हरीश खरे | मोदी राज के 12 साल: हिंदुत्व शासन के ‘आशीर्वाद’ की भारी कीमत चुका रहे हैं भारत के हिंदू
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन का एक और वर्ष पूरा होने जा रहा है और इसके साथ ही उपलब्धियों के दावों, आत्मप्रशंसा और राजनीतिक उत्सव का दौर भी शुरू हो चुका है. पिछले 12 वर्षों से देश को यह बताया जा रहा है कि हिंदुत्व की राजनीति ने भारत को नई दिशा दी है, बहुसंख्यक समाज को उसका सम्मान लौटाया है और देश को पहले से अधिक शक्तिशाली बनाया है. लेकिन इस उत्सव और दावों के बीच एक ऐसा सवाल भी है जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है. अगर हिंदुत्व राजनीति का सबसे बड़ा लाभार्थी हिंदू समाज को माना जाता है, तो क्या पिछले एक दशक की शासन व्यवस्था की कीमत भी उसी समाज ने सबसे अधिक नहीं चुकाई है?
पिछले वर्षों में मुसलमानों की स्थिति, उनके अधिकारों और उनके राजनीतिक हाशियाकरण को लेकर काफी चर्चा हुई है. लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण सवाल है कि शासन की विफलताओं, आर्थिक दबावों और प्रशासनिक कमियों का असर किन लोगों पर पड़ा. आज महंगाई से परेशान परिवार, रोजगार की तलाश में भटकते युवा, परीक्षा घोटालों से प्रभावित छात्र और बुनियादी सुविधाओं की समस्याओं से जूझते नागरिक बड़ी संख्या में उसी बहुसंख्यक समुदाय से आते हैं जिसके नाम पर सबसे अधिक राजनीति की जाती रही है.
12 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद किसी भी सरकार के लिए यह कहना आसान नहीं होता कि वर्तमान समस्याओं के लिए केवल पिछली सरकारें जिम्मेदार हैं. लोकतंत्र में चुनावी जीत के साथ जवाबदेही भी आती है. लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के बाद उपलब्धियों का श्रेय लेने के साथ-साथ विफलताओं की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी पड़ती है. यही वह कसौटी है जिस पर किसी भी शासन का मूल्यांकन होता है.
पिछले एक दशक में ऐसा माहौल बनाया गया जिसमें धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहे. बहुसंख्यक समाज को लगातार यह संदेश दिया गया कि उसकी सुरक्षा और हितों की रक्षा सबसे बड़ा राष्ट्रीय प्रश्न है. लेकिन इसी दौरान शासन की गुणवत्ता, आर्थिक प्रदर्शन, शिक्षा व्यवस्था और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे अपेक्षित प्राथमिकता हासिल नहीं कर सके. परिणाम यह हुआ कि कई पुरानी समस्याएं बनी रहीं और कुछ नई चुनौतियां भी सामने आ गईं.
अर्थव्यवस्था इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. सरकार भारत को दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा करती है. लेकिन आम नागरिक के जीवन में महंगाई एक स्थायी चिंता बनी हुई है. पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और रोजमर्रा की जरूरतों की बढ़ती कीमतों ने परिवारों के बजट पर दबाव बढ़ाया है. इन आर्थिक चुनौतियों का कोई धार्मिक चरित्र नहीं है. महंगाई यह नहीं देखती कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान. लेकिन जब देश की आबादी का बड़ा हिस्सा हिंदू है तो स्वाभाविक रूप से आर्थिक कठिनाइयों का सबसे बड़ा असर भी उसी आबादी पर पड़ता है.
शिक्षा व्यवस्था की स्थिति भी इसी तस्वीर का हिस्सा है. हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होने और परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ियों की घटनाएं लगातार सामने आई हैं. लाखों छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं, परिवार अपनी बचत कोचिंग और शिक्षा पर खर्च करते हैं और फिर किसी परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो जाते हैं. नीट जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और कमजोर निगरानी किस तरह युवाओं के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं. इन परीक्षाओं में शामिल होने वाले अधिकांश छात्र बहुसंख्यक समुदाय से आते हैं और इसलिए इन विफलताओं की सबसे बड़ी कीमत भी वही चुकाते हैं.
रोजगार का संकट भी कम गंभीर नहीं है. हर वर्ष बड़ी संख्या में युवा शिक्षा पूरी करके नौकरी बाजार में प्रवेश करते हैं, लेकिन अवसरों की कमी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है. इनमें ऐसे युवा भी शामिल हैं जो राष्ट्रवादी राजनीति और हिंदुत्व विचारधारा के समर्थक माने जाते हैं. लेकिन राजनीतिक पहचान रोजगार की समस्या का समाधान नहीं बनती. बेरोजगारी का असर सीधे परिवारों की आय, सामाजिक स्थिरता और युवाओं के भविष्य पर पड़ता है. यह ऐसा प्रश्न है जिसे किसी धार्मिक या सांस्कृतिक बहस के पीछे लंबे समय तक नहीं छिपाया जा सकता.
आर्थिक असमानता को लेकर भी सवाल लगातार उठते रहे हैं. आलोचकों का आरोप है कि कुछ बड़े कारोबारी समूहों का प्रभाव लगातार बढ़ा है जबकि आम नागरिक महंगाई और बढ़ती लागत से जूझ रहा है. जब आर्थिक विकास के लाभ सीमित वर्गों तक केंद्रित दिखाई देते हैं और दूसरी ओर आम उपभोक्ता अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करता है, तो असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है. यह असंतोष भी किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहता.
शहरों और कस्बों में नागरिक सुविधाओं की स्थिति भी बहस का विषय है. पानी की कमी, बिजली आपूर्ति की समस्याएं, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे की खामियां लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं. इन समस्याओं का सामना करने वाले नागरिकों में अधिकांश वही लोग हैं जो चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. लेकिन इन मुद्दों की तुलना में पहचान आधारित राजनीति अक्सर अधिक प्रमुख स्थान हासिल कर लेती है.
इसी संदर्भ में भय और असुरक्षा की राजनीति का सवाल भी उठता है. पिछले वर्षों में सार्वजनिक जीवन में लगातार यह संदेश दिया गया कि बहुसंख्यक समाज विभिन्न प्रकार के खतरों से घिरा हुआ है. समय-समय पर नए-नए खतरे और नए-नए अभियान सामने आते रहे. परिणाम यह हुआ कि सार्वजनिक बहस का बड़ा हिस्सा इन मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता रहा, जबकि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे प्रश्न पीछे छूटते गए.
मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उपलब्धियों की लंबी सूची एक बार फिर सामने रखी जाएगी. लेकिन इसके साथ यह सवाल भी पूछा जाएगा कि क्या इतने लंबे शासन के बाद आम नागरिकों के जीवन में वह बदलाव आया जिसकी उम्मीद की गई थी. क्या महंगाई कम हुई, क्या युवाओं को पर्याप्त रोजगार मिला, क्या शिक्षा व्यवस्था अधिक भरोसेमंद बनी और क्या प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत हुई? इन सवालों के जवाब ही किसी भी सरकार के वास्तविक मूल्यांकन का आधार बनते हैं.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शासन की सफलताओं और विफलताओं का मूल्यांकन किसी एक समुदाय के नजरिए से नहीं किया जा सकता. लेकिन यदि बहुसंख्यक समाज के नाम पर राजनीति की जाती है, तो यह भी देखना होगा कि उस समाज को वास्तव में क्या मिला और उसे किन समस्याओं का सामना करना पड़ा. 12 वर्षों के इस दौर की समीक्षा करते समय यही प्रश्न सबसे अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देता है. राजनीतिक नारों और सांस्कृतिक प्रतीकों से परे जाकर अब शासन के वास्तविक परिणामों पर चर्चा होना उतना ही जरूरी है जितना किसी भी लोकतंत्र में होना चाहिए.
हरीश खरे 'द ट्रिब्यून' के पूर्व प्रधान संपादक हैं.

