सत्य सागर | सिर्फ चुनाव ठीक से करवाने से लोकतंत्र की मूल समस्या खत्म नहीं होगी
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं राजनीतिक विश्लेषक और लेखक सत्य सागर ने भारत के लोकतंत्र, चुनावी व्यवस्था, आर्थिक असमानता और सामाजिक ढांचे पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत भारत और केन्या की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की तुलना से हुई. इसके जरिए उन्होंने सवाल उठाया कि क्या केवल चुनाव होने से किसी देश को लोकतांत्रिक माना जा सकता है.
सत्य सागर ने कहा कि लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ चुनाव नहीं है, बल्कि यह तय करना भी है कि कौन शासन करेगा, किस तरह की नीतियां बनेंगी और समाज में उपलब्ध संसाधनों तथा अवसरों का वितरण किस तरह होगा. उनके मुताबिक, ‘वन मैन, वन वोट’ का आधार यह मान्यता है कि सभी मनुष्य समान हैं. लेकिन भारत जैसी सामाजिक संरचना में इस समानता को व्यवहार में लागू करना अब भी एक बड़ी चुनौती है.
उन्होंने भारत और केन्या में लोकतंत्र की चुनौतियों को आर्थिक असमानता से जोड़ते हुए कहा कि राजनीतिक व्यवस्था में चुनावी प्रतिनिधित्व बढ़ने के बावजूद सत्ता और संपत्ति का केंद्रीकरण लोकतंत्र की बुनियादी भावना को कमजोर करता है. उनके अनुसार, राजनीति कई जगहों पर धन संचय का माध्यम बन गई है और चुनावी प्रक्रिया को केवल स्वतंत्र एवं निष्पक्ष बनाने से उन मूल समस्याओं का समाधान नहीं होगा, जो समाज की आर्थिक और सामाजिक असमानता से पैदा होती हैं.
सागर ने चुनावी प्रक्रिया की तुलना आईपीएल मैच से करते हुए कहा कि बहस केवल इस बात पर केंद्रित है कि अंपायर सही फैसला कर रहा है या नहीं, जबकि असली सवाल यह है कि मैदान में दोनों टीमें बराबरी की स्थिति में हैं भी या नहीं. उनके मुताबिक, आम नागरिक के पास वोट देने के अधिकार के अलावा आर्थिक सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी अधिकारों पर प्रभाव डालने की पर्याप्त शक्ति नहीं है.
बातचीत में उन्होंने हिंसा की एक व्यापक अवधारणा भी सामने रखी. उनके अनुसार, हिंसा केवल प्रत्यक्ष शारीरिक हिंसा नहीं होती, बल्कि गरीबी, कुपोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहना भी एक तरह की अदृश्य हिंसा है. इसी संदर्भ में उन्होंने मतदाता सूची से नाम हटने या नागरिक अधिकारों तक पहुंच में बाधा को भी गंभीर लोकतांत्रिक समस्या के रूप में देखा.
सागर ने राजनीति, बड़े कारोबारी समूहों और मीडिया के बीच संबंधों पर भी सवाल उठाए. उनका तर्क था कि आर्थिक शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण के दौर में लोकतंत्र को केवल चुनाव और संस्थाओं के स्तर पर समझना पर्याप्त नहीं है. उन्होंने भारत की स्थिति को वैश्विक आर्थिक असमानता और कॉरपोरेट शक्ति के संदर्भ में देखने की जरूरत बताई.
बातचीत के अंतिम हिस्से में उन्होंने बदलाव के लिए भारत के अलग-अलग हिस्सों से सीखने पर जोर दिया. दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के शिक्षा, स्वास्थ्य, साक्षरता और सामाजिक बदलाव के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि देश के एक हिस्से में जो बेहतर काम हो रहा है, दूसरे हिस्सों को उससे सीखना चाहिए.
पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

