अरुण श्रीवास्तव | संघ प्रमुख की पहल: छात्रों को वर्गीय आधार पर बांटने का मिशन?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का मुंबई में जेन-ज़ी और जेन-अल्फा के दो हजार से अधिक छात्रों के साथ संवाद अरुण श्रीवास्तव की नजर में केवल एक सामान्य युवा संवाद नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक पहल थी. उनका तर्क है कि परीक्षा अनियमितताओं, राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा विवाद, प्रशासनिक विफलताओं और छात्र आंदोलनों के बाद संघ परिवार को युवाओं के बीच बढ़ती नाराजगी का एहसास हुआ, जिसके चलते यह संवाद आयोजित किया गया.
उनका कहना है कि यदि छात्र आंदोलन लंबे समय तक जारी रहता, तो इससे भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती थी. इसी कारण मोहन भागवत ने पहली बार स्पष्ट रूप से कहा कि विरोध प्रदर्शन करने वाले युवा राष्ट्रविरोधी नहीं हैं और लोकतांत्रिक आंदोलन संवाद का एक माध्यम हैं.
अरुण श्रीवास्तव ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी से जुड़े विवादों का भी उल्लेख किया है. उनके अनुसार, परीक्षा प्रणाली को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे, लेकिन उस समय संघ नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप नहीं किया. उनका मानना है कि जब आंदोलन ने व्यापक राजनीतिक स्वरूप लेना शुरू किया, तभी छात्रों के साथ संवाद की पहल की गई.
अरुण श्रीवास्तव का यह भी कहना है कि मुंबई में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य रूप से संपन्न और प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि के छात्रों की भागीदारी रही. उनके मुताबिक, इसका उद्देश्य आंदोलन कर रहे सामान्य छात्रों और अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के छात्रों के बीच एक अलग राजनीतिक संदेश देना था. वह इस पहल को युवाओं के असंतोष को नियंत्रित करने और संघ की छवि को नरम बनाने की रणनीति मानते हैं.
मोहन भागवत ने कार्यक्रम में कहा कि आज की पीढ़ी बिना तर्क के किसी बात को स्वीकार नहीं करती और विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है. उन्होंने जेन-ज़ी को ईमानदार पीढ़ी भी बताया. अरुण श्रीवास्तव का कहना है कि यह बयान पहले के राजनीतिक माहौल से अलग दिखाई देता है, क्योंकि विभिन्न छात्र आंदोलनों के दौरान प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रविरोधी कहे जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं.
उन्होंने यह भी लिखा है कि छात्र आंदोलनों के कारण सत्ता पक्ष के भीतर भी चिंता बढ़ी. लेख में उन खबरों का जिक्र है जिनमें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर असंतोष की बात कही गई थी, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई. उनके अनुसार, जेन-ज़ी और जेन-अल्फा की बड़ी आबादी भविष्य की राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखती है, इसलिए युवाओं के साथ संवाद अब राजनीतिक आवश्यकता बन गया है.
अरुण श्रीवास्तव ने यह भी याद दिलाया है कि वर्ष 2016 में नोटबंदी और वर्ष 2020 में किसान आंदोलन के दौरान भी मोहन भागवत ने इसी तरह के सार्वजनिक संवाद किए थे. उनके अनुसार, ऐसे संवाद अक्सर तब सामने आते हैं जब सत्ता प्रतिष्ठान राजनीतिक दबाव का सामना कर रहा होता है.
लेख के अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मंत्रियों से सोशल मीडिया, विशेषकर इंस्टाग्राम, पर अधिक सक्रिय रहने की अपील का भी उल्लेख किया गया है. अरुण श्रीवास्तव का निष्कर्ष है कि मोहन भागवत का यह संवाद युवाओं के बीच बढ़ती दूरी को कम करने, संघ परिवार की छवि को नया स्वरूप देने और छात्र असंतोष को व्यापक राजनीतिक चुनौती बनने से रोकने की एक रणनीतिक राजनीतिक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए.
(अरुण श्रीवास्तव का यह लेख countercurrents.org पर प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख का हिन्दी में अनूदित अंश है.)

