डांगावास दलित हत्याकांड: 11 साल बाद कोर्ट ने सभी 40 आरोपियों को बरी किया, तो फिर 6 लोगों को किसने मारा?
राजस्थान के नागौर जिले के बहुचर्चित डांगावास दलित हत्याकांड (2015) में मेड़ता स्थित एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) मामलों की विशेष अदालत ने 11 साल बाद सभी 40 आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है. इस फैसले के बाद पीड़ित परिवार, दलित अधिकार कार्यकर्ता और राजनीतिक दल न्याय प्रणाली एवं जांच प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं.
दीप मुखर्जी के अनुसार, यह विवाद डांगावास गांव में 23 बीघा जमीन के एक टुकड़े को लेकर था. यह जमीन 1961 में राजस्थान सरकार ने बस्ताराम मेघवाल (दलित) को आवंटित की थी, जिसे बाद में उनके बेटे रत्नाराम मेघवाल को स्थानांतरित कर दिया गया. 1964 में यह जमीन ₹1,500 में चिमनाराम जाट के पास बिना ब्याज के गिरवी रखी गई थी. वर्षों बाद, रत्नाराम ने जमीन का कब्जा वापस लेने के लिए वहां निर्माण कर लिया, जिससे विवाद बढ़ा.
14 मई 2015 का नरसंहार: ग्रामीणों द्वारा बुलाई गई पंचायत के बाद, लगभग 200 लोगों की भीड़ ने कथित तौर पर धारदार हथियारों और ट्रैक्टरों के साथ दलित परिवार पर हमला कर दिया. इस हमले में रत्नाराम मेघवाल सहित पांच दलित पुरुषों (रत्नाराम, पंचाराम, गणेशराम, गणपतराम व पोकरराम) की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए. घटना के दौरान गोली लगने से रामपाल गोस्वामी नामक एक अन्य व्यक्ति की भी मौत हुई थी, जिसकी अलग से काउंटर एफआईआर दर्ज की गई थी. जनआक्रोश के बाद मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी.
अदालत का फैसला और बरी होने के कारण: विशेष न्यायाधीश आशीष बिजार्णिया ने अपने 245 पन्नों के फैसले में माना कि 14 मई 2015 को जघन्य और दिल दहला देने वाली सामूहिक हिंसा हुई थी, लेकिन अभियोजन पक्ष किसी भी आरोपी की व्यक्तिगत संलिप्तता और सटीक भूमिका को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा.
अदालत द्वारा रेखांकित की गई मुख्य प्रक्रियात्मक खामियां: ट्रैक्टरों की जांच न होना: घटना में ढांचों को गिराने के लिए इस्तेमाल किए गए ट्रैक्टरों को न तो जब्त किया गया, न उनकी पहचान हुई और न ही फॉरेंसिक जांच की गई.
पहचान और शिनाख्त परेड का अभाव: किसी भी गवाह ने सभी 40 आरोपियों की पहचान नहीं की और कोई आधिकारिक शिनाख्त परेड आयोजित नहीं की गई.
गवाहों के बयानों में विरोधाभास: कुछ गवाहों ने माना कि वे भीड़ के केवल एक छोटे हिस्से को जानते थे. अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपियों का बरी होना यह साबित नहीं करता कि अपराध नहीं हुआ, बल्कि यह दर्शाता है कि कानून-सम्मत साक्ष्यों के माध्यम से अपराधियों की पहचान नहीं हो सकी. अदालत ने राज्य सरकार को पीड़ितों को एससी/एसटी नियम, 1995 के तहत मुआवजा देने का निर्देश दिया.
रत्नाराम के बेटे और घटना के चश्मदीद/शिकायतकर्ता अर्जुनराम मेघवाल ने गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए सवाल उठाया कि यदि सभी 40 आरोपी निर्दोष हैं, तो उनके पिता और रिश्तेदारों की हत्या किसने की?
अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने इसे जांच एजेंसियों और राज्य की विफलता करार दिया. उन्होंने कहा कि सीबीआई जांच के बावजूद सजा न होना यह दर्शाता है कि दलितों के लिए न्याय पाना कितना कठिन है. उन्होंने सरकार से इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की मांग की.
पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने फैसले पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि 11 साल की लंबी कानूनी लड़ाई और सीबीआई जांच के बावजूद न्याय न मिलना जांच व अभियोजन की गंभीर खामियों को उजागर करता है. पीड़ित परिवारों का एक जायज सवाल है: अगर 40 आरोपी बरी हो गए, तो इन छह लोगों की हत्या किसने की?

