सहारनपुर में कोर्ट द्वारा ‘अवैध’ ठहराए जाने के महज़ तीन दिन बाद कैसे ढहाई गई 150 साल पुरानी मस्जिद
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिला कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित लगभग 115 से 150 साल पुरानी आजादी से पहले की मस्जिद को स्थानीय प्रशासन ने भारी सुरक्षा बल और बुलडोजर की मदद से ढहा दिया. यह कार्रवाई जिला अदालत द्वारा मस्जिद प्रबंधन समिति की अपील खारिज किए जाने के महज तीन दिन बाद की गई, जिससे राज्य में एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है.
‘द वायर’ में उमर राशिद की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, यह विवाद 2025 में बजरंग दल के एक कार्यकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के बाद शुरू हुआ. इसके आधार पर राजस्व विभाग की जांच के बाद सहारनपुर डीएम ने राज्य सरकार की ओर से मुकदमा दायर किया.
प्रशासन का तर्क था कि खसरा नंबर 539 स्थित जमीन राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी भूमि के रूप में दर्ज है, जिसे मूल रूप से विश्राम गृह के लिए बनाया गया था और बाद में अवैध रूप से धार्मिक ढांचे में बदल दिया गया. जुलाई में सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 315 वर्ग मीटर जमीन पर अनाधिकृत कब्जे के लिए 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाते हुए बेदखली का आदेश दिया था.
2 सितंबर को जिला जज सत्येंद्र कुमार ने इस आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि मस्जिद पक्ष जमीन के स्वामित्व और वैध कब्जे का कोई ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा. 5 सितंबर को सुबह प्रशासन ने बेदखली की कार्रवाई की और परिसर में किराए पर चल रहे उप-डाकघर को भी हटा दिया.
मस्जिद के मुतवल्ली और प्रबंधन समिति ने जो प्रमुख बिंदु रखे, वे इस प्रकार हैं: यह ढांचा 1911 से पूर्व का है और इसे धार्मिक स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के तहत संरक्षण प्राप्त है. जमीन मूल रूप से जमींदारी रिकॉर्ड (खेवट) में दर्ज थी और 1957 से नगर पालिका तथा वक्फ (संख्या 451) के रूप में पंजीकृत थी. डाक विभाग 1960 से मस्जिद को नियमित किराया दे रहा था. उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को इस मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया गया, जो वक्फ अधिनियम की धारा 85 का उल्लंघन है.
राजनीतिक प्रतिक्रिया और विवाद : मस्जिद ढहाए जाने के बाद विपक्षी दलों ने सरकार और प्रशासन की कड़ी आलोचना की. सपा सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें नजरबंद कर उच्च न्यायालय जाने से रोका गया. यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि 2027 के चुनावों से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने और ध्यान भटकाने के लिए यह कार्रवाई जल्दबाजी में की गई. एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि 100 साल से अधिक का निरंतर कब्जा 'यूज द्वारा वक्फ' और 'प्रतिकूल कब्जा' के सिद्धांत के तहत कानूनी रूप से संरक्षित है.
कांग्रेस व आप सांसद क्रमशः इमरान मसूद और संजय सिंह ने कहा कि खसरा रिकॉर्ड में जमीन आज भी वहीद खान और याकूब खान के नाम दर्ज है और वक्फ बोर्ड को बिना सुने एकपक्षीय कार्रवाई की गई. बसपा प्रमुख मायावती ने मस्जिदों को जल्दबाजी में ढहाने के चलन पर रोक लगाने की मांग की.
भाजपा विधायक राजीव गुंबर और प्रशासनिक अधिकारियों ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि प्रक्रिया पूरी तरह से कानूनी दायरों, उचित नोटिस अवधि और अदालती आदेशों के पालन के तहत पूरी की गई है. डीआईजी अभिषेक सिंह के अनुसार, शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियाती कदम उठाए गए थे.

