श्रवण गर्ग | विपक्ष का पोस्टमार्टम करने वालों को यह भी देखना चाहिए कि उनकी अपनी सेहत कैसी है. 

हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और निधीश त्यागी ने भारतीय राजनीति के उस पक्ष पर चर्चा की जिस पर सार्वजनिक बहस अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है. बातचीत का केंद्र यह सवाल रहा कि जब पूरा ध्यान विपक्ष की कमजोरियों, दलबदल और राजनीतिक टूट-फूट पर है, तब क्या बीजेपी और आरएसएस के भीतर उभर रही चुनौतियों को नजरअंदाज किया जा रहा है.

चर्चा में कर्नाटक में प्रियंक खड़गे द्वारा आरएसएस की जवाबदेही, चंदे और संगठनात्मक ढांचे को लेकर उठाए गए सवालों का जिक्र हुआ. वक्ताओं ने कहा कि इन आरोपों के बाद बीजेपी नेतृत्व की चुप्पी और संघ की प्रतिक्रिया ने दोनों संगठनों के रिश्तों को लेकर नई बहस को जन्म दिया है.

उत्तर प्रदेश की राजनीति पर बात करते हुए योगी आदित्यनाथ की बढ़ती राजनीतिक हैसियत, बीजेपी नेतृत्व के साथ उनके संबंधों को लेकर चल रही अटकलों और राम मंदिर चंदा विवाद, लखनऊ अग्निकांड जैसे मुद्दों पर हो रही आलोचनाओं को व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा गया. चर्चा में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या इन घटनाओं का इस्तेमाल सत्ता और नेतृत्व संतुलन की राजनीति में हो रहा है.

मध्य प्रदेश में मोहन यादव से जुड़े भूमि सौदों के विवाद और शिवराज सिंह चौहान की भूमिका पर भी चर्चा हुई. वक्ताओं का तर्क था कि इन घटनाओं को केवल प्रशासनिक विवाद मानकर नहीं देखा जा सकता, बल्कि इनके राजनीतिक संकेत भी हैं.

बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बीजेपी में लगातार बढ़ती दलबदल राजनीति और उसके संगठनात्मक असर पर केंद्रित रहा. यह सवाल उठाया गया कि दूसरे दलों से आए नेताओं को बढ़ती जगह मिलने से पुराने कार्यकर्ताओं और वैचारिक रूप से जुड़े कैडर के भीतर असहजता पैदा हो रही है या नहीं.

चर्चा के अंत में यह निष्कर्ष सामने आया कि भारतीय राजनीति को केवल विपक्ष की कमजोरियों के नजरिए से नहीं देखा जा सकता. बीजेपी और आरएसएस के भीतर उभर रहे संभावित अंतर्विरोध, नेतृत्व संघर्ष और संगठनात्मक चुनौतियां भी आने वाले समय की राजनीति को प्रभावित कर सकती हैं. पूरी बातचीत यहाँ देख सकते हैं.



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