सीआरपीएफ ने केंद्र के विधेयक के ‘खिलाफ’ संदेश साझा करने पर डीआईजी रैंक के अधिकारी को निलंबित किया
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने त्रिपुरा सेक्टर मुख्यालय में तैनात अपने वरिष्ठ अधिकारी, उप महानिरीक्षक (डीआईजी) बी सी पात्रा को निलंबित कर दिया है. 1994-बैच के कैडर अधिकारी पात्रा पर आरोप है कि उन्होंने 'केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026' के संसद में पारित होने के दौरान सोशल मीडिया पर कथित तौर पर सरकार विरोधी सामग्री साझा की थी. अधिकारियों के अनुसार, इस ऑडियो-विजुअल और सचित्र सामग्री में देश की कानूनी रूप से चुनी गई सरकार को "बदलने" का आह्वान किया गया था. देश के 10 लाख जवानों वाले सीएपीएफ के 15,000 कैडर अधिकारियों के इतिहास में इस तरह के निलंबन का यह पहला मामला है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, सीआरपीएफ के महानिदेशक जी पी सिंह ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया कि बल के सभी वर्दीधारी अधिकारी नियमों, संविधियों और अपनी शपथ से बंधे हैं. इसका उल्लंघन करने वाले किसी भी लिखित, मौखिक शब्द या कृत्य से देश के कानून के मुताबिक सख्ती से निपटा जाएगा. पात्रा को सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 के तहत प्रारंभिक जांच लंबित रहने तक निलंबित किया गया है.
दूसरी तरफ, मामले से जुड़े कई अधिकारियों ने इस कार्रवाई को "दुर्भावनापूर्ण" और "अनुचित" बताया है. उनका दावा है कि डीआईजी पात्रा को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों के साथ पदोन्नति और सेवा समानता को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कैडर अधिकारियों की कानूनी लड़ाई का नेतृत्व किया था. सूत्रों का यह भी कहना है कि इस अदालती लड़ाई में शामिल करीब दो दर्जन अन्य अधिकारियों के भी हाल ही में जल्दबाजी में तबादले किए गए हैं.
पूर्व अर्धसैनिक बलों के संघ 'एएपीडब्ल्यूए' ने इस निलंबन को अवैध बताते हुए इसके खिलाफ 2 जुलाई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है. संघ के महासचिव रणबीर सिंह ने पात्रा को एक उत्कृष्ट और पुरस्कृत अधिकारी बताया है.
विवाद की जड़ में नया सीएपीएफ कानून है, जिसे सेवारत कैडर अधिकारी "दमनकारी" और "भेदभावपूर्ण" मान रहे हैं. अधिकारियों का कहना है कि यदि पिछले साल के सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सीएपीएफ में आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को कम नहीं किया गया, तो कैडर अधिकारियों की पदोन्नति रुक जाएगी और वे एक ही रैंक पर ठहर जाएंगे.
इसके विपरीत, गृह मंत्रालय का तर्क है कि इस विधेयक का उद्देश्य सभी सीएपीएफ बलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है. मंत्रालय ने आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को एक "वैध आवश्यकता" बताया है, क्योंकि वे अखिल भारतीय सेवा का हिस्सा हैं और राज्य पुलिस में भी पर्यवेक्षी भूमिका निभाते हैं.

