बिलकिस बानो मामले में दोषी को परिवार की आर्थिक स्थिति के आधार पर सात दिन की पैरोल

‘लाइव लॉ’ के मुताबिक, गुजरात हाईकोर्ट ने गुरुवार को बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी राधेश्याम शाह को सात दिन की पैरोल दी. अदालत ने उसके परिवार की “आर्थिक स्थिति” और जेल अधिकारियों की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए यह राहत दी. न्यायमूर्ति संजीव जे. ठाकेर ने कहा कि याचिका में बताए गए कारणों और जेल प्रशासन की टिप्पणियों पर विचार करने के बाद अदालत पैरोल देने के पक्ष में है.

शाह ने अदालत में पैरोल की मांग करते हुए कहा था कि परिवार की आर्थिक स्थिति खराब है और उसे आर्थिक मदद के लिए घर जाना जरूरी है. वह 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए 11 लोगों में शामिल है.

अगस्त 2022 में गुजरात सरकार ने सभी 11 दोषियों को माफी देते हुए गोधरा उप-जेल से रिहा कर दिया था. बिलकिस बानो ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. 8 जनवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने माफी के आदेश रद्द कर दिए और कहा कि गुजरात सरकार के पास यह राहत देने का अधिकार नहीं था. अदालत ने सभी दोषियों को दोबारा जेल लौटने का आदेश दिया, जिसके बाद उन्होंने निर्धारित समय में आत्मसमर्पण किया.

2022 में रिहाई के बाद दोषियों का जेल के बाहर कुछ हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों और रिश्तेदारों ने स्वागत किया था. उन्हें मिठाई खिलाई गई और पैर छुए गए थे, जिसके बाद व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी.

मार्च 2002 में बिलकिस बानो पांच महीने की गर्भवती थीं, जब गुजरात में हिंसा के बीच उन्होंने अपने परिवार और अन्य लोगों के साथ रणधीकपुर गांव छोड़ा था. रास्ते में एक भीड़ ने उनके समूह पर हमला किया और उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया. उनकी तीन वर्षीय बेटी समेत परिवार के सात सदस्यों की हत्या कर दी गई.

2008 में अदालत ने 11 आरोपियों को सामूहिक बलात्कार और हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई. 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो को मुआवजा, सरकारी नौकरी और उनकी पसंद का आवास देने का निर्देश दिया था.

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