‘प्रति कब्र 100 रुपये’: मुस्लिम कब्रिस्तान को नुकसान पहुँचाने के बाद मथुरा प्रशासन ने ऐसे लगाया हिसाब
26 अप्रैल, 2026 को मथुरा के मनोहरपुरा में स्थित 'अहल-ए-मुस्लिमीन कब्रिस्तान' में स्थानीय नगर निगम के सहायक आयुक्तों के निर्देश पर देर रात जेसीबी मशीनें घुसाई गईं. इस औचक कार्रवाई में वर्ष 1909 से मौजूद इस कब्रिस्तान की नौ कब्रें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं, चारदीवारी टूट गई और मृत शरीरों के कफ़न व कंकाल ज़मीन से बाहर दिखने लगे. इसके अलावा छह पेड़ और फेंसिंग के 20 खंभों को भी तोड़ दिया गया. उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के दस्तावेज़ों के मुताबिक, यह एक राजपत्रित (गजटेड) वक्फ अधिसूचित संपत्ति है. इस घटना से पीढ़ियों से अपने परिजनों को यहाँ दफनाने वाले स्थानीय मुस्लिम समुदाय में गहरा दुख और आक्रोश फैल गया.
पीड़ित परिवारों और कब्रिस्तान समिति ने उत्तर प्रदेश के एकीकृत शिकायत निवारण प्रणाली (आईजीआरएस) के माध्यम से प्रशासनिक शिकायत दर्ज कराई. इसके जवाब में मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने अपनी गलती और नुकसान को तो स्वीकार किया, लेकिन मुआवजे का जो आकलन किया उसने समुदाय की भावनाओं को और ठेस पहुँचाई: नगर स्वास्थ्य अधिकारी ने प्रति कब्र केवल 100 रुपये की दर से कुल 900 रुपये का मुआवजा तय किया. क्षतिग्रस्त पेड़ों के लिए 600 रुपये और फेंसिंग के खंभों के लिए 2,000 रुपये का आकलन किया गया.
इसके बाद ठेकेदार कंपनी के माध्यम से कब्रिस्तान समिति को 900 रुपये और 2,600 रुपये के दो चेक सौंप दिए गए. स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन ने पेड़ों और खंभों की तरह उनके मृत पूर्वजों की धार्मिक गरिमा का भी तुच्छ आर्थिक मोल लगा दिया है, जो कि सरासर अमानवीय है.
स्थानीय मुसलमानों का मानना है कि यह घटना कोई मामूली प्रशासनिक चूक नहीं है. यह कब्रिस्तान पहले भी गेट के पास कचरा केंद्र बनाने और जमीन के स्वरूप को बदलने की कोशिशों के कारण विवादों में रहा है.
समुदाय इसे हाल के वर्षों में मथुरा में बढ़ रही व्यापक असुरक्षा की पृष्ठभूमि से जोड़कर देखता है. पिछले कुछ समय में मुस्लिम व्यवसायों को निशाना बनाने, ध्वस्तीकरण अभियानों और शाही ईदगाह विवाद के कारण जिले का माहौल राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील हो चुका है. समिति के सदस्यों का आरोप है कि अब उनके पूजा स्थलों, घरों और आजीविका के बाद उनके दफन स्थलों को भी निशाना बनाया जा रहा है ताकि वे अपने कानूनी दावों को छोड़ दें. इस उत्पीड़न के विरोध में अब स्थानीय लोग सभी सरकारी विभागों में कानूनी दावे और दस्तावेज़ जमा कर रहे हैं. “मैं अपने दिवंगत भाई को कहाँ श्रद्धांजलि अर्पित करूँ? जब उन्होंने कब्रों को तोड़ा, तो उनका कफ़न तक दिखने लगा था,” मथुरा के मनोहरपुरा के एक स्थानीय निवासी ने कहा. ‘द वायर’ में तरुषि असवानी की विस्तृत रिपोर्ट यहां पढ़ सकते हैं.

