मेलघाट से बालाघाट तक: आदिवासी स्वास्थ्य व्यवस्था की न खत्म होने वाली त्रासदी

‘काउंटरकरंट्स’ में विकास परशराम मेश्राम ने लिखा है कि मध्य प्रदेश के पूर्वी हिस्से में बालाघाट जिले के बैहर और बिरसा तहसीलों के घने जंगलों में जून-जुलाई से सामने आई घटनाएं केवल किसी महामारी की कहानी नहीं हैं. यह इस बात का उदाहरण हैं कि भारत की स्वास्थ्य योजनाएं जमीनी स्तर पर आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने में किस तरह विफल हो रही हैं और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की उपेक्षा किस तरह जानलेवा बन सकती है.

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान की सीमा से लगे मचुरदा, अडोरी, बोंदारी, कोरका, गतिया, कोन्हीमोर और कुंडेकसा जैसे गांवों में बैगा और गोंड समुदाय के बच्चों को तेज बुखार और शरीर पर लाल चकत्ते होने लगे. कुछ बच्चों की मौत भी हुई, लेकिन प्रशासन तक इसकी सूचना पहुंचने में कई सप्ताह लग गए. अगस्त के मध्य तक स्थिति गंभीर होने के बाद 12 अगस्त को केंद्र ने राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल भेजा. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान की टीमों ने रक्त और पानी के नमूनों की जांच की. तीन गांवों से शुरू हुआ सर्वे करीब 50 गांवों तक पहुंचा, छह मोबाइल चिकित्सा दल लगाए गए और लगभग 1,200 बच्चों को खसरा-रूबेला टीके की अतिरिक्त खुराक दी गई. सितंबर के पहले सप्ताह में स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि सात दिनों से कोई नया खसरा मामला सामने नहीं आया है. लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी.

इन इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंचना भी बड़ी चुनौती है. निकटतम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र करीब 15 किलोमीटर दूर है, जबकि जिला मुख्यालय 125 किलोमीटर से अधिक दूरी पर है. गंभीर मरीज को प्राथमिक केंद्र से ब्लॉक अस्पताल, फिर करीब 70 किलोमीटर दूर बैहर उपमंडल और जरूरत पड़ने पर बालाघाट जिला अस्पताल ले जाना पड़ता है. घने जंगल, खराब सड़क और पहाड़ी रास्तों के बीच बीमार बच्चे को ले जाना कई बार जीवन-मृत्यु का सवाल बन जाता है. एंबुलेंस न पहुंच पाने पर बच्चों को बांस की झोली में पहाड़ों से नीचे लाना पड़ता है.

यह स्थिति महाराष्ट्र के अमरावती जिले के मेलघाट की याद दिलाती है, जहां कोरकू आदिवासी समुदाय में दशकों से बच्चों की मौत का सिलसिला जारी है. 1992 से 1997 के बीच कुपोषण से पांच हजार से अधिक बच्चों की मौत दर्ज हुई थी. 2016 में सूचना के अधिकार से सामने आए आंकड़ों में छह वर्षों में करीब छह हजार माताओं और बच्चों की मौत का उल्लेख था. विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि सरकारी आंकड़े वास्तविक संख्या से कई गुना कम दर्ज किए जाते हैं.

मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर स्वीकृत 416 विशेषज्ञ डॉक्टरों के मुकाबले केवल 67 डॉक्टर कार्यरत हैं. यानी 300 से अधिक पद खाली हैं. बिरसा तहसील में भी करीब 50 आशा कार्यकर्ता पद खाली बताए गए हैं. ये खाली पद केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि समय पर बच्चे की जांच, टीकाकरण और इलाज से जुड़ी सुविधाओं की कमी का संकेत हैं.

बैगा समुदाय के पारंपरिक भोजन कोदो और कुटकी का उपयोग भी घट रहा है. किसान इन्हें बाजार में बेच देते हैं और खुद सरकारी राशन पर निर्भर हो जाते हैं. इससे महिलाओं में एनीमिया और बच्चों में कुपोषण बढ़ने की स्थिति बनती है. जंगलों तक पहुंच पर पाबंदियां और कई गांवों में महीनों से पूरक पोषण न मिलने की शिकायतें भी सामने आई हैं.

कम टीकाकरण, स्वास्थ्य व्यवस्था पर अविश्वास और भाषा-सांस्कृतिक दूरी भी समस्या को बढ़ाती है. केवल बीमारी के समय चिकित्सा दल पहुंचने से समुदाय और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच भरोसा नहीं बन सकता. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी बच्चों की मौत से जुड़ी जनहित याचिका पर तथ्यात्मक सत्यापन की जरूरत बताई.

सरकार ने विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के लिए योजनाएं और पीएम-जनमन के तहत 15 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. लेकिन बालाघाट की घटना बताती है कि योजनाओं और उनके जमीनी क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर है. मेलघाट से बालाघाट तक बार-बार सामने आती ऐसी घटनाएं बताती हैं कि समस्या केवल किसी एक बीमारी की नहीं, बल्कि खाली पदों, दूरदराज की भौगोलिक स्थिति, कमजोर आजीविका और प्रशासन पर टूटते भरोसे की है. सवाल यही है कि अगली बार मदद बच्चों की मौत के बाद पहुंचेगी या उससे पहले?

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