टी. एस. सुधीर | कमेटी पर कमेटी, सिफारिश पर सिफारिश: परीक्षा व्यवस्था बदले बिना कैसे रुकेगा पेपर लीक?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक नई समिति का गठन किया है, जिसमें आईआईटी मद्रास के निदेशक, इसरो के पूर्व अध्यक्ष और इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक भी शामिल हैं. इस समिति को कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) और पेन-पेपर, दोनों तरह की परीक्षाओं के लिए पेपर लीक से सुरक्षित व्यवस्था तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है.
इतने बड़े और प्रतिष्ठित नामों को शामिल करने का मकसद परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करना है. लेकिन सच कहें तो यह मामला "कमेटी पर कमेटी, रिकमेंडेशन पर रिकमेंडेशन" वाला बन गया है.
क्योंकि दिसंबर 2025 में दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसद की शिक्षा संबंधी स्थायी समिति ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं की खामियों की जांच की थी और जरूरी सुधारों के सुझाव दिए थे.
इससे पहले 2024 में नीट पेपर लीक के बाद गठित के. राधाकृष्णन समिति ने भी कई सिफारिशें दी थीं. इन सिफारिशों को न तो नीट 2025 में लागू किया गया और न ही नीट 2026 में. अब 2026 में नीट का पेपर फिर लीक होने के बाद इन सिफारिशों को 2027 में आंशिक रूप से लागू करने की बात कही जा रही है. संयोग से के. राधाकृष्णन भी इसरो के अध्यक्ष रह चुके हैं.
मेरी राय में, भारत को अब सबसे पहले यह गंभीरता से देखने की जरूरत है कि इतनी बड़ी संख्या में प्रवेश परीक्षाओं की आखिर जरूरत क्या है और ये हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था को किस तरह कमजोर कर रही हैं. आज स्कूल, हर शहर और कस्बे में तेजी से फैलते कोचिंग सेंटरों के सामने गरीब रिश्तेदार बनकर रह गए हैं. खासकर 11वीं और 12वीं कक्षा के स्तर पर यह व्यवस्था छात्रों का तनाव बढ़ाने वाली बन गई है.
मिसाल के तौर पर, हमें सीयूईटी की जरूरत ही क्यों है? इसने 12वीं बोर्ड परीक्षा के अंकों को लगभग बेकार बना दिया है. अगर विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए सीयूईटी ही सबसे बड़ी कसौटी है, तो फिर छात्रों को भारी तनाव देने वाली बोर्ड परीक्षा क्यों कराई जाए? डमी स्कूल तेजी से फल-फूल रहे हैं और छात्र नियमित स्कूली शिक्षा से बाहर हो रहे हैं. +2 स्तर की स्कूली शिक्षा एक मजाक बनकर रह गई है.
इन तमाम प्रवेश परीक्षाओं ने कोचिंग फीस के रूप में परिवारों का खर्च बढ़ाया है और एक दिन की परीक्षा पर सब कुछ निर्भर होने का दबाव भी पैदा किया है. कोटा जैसे शहर तनाव और अवसाद के पर्याय बन चुके हैं. इस पूरी व्यवस्था ने एक ताकतवर कोचिंग माफिया खड़ा कर दिया है, जो छात्रों और अभिभावकों को अपने शिकंजे में रखता है.
प्रवेश परीक्षाएं आज हजारों करोड़ रुपये के कारोबार का अवसर बन चुकी हैं. जरूरत पहले उस व्यवस्था में सुधार की है, जो स्कूली शिक्षा को मजबूत करे और यह बदले कि हमारे छात्रों को पढ़ाया कैसे जाता है.
ब्रिटिश शासन से विरासत में मिली हमारी शिक्षा व्यवस्था आज भी समझने से ज्यादा रटने पर जोर देती है. हम अपने बच्चों को उस दुनिया के लिए शायद ही तैयार कर पाते हैं, जिसमें उन्हें आगे कदम रखना है. कोचिंग सेंटरों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को ऐसी प्रणाली में बदल दिया है, जो आपको ज्यादा जागरूक और समझदार बनाने के बजाय केवल परीक्षा पास करना सिखाती है.
अगर नीलेकणी समिति भी उससे पहले की दो समितियों की रिपोर्टों पर सिर्फ "कंट्रोल सी + कंट्रोल वी" करने तक सीमित रह जाती है, तो उसका कोई खास मतलब नहीं होगा.
(टी. एस. सुधीर पत्रकार, लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर हैं.)

