आकार पटेल | मोहन भागवत का भाषण नहीं, भारत का 12 साल का रिकॉर्ड ज्यादा सवालों के घेरे में है
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने लेखक, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता आकार पटेल के साथ न्यूयॉर्क में मोहन भागवत के प्रस्तावित कार्यक्रम और उसके विरोध के बहाने भारत की छवि, हिंदुत्व, प्रवासी भारतीयों और वैश्विक राजनीति पर चर्चा की.
चर्चा का केंद्र न्यूयॉर्क का वह दृश्य रहा, जहां एक तरफ मोहन भागवत को सुनने के लिए समर्थक जुटने वाले थे, वहीं दूसरी तरफ उनके कार्यक्रम का विरोध करने वाले समूह सक्रिय थे. निधिश त्यागी ने इसे "दो भारतों" के आमने-सामने होने के रूप में रखा. एक भारत आरएसएस और हिंदुत्व की राजनीति से अपनी पहचान जोड़ता है, जबकि दूसरा भारत बहुलतावादी, समावेशी और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की बात करता है.
आकार पटेल ने तर्क दिया कि विदेशों में "वसुधैव कुटुंबकम" और सार्वभौमिक भाईचारे की बात करने वाली राजनीति को भारत के भीतर होने वाली नीतियों और घटनाओं के संदर्भ में भी देखा जाएगा. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर सत्ता और संगठन वास्तव में इन मूल्यों को मानते हैं, तो उन्हें अपने व्यवहार और नीतियों में भी दिखाना चाहिए. उनके मुताबिक दुनिया केवल भाषण नहीं, बल्कि सरकारों और संगठनों के कामकाज को भी देखती है.
चर्चा में प्रवासी भारतीयों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही. आकार पटेल का कहना था कि अमेरिका में भारतीय समुदाय एकरूप नहीं है. वहां बड़ी संख्या में ऐसे भारतीय भी हैं जो उदारवाद, मानवाधिकार, नागरिक अधिकार और बहुलतावादी राजनीति से जुड़े हुए हैं. निधिश त्यागी ने जोरान ममदानी जैसे नेताओं और उनके सामाजिक-राजनीतिक प्रतिनिधित्व का जिक्र करते हुए पूछा कि क्या यही दूसरा भारत है, जो हिंदुत्व की राजनीति से अलग अपनी जगह बना रहा है.
कार्यक्रम के संभावित स्वरूप पर भी सवाल उठे. आकार पटेल ने आशंका जताई कि ऐसा आयोजन काफी नियंत्रित और पूर्व-निर्धारित हो सकता है, जहां कठिन सवालों या असहमत आवाजों के लिए सीमित जगह हो. उन्होंने कहा कि न्यूयॉर्क जैसे शहर में विरोध और समर्थन का एक साथ मौजूद होना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक तस्वीर है.
बातचीत आगे भारत की वैश्विक छवि और मोदी सरकार के 12 वर्षों के रिकॉर्ड तक पहुंची. आकार पटेल ने सवाल उठाया कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद किसी सरकार को अपने दावों के साथ ठोस उपलब्धियां भी दिखानी पड़ती हैं. उन्होंने चीन की दीर्घकालिक औद्योगिक और तकनीकी योजनाओं का उदाहरण देते हुए भारत में "मेक इन इंडिया" जैसे अभियानों के परिणामों पर सवाल उठाया.
अंत में चर्चा इस सवाल पर आकर ठहरी कि क्या मोहन भागवत का न्यूयॉर्क कार्यक्रम भारत और आरएसएस की वैश्विक छवि को मजबूत करेगा, या फिर विरोध और समर्थन के बीच मौजूद वैचारिक विभाजन को और स्पष्ट करेगा. निधिश त्यागी ने कहा कि कार्यक्रम के बाद इस पूरे ग्लोबल आउटरीच और उसके भारत पर पड़ने वाले राजनीतिक असर को लेकर फिर चर्चा की जाएगी. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

