राजीव कुमार | चौकन्नी निगरानी की बजाय संसद का धृतराष्ट्र जैसा बर्ताव
कई बार संसद ऐसी संस्था कम दिखाई देती है जो कार्यपालिका से जवाब मांगती है और धृतराष्ट्र जैसी अधिक, जो मोहवश अपने पुत्रों की हर मांग को आंख मूंदकर स्वीकार करती है.
टेलीविजन पर संसद की कार्यवाही देखना और संसद के भीतर बैठकर उसे देखना दो बिल्कुल अलग अनुभव हैं. भीतर से देखने पर तस्वीर कहीं अधिक जटिल और कई बार काफी दिलचस्प भी दिखाई देती है. 36 वर्षों तक पुलिस सेवा में रहने के बाद जब संसद में पहुंचा, तो मेरा पहला संसदीय सत्र एक अलग तरह की सीख लेकर आया.
हाल के मानसून सत्र में दोनों सदनों की बैठकें 19 दिनों तक चलीं और इस दौरान बार-बार व्यवधान देखने को मिला. कई विधेयक सदस्यों की सार्थक भागीदारी के बिना पारित हो गए और प्रश्नकाल अपने निर्धारित समय के केवल एक हिस्से तक ही चल सका.
हम अक्सर लोकतंत्र के चार स्तंभों की बात करते हैं - विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस. संविधान ने इनके बीच कोई स्पष्ट पदानुक्रम तय नहीं किया है. लेकिन भारत ने संसदीय शासन प्रणाली अपनाई है, इसलिए संसद को इन संस्थाओं में बराबरों में प्रथम स्थान हासिल है. संसद के अपने पहले सत्र में शामिल होने के बाद यह सवाल उठता है कि कहीं यह स्थिति धीरे-धीरे उलट तो नहीं गई है.
सरकार सदन में विधेयक पेश करती है, सत्ता पक्ष उसका समर्थन करता है, विपक्ष विरोध करता है और नतीजा बहस शुरू होने से पहले ही लगभग तय दिखाई देता है. कार्यपालिका का जन्म संसद से होता है और उसे संसद के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए. लेकिन अब संबंध कई बार इसके उलट दिखाई देने लगा है. संसद ऐसी संस्था कम नजर आती है जो कार्यपालिका से जवाब मांगती है और धृतराष्ट्र जैसी अधिक, जो मोहवश अपने पुत्रों की हर मांग को आंख मूंदकर स्वीकार करती है.
बहुमत वाली सरकार को निश्चित रूप से अपना विधायी कार्यक्रम पारित करने का अधिकार है. लेकिन क्या संसद का उद्देश्य केवल संख्यात्मक मंजूरी देना है? कितनी बार ऐसा होता है कि सदस्यों की बात सुनने के बाद कोई मंत्री खड़ा होकर कहे - "यह उचित बात है. हम विधेयक में संशोधन करेंगे."
इसका एक छोटा अनुभव खुद हुआ. प्रश्नकाल के दौरान बढ़ते घरेलू हवाई किरायों में किसी ऊपरी सीमा के अभाव को लेकर सवाल तैयार किया था. सरकार खुद Uber, Rapido, Yatri Sathi जैसी ऐप आधारित कैब सेवाओं में डायनेमिक प्राइसिंग की सीमा तय करती है. लेकिन मांग बढ़ने पर एयरलाइन टिकटों की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है. मार्च 2026 में हवाई किरायों पर लगी सीमा हटा दी गई थी.
सवाल सीधा था - अगर कैब एग्रीगेटर को असीमित सर्ज प्राइस वसूलने की अनुमति नहीं दी जा सकती, तो एयरलाइन यात्रियों के लिए ऐसी ही सुरक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए? यह सवाल पूछा ही नहीं जा सका, जबकि इसे तारांकित प्रश्नों की सूची में जगह मिल चुकी थी. कई बार संसद जो सवाल नहीं पूछ पाती, वही उसकी स्थिति के बारे में बहुत कुछ बता देते हैं.
हालांकि दो विधेयकों पर बोलने का अवसर मिला.
पहला था सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम संशोधन विधेयक, 2026. परीक्षा का पेपर लीक होना किसी युवा से उसके अवसर को छीनने जैसा है. चोरी सिर्फ प्रश्नपत्र की नहीं होती, बल्कि उसके समय, अवसर और व्यवस्था की निष्पक्षता पर भरोसे की भी होती है.
सरकार का समाधान सजा को कठोर बनाने पर केंद्रित था - लंबी कैद, अधिक जुर्माना और सख्त समयसीमा. लेकिन पुलिस सेवा के लंबे अनुभव और अपराधशास्त्र की समझ से एक बात स्पष्ट है कि अपराध रोकने में सजा की मात्रा से ज्यादा उसकी निश्चितता महत्वपूर्ण होती है. पेपर लीक करने वाला गिरोह अपराध करने से पहले दंड की पूरी सूची नहीं देखता. वह यह गणना करता है कि पकड़े जाने की संभावना कितनी है.
इससे भी अधिक चिंता की बात यह थी कि संसद इस समस्या का पहले ही विस्तार से अध्ययन कर चुकी है. एक स्थायी समिति ने बाहरी वेंडरों पर निर्भरता, एक जगह ब्लैकलिस्ट हुई कंपनियों को दूसरी जगह काम मिलने और अधिक पारदर्शिता की जरूरत जैसे मुद्दों की ओर ध्यान दिलाया था. लेकिन उसकी कई सिफारिशें लागू नहीं की गईं.
यदि संसदीय समितियां किसी विषय की महीनों तक जांच करती हैं, तो कार्यपालिका को यह बताना चाहिए कि महत्वपूर्ण सिफारिशों को क्यों खारिज किया गया या लागू क्यों नहीं किया गया. वरना संसदीय समितियों की समीक्षा प्रक्रिया अपना अर्थ खो देती है.
नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में टास्क फोर्स बनाए जाने का स्वागत किया गया. लेकिन सवाल यह था कि सरकार उसकी सिफारिशों का इंतजार किए बिना संशोधन विधेयक क्यों ले आई? यदि टास्क फोर्स बाद में ऐसे बदलाव सुझाती है जिनके लिए कानून में संशोधन जरूरी हो, तो क्या सरकार फिर नया संशोधन विधेयक लाएगी?
बहस के दौरान सत्ता पक्ष के सदस्यों से अपील की गई कि कुछ देर के लिए सरकार की भूमिका को अलग रखकर खुद को विधायिका का सदस्य समझें. लेकिन ऐसा नहीं हो सका. जब मामला हमारे बेटे-बेटियों के भविष्य से जुड़ा हो, तब भी यदि हम दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर नहीं सोच सकते, तो फिर कब सोचेंगे?
दूसरा विधेयक सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश संख्या संशोधन विधेयक, 2026 था, जिसके जरिए सुप्रीम कोर्ट में स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई गई. लेकिन इसके साथ न्याय वितरण व्यवस्था की खराब स्थिति पर भी ध्यान देने की जरूरत है.
पुलिस सेवा के दौरान बार-बार ऐसे लोग थानों में आते देखे गए जो चेक बाउंस, मकान मालिक-किरायेदार विवाद और अन्य दीवानी मामलों को लेकर परेशान होते थे. वे थाने इसलिए नहीं आते कि उन्हें पुलिस पर बहुत भरोसा है, बल्कि इसलिए आते हैं क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया पर उनका भरोसा उससे भी कम होता है.
व्यवस्था में तत्काल सुधार की जरूरत है. भारत को केवल अधिक जजों की जरूरत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की न्यायाधीशों की नियुक्ति में निर्णायक भूमिका है, जबकि संविधान में "कॉलेजियम" शब्द तक नहीं है. भारत को तेज, सस्ता और आसानी से उपलब्ध न्याय चाहिए.
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर कोई समझौता नहीं हो सकता. लेकिन न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायाधीशों की नियुक्ति, न्यायिक प्रशासन तथा न्याय वितरण में न्यायपालिका की सर्वोच्च भूमिका एक ही बात नहीं है. नियुक्तियों और प्रशासन में लगभग पूर्ण न्यायिक प्रधानता पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े सवाल भी खड़े करती है.
इस समय एक असहज संतुलन बना हुआ है. न्यायपालिका स्वाभाविक रूप से अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करती है. लेकिन न्याय मिलने की बेहद धीमी गति को उतनी ही गंभीरता से नहीं लिया जाता. कार्यपालिका समय-समय पर इसका विरोध करती है. संसद, जिसे इन मुद्दों पर लोकतांत्रिक चर्चा का मंच उपलब्ध कराना चाहिए, काफी हद तक किनारे खड़ी दिखाई देती है. यहीं से लोकतंत्र की तस्वीर उलटी दिखाई देने लगती है.
लोकतंत्र के चार स्तंभों पर लौटें तो कार्यपालिका को शासन करना है, न्यायपालिका को संविधान की रक्षा करनी है और प्रेस को सभी से सवाल पूछने हैं. लेकिन संसद को विचार-विमर्श करना है, जांच-पड़ताल करनी है और सभी को जवाबदेह बनाना है.
संसद के पास वह लोकतांत्रिक वैधता है जो किसी दूसरी संस्था के पास नहीं है - नागरिक अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए यहां बोलते हैं. इस वैधता को महज सिर गिनने की प्रक्रिया में बदल देना लोकतंत्र को कमजोर करना है.
संसद का एक ऐसा पक्ष भी है जिसे कैमरे शायद ही कभी दिखाते हैं. सदन के भीतर एक-दूसरे पर तीखे हमले करने वाले सांसद संसदीय कैंटीन में अक्सर एक ही मेज पर बैठकर मजाक करते और अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों की समस्याओं पर चर्चा करते मिल जाते हैं.
इसे पाखंड नहीं कहा जा सकता. राजनीति में असहमति जरूरी है, लेकिन दुश्मनी जरूरी नहीं. फिर सवाल यह है कि अगर हम एक कप कॉफी पर एक-दूसरे की बात सुन सकते हैं, तो सदन के भीतर ऐसा करना इतना मुश्किल क्यों हो जाता है?
एक सत्र के बाद निश्चित रूप से यह दावा नहीं किया जा सकता कि सभी सवालों के जवाब मिल गए हैं. लेकिन कई नए सवाल जरूर सामने आए हैं. एक नए सांसद के लिए शायद यह शुरुआत बुरी नहीं है.
(राजीव कुमार राज्यसभा के सदस्य हैं. मूल लेख अंग्रेजी में यहां पढ़ा जा सकता है.)

