नेपाल में जेन ज़ी का इन्क़लाब: 'ट्रॉमा' से 'उम्मीद' तक का सफ़र
पिछले साल सितंबर में 28 साल के बबलू गुप्ता नेपाल की संसद के बाहर गोलियों की गूँज के बीच लाशें हटा रहे थे. उनके हाथ में 'पायरेट फ़्लैग' था, जो दुनिया भर में ज़ी-जनरेशन के प्रतिरोध का प्रतीक बन चुका है. लेकिन आज मंज़र बदल चुका है. मार्च में हुए चुनावों ने नेपाल की सियासत में वो कर दिखाया है जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी. बबलू गुप्ता अब महज़ एक प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि सांसद हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स में हाना बीच, बिनोद घिमिरे और सजल प्रधान का लंबा फीचर इस बारे में छपा है.
नेपाल के युवाओं ने दशकों पुराने सियासी निज़ाम को उखाड़ फेंका है. इस चुनाव में 'राष्ट्रिय स्वतंत्र पार्टी' (RSP) को ज़बरदस्त जनादेश मिला है. नई संसद में लगभग 10 प्रतिशत सांसद 30 साल या उससे कम उम्र के हैं, जबकि पिछली संसद में यह आँकड़ा 2 प्रतिशत भी नहीं था. इस बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा हैं 35 साल के बालेन्द्र शाह, जिन्हें दुनिया 'बालेन' के नाम से जानती है. आँखों पर काला चश्मा और तीखे रैप गानों के ज़रिए सत्ता को चुनौती देने वाले बालेन ने नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है. उन्होंने चार बार प्रधानमंत्री रहे के.पी. शर्मा ओली को उन्हीं की सीट पर मात दी. बालेन की जीत महज़ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और परिवारवाद के ख़िलाफ़ युवाओं का खुला विद्रोह है.नेपाल का युवा वर्ग थक चुका था—उस भ्रष्टाचार से जिसने उन्हें विदेशों में मज़दूरी करने पर मजबूर किया, उस भाई-भतीजावाद से जिसने सत्ता सिर्फ़ ऊँची जाति के रईस परिवारों तक सीमित रखी, और उस डिजिटल पाबंदी से जिसने उनकी आवाज़ छीनने की कोशिश की. बबलू गुप्ता कहते हैं, "हम हताश थे. हमें पता था कि चीज़ें बदलनी होंगी. हमने अपने दर्द (ट्रॉमा) को एक खूबसूरत भविष्य में बदलने का फ़ैसला किया है."इस क्रांति की लहर में सिर्फ़ राजनीति नहीं, बल्कि सामाजिक ढाँचा भी बदल रहा है. 30 साल की रंजू दर्शना, जिन्होंने एक सिंगल मदर की बेटी के रूप में संघर्ष किया, अब संसद की सबसे प्रभावशाली आवाज़ों में से एक हैं. रंजू कहती हैं, "यह जीत उन युवाओं के ख़ून पर टिकी है जिन्होंने शहादत दी. अब हमारी ज़िम्मेदारी है कि उनके सपनों को सच करें."
यही नहीं, नेपाल को पहली ट्रांसजेंडर सांसद भी मिली है, जो समावेशी लोकतंत्र की एक नई मिसाल है. हालाँकि जीत का जश्न ज़ोरों पर है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त अब भी सख़्त है. नेपाल की 56 प्रतिशत आबादी 30 साल से कम उम्र की है, लेकिन रोज़गार के अभाव में हर साल लाखों युवा देश छोड़ रहे हैं. एयरपोर्ट पर आज भी 'रोमानिया' और 'खाड़ी देशों' के वीज़ा लिए युवाओं की कतारें लगी हैं.
बालेन शाह की सरकार ने 12 लाख नौकरियाँ पैदा करने और डिजिटल गवर्नेंस का वादा किया है. क्या एक रैपर प्रधानमंत्री और ये युवा सांसद नेपाल की तक़दीर बदल पाएंगे? पूरी दुनिया की नज़रें अब इस हिमालयी देश पर हैं, जो जेन जी की आकांक्षाओं का ग्लोबल टेस्ट केस बन गया है.
बबलू गुप्ता के शब्दों में, "पूरी दुनिया को थोड़े बदलाव की ज़रूरत है, और इसकी शुरुआत नेपाल से हो चुकी है."

