हर मौसम का एक 'गुंडा': बंगाल ने 1923 के औपनिवेशिक कानून को 'जन सुरक्षा' के नाम पर कैसे लौटाया

‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित झूमा सेन की रिपोर्ट के मुताबिक,  पश्चिम बंगाल में 13 जुलाई 2026 से लागू "पश्चिम बंगाल जन सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधि नियंत्रण अधिनियम, 2026" को लागू हुए महज 12 दिन हुए थे कि मुख्यमंत्री अधिकारी ने विधानसभा में इसके पहले इस्तेमाल की जानकारी दे दी. 24 जुलाई को कोलकाता के धर्मतला में परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शन के बाद करीब 70 लोगों की "पहचान" की गई. मुख्यमंत्री ने दावा किया कि वे "छात्र नहीं थे". सात एफआईआर दर्ज की गईं और इनमें नए कानून की धाराएं भी जोड़ दी गईं.

अगले दिन पुलिस ने 14 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें 13 मुस्लिम थे. अधिकारी ने हिंसा के लिए "इस्लामी कट्टरपंथियों" और संभावित "विदेशी समर्थन" को जिम्मेदार बताया. उन्होंने कहा कि आरोपियों को ऐसी सजा मिलेगी, जिसे उनकी "अगली तीन पीढ़ियां याद रखेंगी". यानी जिस कानून को अपराधियों और गिरोहों से निपटने के औजार के रूप में पेश किया गया था, उसका पहला इस्तेमाल प्रदर्शन में शामिल लोगों पर हुआ.

इस कानून को पढ़ते हुए 1923 का औपनिवेशिक "गुंडा एक्ट" याद आता है. ब्रिटिश सरकार ने बंगाल गुंडा अधिनियम, 1923 के जरिए कलकत्ता पुलिस कमिश्नर को किसी व्यक्ति को "गुंडा" मानकर बिना मुकदमे शहर से बाहर करने की शक्ति दी थी. खास बात यह थी कि कानून ने "गुंडा" की स्पष्ट परिभाषा ही नहीं दी थी. एक सदी बाद एक निर्वाचित सरकार उसी सोच से मिलता-जुलता औजार "जन सुरक्षा" के नाम पर लेकर आई है.

नए कानून की धारा 2(ए) में "असामाजिक गतिविधि" की परिभाषा इतनी व्यापक है कि "आम जनता या उसके किसी हिस्से में भय, खतरा या असुरक्षा" पैदा करने वाली गतिविधियां इसके दायरे में आ सकती हैं. धारा 2(डी) "गुंडा" की श्रेणी में ऐसे व्यक्ति को भी शामिल करती है, जो "आम तौर पर समुदाय के लिए खतरनाक और दुस्साहसी माना जाता हो". यहां किसी अपराध में दोषसिद्धि से ज्यादा "प्रतिष्ठा" या धारणा महत्वपूर्ण हो जाती है.

यही व्यवस्था सामाजिक पूर्वाग्रहों को कानूनी शक्ति देने का खतरा पैदा करती है. जाति, वर्ग, धर्म या प्रवासी पहचान के आधार पर पहले से मौजूद धारणाएं तय कर सकती हैं कि कौन "खतरनाक" माना जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने 1961 के बलदेव प्रसाद मामले में अस्पष्ट "गुंडा" परिभाषा वाले कानून पर गंभीर आपत्ति जताई थी.

कानून का दूसरा बड़ा सवाल निवारक हिरासत का है. सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में "कानून-व्यवस्था" और "लोक व्यवस्था" के बीच अंतर स्पष्ट कर चुका है. राम मनोहर लोहिया मामले से लेकर अमीना बेगम मामले तक अदालत ने कहा कि निवारक हिरासत असाधारण उपाय है और सामान्य आपराधिक कानून के विकल्प के रूप में इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. लेकिन बंगाल का नया कानून "भय" और "असुरक्षा" जैसे व्यापक आधारों को हिरासत का रास्ता देता है.

इसके साथ पारित "पश्चिम बंगाल लोक व्यवस्था अनुरक्षण संशोधन अधिनियम, 2026" प्रदर्शन, दंगे या गैरकानूनी जमावड़े के दौरान संपत्ति को हुए नुकसान की वसूली के लिए दावा आयोग बनाने का प्रावधान करता है. आयोजकों, वित्तपोषकों, उकसाने वालों और रसद सहायता देने वालों तक पर आर्थिक जिम्मेदारी डाली जा सकती है. भुगतान न होने पर संपत्ति कुर्क और नीलाम की जा सकती है. आयोग के फैसले के खिलाफ अदालत में अपील का प्रावधान नहीं होना इसे और गंभीर बनाता है.

सबसे महत्वपूर्ण सवाल इस कानून के राजनीतिक इस्तेमाल का है. सत्ता परिवर्तन के कुछ ही हफ्तों बाद लाए गए इस कानून को मुख्यमंत्री स्वयं पूर्ववर्ती कम्युनिस्ट और तृणमूल शासन के कथित "गुंडों" से निपटने का औजार बता चुके हैं. जब "हिंसक प्रदर्शन" को "असामाजिक गतिविधि" के दायरे में रखा जाता है, तो इसका असर छात्र आंदोलनों, ट्रेड यूनियनों, पत्रकारों और सरकार विरोधी प्रदर्शनों तक पहुंच सकता है.

संविधान नागरिक को अधिकारों से लैस व्यक्ति मानता है, जिसे दंडित करने से पहले राज्य को उसका अपराध साबित करना होता है. लेकिन ऐसा कानून नागरिक को पहले संदिग्ध मानने और उसकी "प्रतिष्ठा" के आधार पर हिरासत, निष्कासन या संपत्ति से वंचित करने का रास्ता खोलता है. असली कसौटी यही है कि "खतरनाक गुंडा" बताए गए व्यक्ति में भी हम उस नागरिक को पहचान पाते हैं या नहीं, जिसकी रक्षा के लिए संविधान बनाया गया था.

(झूमा सेन अधिवक्ता हैं और कलकत्ता हाई कोर्ट में वकालत करती हैं.)

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