राजधानी में पाँच साल में इमारतें गिरने से 169 मौतें, देश भर में लगभग 8,000
‘द हिन्दू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार (6 सितंबर 2026) को पाँच मंज़िला इमारत गिरने की घटना, जिसमें सोमवार (7 सितंबर) सुबह तक छह लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, एक बार फिर इस बात की भयावह याद दिलाती है कि सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाली इमारतों पर कार्रवाई में कितनी ढील बरती जाती है.
सत्य निकेतन जैसी घटनाएँ लोगों का ध्यान इसलिए खींच लेती हैं क्योंकि इनमें मरने वालों की संख्या ज़्यादा होती है और यह हादसा उस इमारत में हुआ जहाँ छात्रों को पेइंग गेस्ट के तौर पर रहने की जगह दी जाती थी. लेकिन ऐसी कई अलग-अलग घटनाएँ, जो मिलकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दर्जनों और देश भर में कई सौ लोगों की जान लेती हैं, ज़्यादातर किसी की नज़र में ही नहीं आतीं.
सालाना 'भारत में दुर्घटनावश मौतें और आत्महत्याएँ' (एडीएसआई) रिपोर्टों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2020 से 2024 के बीच पाँच वर्षों में देश भर में इमारतें गिरने से कुल 7,874 लोग मारे गए. इसी अवधि में दिल्ली में 169 मौतें दर्ज हुईं.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की सबसे ताज़ा उपलब्ध रिपोर्ट, एडीएसआई 2024, बताती है कि देश भर में जहाँ इन मौतों में मामूली गिरावट आई है, वहीं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 2020 के बाद से मौतें बढ़ी हैं.
एडीएसआई में "ढाँचों के गिरने" से हुई मौतों की पाँच उप-श्रेणियाँ हैं—"रिहायशी मकान/आवासीय इमारत का गिरना", "सरकारी/व्यावसायिक इमारत का गिरना", "बाँध का गिरना", "पुल का गिरना" और "अन्य". इस रिपोर्ट में जिन आँकड़ों की बात की गई है, उनमें बाँध और पुल गिरने की श्रेणियों में दर्ज संख्याएँ शामिल नहीं हैं.
देश के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में 2024 में इमारतें गिरने से सबसे ज़्यादा 223 मौतें दर्ज हुईं. इसके बाद ज़्यादा शहरीकृत और (2011 की जनगणना के मुताबिक़) आबादी के लिहाज़ से दूसरे नंबर के राज्य महाराष्ट्र में 220 मौतें हुईं.
2024 में दिल्ली में हुई मौतों की संख्या (42) देश में 12वें नंबर पर थी, लेकिन राजधानी में हर साल दोहराई जा रही इन मौतों को उसकी आबादी के अनुपात में देखा जाए तो तस्वीर ज़्यादा चिंताजनक है. एडीएसआई रिपोर्टों के मध्य-वर्ष आबादी अनुमानों के आधार पर निकाले गए आँकड़े बताते हैं कि प्रति दस लाख आबादी पर इमारतें गिरने से हुई मौतों के मामले में दिल्ली 2022, 2023 और 2024 में देश में दूसरे या तीसरे स्थान पर रही.
2025 की एडीएसआई रिपोर्ट अभी आनी बाक़ी है, लेकिन मीडिया में आई ख़बरों के संकलन से पता चलता है कि जनवरी 2025 से अब तक 20 घटनाओं में कम से कम 70 लोगों की जान जा चुकी है. (मूल रिपोर्ट में दिया गया नक़्शा 2024 से अब तक मीडिया में दर्ज ऐसी घटनाएँ दिखाता है, जिनमें रविवार का सत्य निकेतन हादसा भी शामिल है.)
जन आक्रोश भड़काने वाली घटनाओं के बाद ज़्यादातर सरकारी एजेंसियाँ जिस अनुमानित जल्दबाज़ी के साथ काम करती हैं, वैसी ही प्रतिक्रिया दिल्ली नगर निगम की भी रही—सत्य निकेतन हादसे के बाद उसने कहा है कि वह सभी अवैध पाँच मंज़िला और उससे ऊँची इमारतों को "तत्काल" सील करेगा.
लेकिन इस रिपोर्ट में जिन आँकड़ों की चर्चा की गई है, वे बताते हैं कि इसके पीछे की व्यवस्थागत समस्या के लिए सोची-समझी दीर्घकालिक रणनीतियाँ चाहिए—ऐसी रणनीतियाँ जो सस्ते आवास की बढ़ती ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए इन टाली जा सकने वाली मौतों को ख़त्म करें.

