शुभ्रांशु चौधरी | केवल 10 लोगों को सजा देकर इसे न्याय की पूरी प्रक्रिया मान लेना उचित नहीं

'हरकारा डीप डाइव' में निधीश त्यागी ने बस्तर क्षेत्र में लंबे समय से काम कर चुके पत्रकार और नक्सलवाद पर किताब लिख चुके शुभ्रांशु चौधरी के साथ 2013 के झीरम घाटी हमले और 13 साल बाद आए अदालत के फैसले पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का सवाल सिर्फ 10 लोगों को मिली मृत्युदंड की सजा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह समझने की कोशिश भी की गई कि इस हमले की पूरी साजिश, सुरक्षा व्यवस्था, जांच और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के कितने सवाल अब भी अनुत्तरित हैं.

25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और विधायक उदय मुदलियार समेत कई नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम लोगों की मौत हुई थी. यह घटना छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले हुई थी और इसे कांग्रेस की एक पूरी राजनीतिक पीढ़ी के खत्म होने वाली बड़ी घटना के रूप में देखा गया. हमले के बाद सुरक्षा में लापरवाही और व्यापक साजिश को लेकर गंभीर आरोप-प्रत्यारोप हुए.

शुभ्रांशु चौधरी ने बताया कि हमले के बाद एनआईए की जांच के साथ जस्टिस प्रशांत मिश्रा की अध्यक्षता में एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया गया था. आयोग की रिपोर्ट 2021 में आई, लेकिन आज तक सार्वजनिक नहीं हुई है. इसी तरह कांग्रेस सरकार द्वारा गठित एसआईटी की व्यापक साजिश से जुड़ी जांच भी आगे नहीं बढ़ सकी. ऐसे में 13 साल बाद आए फैसले के बावजूद कई महत्वपूर्ण सवाल बाकी हैं.

एनआईए की चार्जशीट में बड़ी संख्या में लोगों के इस हमले में शामिल होने का उल्लेख किया गया था, लेकिन अदालत तक केवल सीमित संख्या में आरोपी पहुंच सके. शुभ्रांशु चौधरी के मुताबिक, चार्जशीट में जिन बड़े माओवादी नेताओं के नाम सामने आए थे, उनमें से कई बाद में मारे जा चुके हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं. उनका सवाल है कि जिन लोगों तक आज जांच एजेंसियों की पहुंच है, उनसे पूरी पूछताछ क्यों नहीं की जा रही.

बातचीत में 2013 की राजनीतिक परिस्थितियों और माओवादी रणनीति पर भी विस्तार से चर्चा हुई. उस समय भाजपा की विकास यात्रा और कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा समानांतर चल रही थीं. शुभ्रांशु चौधरी ने बताया कि माओवादी संगठन टीसीओसी यानी टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन के दौरान बड़े अभियानों की योजना बनाते थे. उनके मुताबिक, सुरक्षा बलों की गतिविधियों और संभावित रास्तों की जानकारी जुटाकर हमले की तैयारी की गई थी.

सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी कई सवाल सामने आए. शुभ्रांशु चौधरी ने बताया कि उस समय छत्तीसगढ़ पुलिस के शीर्ष स्तर पर प्रस्तावित सुरक्षा अभियान को लेकर आपत्तियां थीं. इसके बावजूद राजनीतिक योजना के तहत माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में सुरक्षा कैंप स्थापित करने की तैयारी की गई. यह योजना कितनी प्रभावी थी और झीरम घाटी हमले से इसका क्या संबंध था, इस पर भी जांच और राजनीतिक बहस जारी रही.

बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन आरोपियों को लेकर रहा जिन्हें स्थानीय स्तर पर पकड़ा गया और बाद में अदालत ने सजा दी. शुभ्रांशु चौधरी ने कहा कि अगर जांच को आगे बढ़ाना है तो केवल इन 10 लोगों तक सीमित रहने के बजाय चार्जशीट में बताए गए अन्य संभावित आरोपियों और उन लोगों से भी पूछताछ होनी चाहिए, जो बाद में आत्मसमर्पण कर चुके हैं. उनके मुताबिक, किसी घटना में न्याय का मतलब केवल कुछ लोगों को सजा देना नहीं, बल्कि पूरी घटना की जिम्मेदारी और उसकी परिस्थितियों को समझना भी है.

शुभ्रांशु चौधरी ने यह भी सवाल उठाया कि अगर चार्जशीट में बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की बात कही गई है, तो जांच का दायरा उन्हीं 10 लोगों तक क्यों सीमित रहे. उनके मुताबिक, जिन लोगों ने आत्मसमर्पण किया है या जिनके नाम पहले की जांच में सामने आए हैं, उनसे पूछताछ कर घटना की पूरी कड़ी को समझने की कोशिश की जानी चाहिए. इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि केवल 10 लोगों को सजा देकर इसे न्याय की पूरी प्रक्रिया मान लेना उचित नहीं होगा.

छत्तीसगढ़ की मौजूदा आत्मसमर्पण नीति और माओवादी नेताओं के पुनर्वास पर भी चर्चा हुई. सवाल यह है कि आत्मसमर्पण करने वालों के खिलाफ पुराने मामलों में जांच और कानूनी प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ेगी. शुभ्रांशु चौधरी ने बताया कि कुछ आत्मसमर्पित नेताओं और सरकार के बीच कथित सहमति को लेकर सार्वजनिक बयान सामने आए हैं, लेकिन लिखित नीति में स्थिति अलग दिखाई देती है. इसलिए इस मुद्दे पर भी स्पष्टता जरूरी है.

बातचीत में 2010 में हुए एक बड़े माओवादी हमले का उदाहरण देते हुए न्यायिक प्रक्रिया की गति और उसके परिणामों पर भी सवाल उठाया गया. शुभ्रांशु चौधरी ने कहा कि अगर अलग-अलग माओवादी घटनाओं में आरोपियों की भूमिका पर जांच और अदालतों के फैसले अलग-अलग परिस्थितियों में सामने आते हैं, तो सभी मामलों को व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है. सवाल यह भी है कि क्या केवल राजनीतिक रूप से चर्चित घटनाओं पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए या आम नागरिकों और सुरक्षा बलों की मौत से जुड़े मामलों की भी समान गंभीरता से जांच होनी चाहिए.

अंत में चर्चा इस सवाल पर पहुंची कि क्या झीरम घाटी मामले में 10 लोगों को मिली सजा के साथ यह अध्याय बंद हो जाएगा. शुभ्रांशु चौधरी के मुताबिक, ऐसा नहीं माना जा सकता. जब तक न्यायिक आयोग की रिपोर्ट, व्यापक साजिश से जुड़ी जांच, सुरक्षा व्यवस्था और अन्य आरोपियों की भूमिका जैसे सवालों पर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आते, तब तक इस मामले में बहस जारी रहेगी.

पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

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