चौराहे पर बदरुद्दीन अजमल: असम के मुस्लिमों का मोहभंग, एआईयूडीएफ के लिए अग्निपरीक्षा

असम के विवादित राजनीतिक परिदृश्य में, बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ अल्पसंख्यक वोटों पर अपनी पकड़ के कारण एक प्रमुख राजनीतिक खिलाड़ी रही है. हालांकि, आगामी विधानसभा चुनावों में सभी की निगाहें इस बात पर टिकी होंगी कि बंगाली भाषी मुसलमानों से जुड़ी यह पार्टी कैसा प्रदर्शन करती है. यह सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का पतन देखने को मिला था, जिसमें अजमल खुद धुबरी सीट पर कांग्रेस के रकीबुल हसन से 10 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से हार गए थे.

2024 के लोकसभा परिणाम ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के लिए बुरी खबर थी, क्योंकि इसमें स्पष्ट संकेत मिले थे कि उसका मुख्य वोट बैंक अब कांग्रेस को एक विकल्प के रूप में देख रहा है. विकास पाठक अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि यदि विधानसभा चुनावों में भी यही रुझान जारी रहता है, तो कांग्रेस निचले असम और बराक घाटी में सम्मानजनक प्रदर्शन कर सकती है, हालांकि भाजपा को हराने के लिए शायद यह पर्याप्त न हो. वहीं, कांग्रेस के बंगाली भाषी मुसलमानों की पसंदीदा पार्टी बनने का कोई भी संकेत ऊपरी असम में इस तरह से ध्रुवीकरण कर सकता है जिससे भाजपा को वहां बड़ा फायदा मिल जाए.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) की प्रक्रिया के दौरान एआईयूडीएफ अपने मतदाताओं की सुरक्षा करने में विफल रही. अंतिम ड्राफ्ट से बाहर हुए 19 लाख लोगों में से लगभग आधे बंगाली मुस्लिम थे, जिससे समुदाय के बीच पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचा.

हाल ही में हुए निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के कारण मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या कम हो गई है. पहले जहाँ ऐसी सीटों की संख्या 30 थी, अब वह घटकर लगभग 22 रह गई है. इससे एआईयूडीएफ की चुनावी ताकत और कम हो गई है. 2021 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और एआईयूडीएफ का गठबंधन था, लेकिन इससे ऊपरी असम में हिंदुओं का ध्रुवीकरण हुआ जिससे भाजपा को फायदा हुआ. अब कांग्रेस ने एआईयूडीएफ से दूरी बना ली है, ताकि वह असमिया बहुल मतदाताओं को अपने साथ जोड़ सके.

भाजपा “ध्रुवीकरण” का लाभ उठाती है. यदि कांग्रेस बंगाली भाषी मुसलमानों की पहली पसंद बनती है, तो भाजपा इसका इस्तेमाल हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने के लिए कर सकती है. बहरहाल, आगामी विधानसभा चुनाव बदरुद्दीन अजमल के लिए “करो या मरो” की स्थिति है. यदि वे अपने आधार को वापस पाने में विफल रहते हैं, तो असम की राजनीति में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उनकी पार्टी का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है.

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