोच्च न्यायालय को दिए सांख्यिकीय विवरण में बताया कि राज्य में कुल 38,31,429 अपीलें आई हैं. इनमें 22,21,118 याचिकाएं हटाए गए मतदाताओं की थीं और 16,10,311 अपीलें नाम शामिल किए जाने के विरोध में थीं. आयोग ने यह स्पष्ट नहीं किया कि नाम शामिल करने के खिलाफ दर्ज इन अपीलों का मूल स्रोत क्या था.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव आयोग के भीतर भी इस प्रक्रिया पर सवाल उठे. 12 अगस्त को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने राज्य स्तरीय अतिरिक्त सीईओ द्वारा दायर की गई इन अपीलों के अधिकार क्षेत्र (ऑथराइजेशन) पर सवाल उठाया था.उन्होंने खुलासा किया कि इस प्रकार की बड़े पैमाने पर की गई याचिकाओं के बारे में स्वयं उन्हें, साथी चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पूर्व जानकारी नहीं थी.

न्यायमूर्ति चटर्जी ने पुष्टि की कि उनके ट्रिब्यूनल के नोटिसों में भी यही दर्ज था कि 2.54 लाख 'एंटी-इन्क्लूजन' (नाम शामिल करने के खिलाफ) अपीलें आयोग की ओर से आई थीं. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे निष्कासन या पुनर्बहाली का निर्णय अत्यंत सतर्कता से ले रहे हैं, क्योंकि प्रभावित पक्ष ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ उच्च अदालत का रुख कर सकता है.

जनसांख्यिकी प्रभाव और विसंगतियां

पश्चिम बंगाल की कुल 294 सीटों में से ये 11 विधानसभा क्षेत्र (फरक्का, सामसेरगंज, सूती, जंगीपुर, रघुनाथगंज, सागरदीघी, लालगोला, भगवानगोला, रानीनगर, मुर्शिदाबाद और नबाग्राम) मात्र 3.7% हिस्सा हैं, लेकिन राज्य की कुल लंबित चुनावी अपीलों का 17.2% भाग अकेले यहीं से आता है.

न्यायिक प्रक्रिया के तहत इन 11 क्षेत्रों के 9,02,351 मतदाताओं की जांच की गई, जिनमें से 4,00,681 को अयोग्य ठहराया गया. यह 44.4% की अस्वीकृति दर को दर्शाता है. मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद क्षेत्र में 75.8%, सामसेरगंज में 69% और लालगोला में 55.9% मतदाताओं को अयोग्य पाया गया.

आंकड़ों में एक बड़ी विसंगति यह है कि हटाए गए कुल मतदाताओं की तुलना में लंबित अपीलों की संख्या काफी अधिक है. रानीनगर में 17,140 निष्कासनों के बदले 56,323 अपीलें दर्ज हैं (प्रति निष्कासन 3.29 का अनुपात). इससे स्पष्ट होता है कि ये अपीलें केवल नाम कटने से पीड़ित नागरिकों की ओर से नहीं आई हैं.

इन 11 में से 10 क्षेत्र मुस्लिम बहुल हैं. अयोग्य घोषित किए गए कुल मतदाताओं में से 97.6% मुस्लिम थे. 2025 की प्रारंभिक मतदाता सूची और फरवरी 2026 की अंतिम सूची के बीच इन क्षेत्रों में कुल मतदाताओं की संख्या 29.10 लाख से घटकर 23.57 लाख रह गई, यानी 19% की भारी गिरावट आई. सामसेरगंज में तो मुस्लिम मतदाताओं का 39.1% हिस्सा जांच में हट गया.

कार्यभार का संकट और न्यायिक त्यागपत्र

ट्रिब्यूनल के समक्ष मुकदमों का यह पहाड़ व्यावहारिक रूप से असंभव चुनौती बन चुका है. न्यायमूर्ति चटर्जी के अनुसार, एक अपील पर सुनवाई और तर्कसंगत आदेश लिखने में कम से कम 30 मिनट लगते हैं. इस गति से यदि प्रतिदिन 10 मामलों का निपटारा किया जाए, तो 6.35 लाख से अधिक लंबित अपीलों को सुलझाने में लगभग 174 वर्ष लगेंगे.

13 अप्रैल, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि केवल अपील लंबित होने के आधार पर किसी हटाए गए व्यक्ति को मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा. इसके बाद अप्रैल के अंत में हुए मतदान के बाद भारतीय जनता पार्टी राज्य की सत्ता में आई.

अत्यधिक कार्यभार और दैनिक 70 किमी के लंबे सफर को कारण बताते हुए न्यायमूर्ति चटर्जी ने 2 नवंबर से अपने पद से हटने की घोषणा की.  उनसे पहले मई में पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी.एस. शिवगणनम भी अपीलीय ट्रिब्यूनल जज के पद से इस्तीफा दे चुके हैं. चुनाव आयोग ने ट्रिब्यूनलों की संख्या 19 से बढ़ाकर 42 करने और वर्चुअल सुनवाई के लिए सॉफ्टवेयर विकसित करने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन वर्तमान बैकलॉग चुनावी न्याय प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है.

(मूल रिपोर्ट अंग्रेजी में है. यह हिंदी में अनूदित और संपादित अंश है)

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