एसआईआर के बाद कर्नाटक की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 1.08 करोड़ नामों को हटाया, हर पाँच में एक वोटर बाहर

सोमवार (24 अगस्त, 2026) को कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के गणना चरण के पूरा होने के बाद जारी की गई प्रारूप मतदाता सूची में चिंताजनक स्तर पर नाम हटाए जाने का खुलासा हुआ है. गणना चरण के दौरान भारी संख्या में नाम हटाने वाले अन्य प्रमुख राज्यों की तुलना में यह अभूतपूर्व है.

सूची से 1.08 करोड़ नामों को हटाए जाने के बाद, 224 विधानसभा क्षेत्रों वाले इस राज्य की मतदाता सूची 19.5% घटकर 5.54 करोड़ से 4.46 करोड़ रह गई है — जिसका अर्थ है एसआईआर से पहले सूची में शामिल लगभग हर पांच में से एक मतदाता को हटा दिया गया है.

यद्यपि गणना चरण के दौरान प्रमुख राज्यों में नाम हटाए जाने की यह सर्वोच्च दर नहीं थी (तेलंगाना में हाल ही में 21.7% नाम हटाए जाने की सूचना मिली थी), लेकिन विधानसभा क्षेत्रवार विश्लेषण कर्नाटक में अधिक चिंताजनक रुझान दिखाते हैं. पोन वसंत बी.ए., नितिका फ्रांसिस और ऋषिता खन्ना की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग ने एसआईआर के दौरान किसी भी राज्य के लिए 18+ आयु वर्ग (ईपी) की जनसंख्या के मुकाबले मतदाताओं का अनुपात जारी नहीं किया है, जो हर मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान अनिवार्य होता है. ईपी अनुपात कम नामांकन या अधिक नामांकन का संकेत देता है. कई लोगों ने यह चिंता जताई है कि एसआईआर बिना इस अनुमान के की जा रही है कि मतदाता सूची में कितने मतदाता होने चाहिए.

रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक की प्रारूप एसआईआर सूची मतदान के योग्य अनुमानित जनसंख्या से कम से कम 67 लाख कम है. यह अनिश्चित है कि क्या इस अंतर को कम से कम उचित सीमा तक पाटा जा सकता है या नहीं  यह देखते हुए कि प्रारूप सूची में शामिल लगभग 44 लाख मतदाताओं को विसंगतियों के लिए नोटिस दिए जाने की संभावना है.

मुख्य बेंगलुरु क्षेत्र में नाम हटाए जाने का उच्चतम संकेंद्रण देखा गया.  बेंगलुरु क्षेत्र के बाहर, गुलबर्गा दक्षिण में सबसे अधिक 34% नाम हटाए गए. इसकी एसआईआर-पूर्व 2,97,785 मतदाताओं की संख्या घटकर 1,96,522 रह गई, जिसमें सूची से एक लाख से अधिक मतदाता हटा दिए गए.

बेंगलुरु और उसके आसपास देखी गई नाम हटाने की यह प्रक्रिया अन्य राज्यों की अत्यधिक शहरीकृत राजधानी शहरों में देखी गई कटौतियों की तुलना में अभूतपूर्व है, जिन्होंने एसआईआर प्रक्रिया पूरी कर ली है.

पाँच विधानसभा क्षेत्रों — बोम्मनहल्ली (54.8%), दसरहल्ली (52.1%), बी.टी.एम लेआउट (51.6%), विजयनगर (51.1%), और सी.वी. रमन नगर (51.1%) — की आधी से अधिक मतदाता सूची को हटा दिया गया.  किसी भी प्रमुख राज्य में यह शायद पहली बार है जहाँ गणना चरण के दौरान विधानसभा क्षेत्रों में 50% से अधिक नाम हटाए गए हैं. 1.08 करोड़ कटौतियों में से 50% केवल 224 विधानसभा क्षेत्रों में से 36 क्षेत्रों से आई हैं, जिनमें से 28 मुख्य बेंगलुरु क्षेत्र में थे.

अन्य राज्यों में देखे गए पैटर्न के अनुसार, अधिकांश शहरी क्षेत्रों वाले निर्वाचन क्षेत्रों में नाम हटाए जाने का संकेंद्रण अधिक था. 29 अत्यधिक शहरीकृत जिलों में 41.5% नाम हटाए गए.

पारदर्शिता की कमी

इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के बावजूद, चिंताजनक रूप से कर्नाटक सबसे कम पारदर्शी प्रतीत होता है. मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) की वेबसाइट ने हटाए गए मतदाताओं की सूची को ऐसे प्रारूप में होस्ट नहीं किया है जिसे खोजा जा सके, जैसा कि अन्य सभी राज्यों में किया गया था.

इसके बजाय, सूचियों को अलग-अलग गूगल ड्राइव लिंक पर होस्ट किया गया था, जिसमें बूथ वार नाम हटाने की सूची केवल अंग्रेजी में उपलब्ध थी. दस्तावेजों में पुराने बूथ नंबर नहीं हैं, जिससे मतदाताओं के लिए उन्हें खोजना मुश्किल हो जाता है क्योंकि गणना चरण के दौरान किए गए बूथ युक्तिकरण अभ्यास के कारण बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों के बूथ नंबर बदल गए हैं.

कर्नाटक के सीईओ वी. अनबू कुमार ने 'द हिंदू' को बताया कि कार्यालय पुराने बूथ नंबरों को जोड़ने की प्रक्रिया में है. जब वेबसाइट के खराब रखरखाव के बारे में पूछा गया, जिसमें कई लिंक "URL not found" त्रुटि दे रहे थे, तो सीईओ कार्यालय ने कहा कि वह इस मामले की जांच करेगा.

इस बीच, अधिकांश अन्य राज्यों के विपरीत जहाँ प्रारूप एसआईआर सूचियों में और हटाए गए नामों में लिंगवार विवरण उपलब्ध कराए गए थे, कर्नाटक ने नाम हटाने से जुड़े लिंगवार आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं, जिससे यह अस्पष्ट है कि कितनी महिलाएं, पुरुष या ट्रांसजेंडर लोग बाहर छूटे हैं. मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि कार्यालय के पास यह डेटा नहीं था.

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