इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस को फटकारा, कहा- अफसर संविधान के बजाय राजनीतिक आकाओं की सेवा करते हैं
उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में टिप्पणी की कि राज्य के पुलिस अधिकारियों की वफादारी अक्सर संविधान के बजाय सत्तारूढ़ शासन के प्रति दिखाई देती है.
‘द हिंदू’ में इशिता मिश्रा की रिपोर्ट के अनुसार, यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने बुधवार (3 जून, 2026) को गाजियाबाद निवासी राजेंद्र त्यागी और उनके परिवार के खिलाफ दर्ज गैंगस्टर एक्ट के एक मामले की सुनवाई के दौरान की. इस मामले को खारिज करते हुए अदालत ने पाया कि ये आरोप भूमि और वित्तीय विवादों से उपजे थे और इस कड़े कानून को लागू करने की कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते थे.
अदालत ने एक गृहिणी, ललिता त्यागी की गिरफ्तारी पर गंभीर चिंता व्यक्त की, जिन्होंने लगभग 80 दिन जेल में बिताए. अदालत ने उनकी गिरफ्तारी को "स्पष्ट रूप से अवैध, मनमाना और पूरी तरह से अनुचित" करार दिया और कहा कि उनकी गिरफ्तारी या गैंगस्टर एक्ट के मामले में उनका नाम शामिल करने का औचित्य साबित करने के लिए कोई सामग्री (सबूत) नहीं थी.
गैंगस्टर एक्ट का दुरुपयोग
कार्यवाही के दौरान, अदालत ने गैंगस्टर एक्ट के कथित दुरुपयोग पर उत्तर प्रदेश के गृह विभाग और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से बार-बार स्पष्टीकरण मांगा. उनके जवाबों से असंतुष्ट होकर, अदालत ने दोषसिद्धि (सजा), बरी होने, जवाबदेही तंत्र और दोषी अधिकारियों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई का डेटा मांगा.
पुलिस को फटकार लगाते हुए अदालत ने कहा कि एक ऐसी गहरी संस्कृति ने जड़ जमा ली है, जिसमें कानून के शासन को संवैधानिक अधिदेश (जनादेश) के बजाय एक प्रशासनिक बाधा के रूप में अधिक देखा जाता है. अदालत ने आगे कहा कि बिना उचित प्रक्रिया के गिरफ्तारियां की जाती हैं, बाहरी हितों को साधने के लिए एफआईआर में हेरफेर किया जाता है, और निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) कानूनों का मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया जाता है. आपराधिक कानून के तहत प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की नियमित रूप से अनदेखी की जाती है, जबकि न्यायिक आदेशों का पालन केवल कागजों पर किया जाता है और उनके मूल उद्देश्य को विफल कर दिया जाता है.
अदालत ने कहा, “अधिकारियों की सीधी (वर्टिकल) वफादारी संविधान के प्रति नहीं बल्कि सत्तारूढ़ शासन के प्रति होती है. ट्रांसफर-पोस्टिंग की व्यवस्था से पूरी तरह वाकिफ फील्ड अधिकारी, राजनीतिक आकाओं को संतुष्ट करने के लिए अपने आचरण को उसी अनुरूप ढालते हैं. एनकाउंटर (मुठभेड़ में हत्याएं), चुनिंदा तरीके से की जाने वाली कार्रवाई और असुविधाजनक व्यक्तियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट का लक्षित (टारगेटेड) उपयोग समय-समय पर न्यायिक संज्ञान में आता रहा है. हाई कोर्ट ने कई मौकों पर इस प्रवृत्ति की निंदा की है और अधिकारियों को याद दिलाया है कि उनके पद संवैधानिक प्रकृति के हैं और उन्हें व्यक्तिगत सुविधा का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए.”
अदालत ने आगे प्रथम दृष्टया यह पाया कि गाजियाबाद के पूर्व पुलिस आयुक्त अजय कुमार मिश्रा ने गैंगस्टर एक्ट की कार्यवाही को मंजूरी देते समय अपने अधिकार का दुरुपयोग किया था. हालांकि अदालत ने दंडात्मक कार्रवाई करने से परहेज किया, लेकिन उन्हें अधिक संयम बरतने और कानून का पालन करने की चेतावनी दी.

