भारत में परीक्षा घोटाले : 11 वर्षों में 148 मामले, सिर्फ एक सजा
‘द वायर’ में आशुतोष रांका और नाइस पौडेल के लेख का सारांश कहता है कि पिछले 11 वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में पेपर लीक, नकल और परीक्षा में धोखाधड़ी के कम से कम 148 बड़े मामले सामने आए. लेकिन कानूनी और न्यायिक ढुलमुल रवैये के कारण इतने वर्षों में केवल एक मामले में ही आरोपियों को सजा मिल सकी है.
लेख कहता है कि देश में हर साल करोड़ों छात्र सरकारी नौकरियों और मेडिकल/इंजीनियरिंग जैसी प्रवेश परीक्षाओं के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं. लेकिन संगठित परीक्षा माफिया और सॉल्वर गैंग के कारण पूरी प्रक्रिया दूषित हो जाती है, जिससे योग्य छात्रों का भविष्य अधर में लटक जाता है.
इसमें यह सवाल भी उठाया गया है कि कड़े कानून (जैसे पेपर लीक विरोधी कानून) बनाने के बावजूद जमीन पर उनका असर नहीं दिख रहा है. बड़े-बड़े रैकेट पकड़े जाने के बाद भी पुख्ता सबूतों की कमी या राजनीतिक व प्रशासनिक संरक्षण के कारण मुख्य आरोपी अक्सर बच निकलते हैं.
जांच एजेंसियों द्वारा चार्जशीट दाखिल करने में देरी और अदालती मुकदमों का सालों-साल खिंचना इस 'परीक्षा घोटाले के गुब्बारे' को और बड़ा कर रहा है, जिससे जनता का भरोसा देश की परीक्षा प्रणालियों से उठ रहा है. अंग्रेजी में मूल लेख और ‘परिवर्तन’ की रिपोर्ट, जिसमें पिछले 20 वर्षों का विश्लेषण किया गया है, को यहां पढ़ा जा सकता है.

