जीडीपी और बाक़ी आँकड़ों के बीच बहुत बड़ा अंतर्विरोध है: पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग

‘द हिन्दू’ में प्रकाशित सुभाष चंद्र गर्ग की लेख के मुताबिक, भारत के ताज़ा जीडीपी अनुमानों ने सरकारी आँकड़ों की विश्वसनीयता, कार्यप्रणाली, आँकड़ों की गुणवत्ता और आर्थिक वृद्धि की व्याख्या पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है. सरकार ने संशोधित आँकड़ों का बचाव बेहतर कवरेज और कार्यप्रणाली में बदलाव का हवाला देकर किया है, लेकिन पारदर्शिता और अर्थव्यवस्था के आकार में हुए तीखे संशोधनों को लेकर सवाल बने हुए हैं. द हिंदू को दिए अपने लिखित जवाबों में पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने सरकार की इस सफ़ाई, आँकड़ों की गुणवत्ता पर अपनी चिंताओं, देश की सांख्यिकीय जाँच-पड़ताल में कथित राजनीतिक दख़ल, नीतिगत नतीजों और भारत के विकास-आख्यान से जुड़ी विश्वसनीयता की चुनौती पर बात की है.

भारत में परंपरागत रूप से नई जीडीपी शृंखला को पुरानी शृंखला से स्प्लाइसिंग, पुनर्आकलन और बैक-सीरीज़ बनाकर जोड़ा जाता रहा है. जनता से वृद्धि दर मान लेने के लिए कहने से पहले एमओएसपीआई 2011-12 और 2022-23 की शृंखलाओं के बीच एक पारदर्शी पुल क्यों न बनाए? उस पुल में क्या दिखना चाहिए?

बिल्कुल जायज़ माँग है. एमओएसपीआई को 2011-12 से 2021-22 तक की बैक-सीरीज़ के आँकड़े जारी करने की समय-सारिणी घोषित करनी चाहिए. ऐसा लगता है कि सरकार इस बारे में बहुत गंभीर नहीं है, क्योंकि अब तक ऐसा कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया है.

वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही की जीडीपी में हुए लगभग 6 लाख करोड़ रुपये के संशोधन का पारदर्शी ब्योरा जारी करके सरकार इस पूरे विवाद को पहले ही रोक सकती थी. ऐसा क्यों नहीं किया गया, और आपके ख़याल से उस ब्योरे में क्या सामने आता?

6 लाख करोड़ रुपये की नॉमिनल जीडीपी में कमी का सवाल 2022-23 से 2024-25 तक जाता है. सिर्फ़ 2024-25 के लिए ही जीडीपी 12.70 लाख करोड़ रुपये तक घटा दी गई है. सरकार ने यह नहीं बताया कि यह कटौती क्यों करनी पड़ी. उसने इसे इस आम दलील की आड़ में दबा देने की कोशिश की है कि यह नई कार्यप्रणाली, व्यापक कवरेज, नए सूचकांक वग़ैरह से पैदा हुए नए आँकड़ों की वजह से है. यह दलील बेहद कमज़ोर है, क्योंकि बेहतर कवरेज से नॉमिनल जीडीपी बढ़ती है, घटती नहीं. सरकार ने ब्योरा क्यों नहीं दिया, इसकी वजह शायद यही है कि उसे इसकी व्याख्या करने में भारी मुश्किल पेश आ रही है. मेरे आकलन में इसकी सिर्फ़ दो ही व्याख्याएँ हो सकती हैं. एक, सिस्टम से गड़बड़ी हुई, जिससे दोहरी गिनती, गिनती की ग़लतियों वग़ैरह के चलते जीडीपी बढ़ी-चढ़ी दिखी. दूसरी, ऊँची वृद्धि दर का दावा करने के लिए जीडीपी को जान-बूझकर बढ़ाकर दिखाया गया और जब काम निकल गया तो नई शृंखला का मौक़ा लेकर उसे चुपचाप घटा दिया गया. वैसे, जीडीपी में यह कमी आगे भी असल से ऊँची वृद्धि दर दिखाने में मदद करती है.

अगर अर्थशास्त्रियों, रेटिंग एजेंसियों और फ़ंड मैनेजरों ने भारत की वृद्धि की अपनी समझ पुराने जीडीपी अनुमानों के इर्द-गिर्द बनाई थी, तो एक बड़े सांख्यिकीय संशोधन से अर्थव्यवस्था का मापा गया आकार और उसकी दिशा बदल जाने पर ज़िम्मेदारी किसकी है?

मुझे नहीं लगता कि सरकार में कोई ज़िम्मेदारी लेता है. नुक़सान कारोबारियों और निवेशकों को उठाना पड़ता है, रुपये के अवमूल्यन और शेयर बाज़ार से कम या नकारात्मक रिटर्न की शक्ल में.

अगर जीडीपी डिफ्लेटर आख़िरकार क़ीमतों का ही एक पैमाना है, तो आपको कितना भरोसा है कि भारत का मौजूदा क़ीमत-ढाँचा उन क़ीमतों को पकड़ता है जो उत्पादक असल में चुकाते हैं—ख़ासकर सेवाओं, अनौपचारिक गतिविधि और मूल्य-वर्धन शृंखलाओं में—बजाय उन सूचकांकों के जिन्हें देखना आसान है? क्या डिफ्लेटर आँकड़ों के भीतर से संगत होते हुए भी कंपनियों और परिवारों की भोगी हुई महँगाई को व्यवस्थित रूप से कम करके आँक सकता है?

डिफ्लेटर मापने में अंतरराष्ट्रीय स्तर की बेहतरीन पद्धतियाँ अपनाने की दिशा में कुछ स्वागतयोग्य हलचल तो है, लेकिन मौजूदा हालात ने एक ऐसा नतीजा सामने रखा है जिसका मेल बैठता नहीं दिखता. जब उपभोक्ता महँगाई 4% से ऊपर है और उत्पादक महँगाई 9% है, तो बाक़ी वस्तुओं और सेवाओं में (जिनका ब्योरा अभी सार्वजनिक होना बाक़ी है) इतनी नकारात्मक या कम महँगाई हो ही नहीं सकती कि पहली तिमाही में डिफ्लेटर 2.5% पर आ जाए. भीतरी असंगति निश्चित रूप से गंभीर है, और इसकी पारदर्शी व्याख्या ज़रूरी है.

अगर डबल डिफ्लेशन दुनिया भर में स्वीकृत पद्धति है, तो बहस पद्धति के सिद्धांत पर होनी चाहिए या इस पर कि भारत के पास इसे सांख्यिकीय भरोसे के साथ लागू करने लायक़ बारीक और विश्वसनीय उत्पादन, इनपुट और क़ीमत के आँकड़े हैं भी या नहीं?

शेयर बाज़ारों में सीएएस की तरह, हर अंतरराष्ट्रीय बेहतरीन पद्धति को भारत में आसानी से और बिना तकलीफ़ के लागू नहीं किया जा सकता. इसके लिए सिस्टम को बारीकी से तैयार करना होगा और भरोसेमंद उत्पादन, इनपुट तथा क़ीमत के आँकड़े खड़े करने होंगे. जब तक नई पद्धति जमकर विश्वसनीय आँकड़े और नतीजे देने न लगे, तब तक दोनों व्यवस्थाएँ साथ-साथ चलाना और पुराने दौर वाला डिफ्लेटर इस्तेमाल करना समझदारी होगी.

क्या डबल डिफ्लेशन विनिर्माण की माप की समस्या हल कर देता है—या अगर आउटपुट और इनपुट क़ीमत सूचकांक ख़ुद ही ठीक से नहीं मापे गए हैं तो यह एक नई समस्या खड़ी कर सकता है? किस अनुभवजन्य साक्ष्य से आप मानेंगे कि नया क़ीमत-ढाँचा विनिर्माण जीवीए को सचमुच बेहतर कर रहा है, न कि उसे माप की ग़लती के प्रति और ज़्यादा संवेदनशील बना रहा है?

मुझे नहीं लगता कि इसने विनिर्माण डिफ्लेटर की माप का मामला संतोषजनक ढंग से हल किया है. दिलचस्प बात यह है कि अगर इसे कुछ चुनिंदा क्षेत्रों पर ही लागू किया जाए और बाक़ी के लिए छोड़ दिया जाए, तो कुल नतीजे विकृत हो सकते हैं, क्योंकि जिन दूसरे क्षेत्रों का उत्पाद विनिर्माण के लिए इनपुट बनता है, उनकी इनपुट महँगाई सही तरीक़े से दर्ज नहीं होगी.

आर्थिक आकलन उतना ही भरोसेमंद होता है जितने उसके पीछे के आँकड़े. पीछे मुड़कर देखें तो क्या आप मानेंगे कि असली कमज़ोरी जीडीपी के फ़ॉर्मूले में नहीं, बल्कि इसमें थी कि भारत ने एक लगातार जटिल और अनौपचारिक होती अर्थव्यवस्था को मापने के लिए ज़रूरी आँकड़ा-ढाँचे में समय रहते निवेश नहीं किया?

मेरा मानना है कि हमारा सिस्टम आज भी भरोसेमंद आँकड़े दे सकता है, बशर्ते नतीजों को किसी ख़ास दिशा में ले जाने का राजनीतिक हित न हो. हाँ, इसके भारी आधुनिकीकरण की ज़रूरत है और यह भी ज़रूरी है कि आँकड़े जुटाने, उनका विश्लेषण करने और डेटा-सेट तैयार करने में सांख्यिकीविद् राजनीतिक नियंत्रण से आज़ाद हों.

तेज़ वृद्धि वाली अर्थव्यवस्था और कमज़ोर घरेलू धारणा साथ-साथ रह सकती हैं, लेकिन भारत के असंगठित क्षेत्र के आकार को देखते हुए सांख्यिकी एजेंसी को यह फ़र्क़ कैसे समझाना चाहिए कि मापी गई जीडीपी वृद्धि मज़बूत है जबकि घरेलू आय, रोज़गार, उपभोग और आर्थिक धारणा के संकेत कमज़ोर हैं?

मुझे लगता है कि जीडीपी और बाक़ी आँकड़ा शृंखलाओं के बीच बहुत बड़ा अंतर्विरोध है. सामान्य हालात में यह कभी-कभार बाहरी वजहों से हो सकता है. लेकिन अगर कुछ आँकड़ा शृंखलाओं के नतीजे राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो जाएँ और सिस्टम उन नतीजों को पैदा करने के लिए जूझने लगे, तो इन असंगतियों को असाधारण परिस्थितियाँ बताकर टाला नहीं जा सकता.

जीडीपी वृद्धि मापते हुए क्या हम आर्थिक कल्याण माप रहे होते हैं—और अगर नहीं, तो अर्थव्यवस्था के अच्छा प्रदर्शन करने का नतीजा निकालने से पहले जीडीपी के साथ कौन से पूरक चर रखे जाने चाहिए? अगर जीडीपी 7.8% की दर से बढ़ रही है, लेकिन परिवारों की वास्तविक क्रय शक्ति और रोज़गार कहीं धीमी रफ़्तार से बढ़ रहे हैं, तो क्या कोई अर्थशास्त्री इसे तेज़ वृद्धि वाली अर्थव्यवस्था कहेगा?

हम जीडीपी का तीसरा पाया—आय वाला पक्ष—तैयार ही नहीं करते, यानी जीडीपी के मूल्य-वर्धन के तीन प्राप्तकर्ताओं के बीच आय का बँटवारा: श्रम (वेतन और मज़दूरी), कॉरपोरेट (मुनाफ़ा) और सरकार (उत्पाद कर). जब तक यह नहीं होता, आर्थिक कल्याण को बहुत मोटे तौर पर ही मापा जा सकता है—प्रति व्यक्ति जीडीपी की वृद्धि के रूप में. भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी बहुत कम है. तर्क कहता है कि हमें बहुत ऊँची दर (9-10%) से बढ़ना चाहिए, आय का पुनर्वितरण करना चाहिए (धनवानों पर कर लगाकर और आयकर का दायरा बढ़ाकर), और सरकार के बेहद अनुत्पादक निवेश ख़र्चों में कटौती करनी चाहिए, ताकि जीडीपी की वृद्धि लोगों की तरफ़ मुड़े.

एमओएसपीआई और वित्त मंत्रालय के जवाब तकनीकी रूप से बचाव-योग्य लगते हैं, लेकिन क्या वे विश्वसनीयता की खाई पाटते हैं? आपकी नज़र में उस खाई को असल में क्या भरेगा?

जीडीपी में कटौती के मुद्दे पर दिया गया जवाब महज़ सरकारी भाषा और गोलमोल बात है. उससे कुछ भी साफ़ नहीं होता.

आपकी दलील को कौन-सी बात ग़लत साबित करेगी? किस सबूत से आप 2022-23 की जीडीपी शृंखला के बारे में अपना मन बदलेंगे—और इसके उलट, किस सबूत से आप मानेंगे कि आधिकारिक 7.8% की वृद्धि का आँकड़ा काफ़ी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है?

जीडीपी में कटौती/नुक़सान असली है और उसे ख़ुद सरकार ने ही सामने रखा है. कोई भी चीज़ मेरी दलील को ग़लत साबित नहीं कर सकती. अगर सरकार के अपने कहे मुताबिक़ 2025 की पहली तिमाही में जीडीपी 86 लाख करोड़ रुपये थी, तो जीडीपी वृद्धि नॉमिनल रूप में 2.6% और वास्तविक रूप में लगभग शून्य थी. जीडीपी के इस नुक़सान की व्याख्या सिर्फ़ दो में से एक तरीक़े से हो सकती है—या तो यह सामने लाया जाए कि आँकड़ा बढ़ाकर दिखाया गया था, या यह माना जाए कि पिछले वर्षों की वृद्धि को कृत्रिम रूप से ऊँचा दिखाने के लिए ऐसा किया गया था.

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