एक साल में 2 करोड़ बच्चों ने ऑनलाइन यौन शोषण का सामना किया, यूनिसेफ की रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यानी यूनिसेफ की नई रिपोर्ट के अनुसार, 21 देशों में 12 से 17 वर्ष की उम्र के करीब 2 करोड़ बच्चों ने एक साल के दौरान तकनीक के जरिए यौन शोषण या उत्पीड़न का सामना किया. इनमें 1.5 करोड़ से अधिक बच्चे बिना इच्छा के अश्लील यौन सामग्री के संपर्क में आए, जबकि करीब 90 लाख बच्चों से जबरन यौन बातचीत करने या अपनी यौन तस्वीरें साझा करने के लिए कहा गया. लगभग 40 लाख बच्चों की यौन तस्वीरें उनकी अनुमति के बिना साझा की गईं. भारत इस अध्ययन में शामिल 21 देशों में नहीं था.

रिपोर्ट के लिए करीब 21 देशों में इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले 21 हजार बच्चों का सर्वेक्षण किया गया. इसके अलावा बचपन में शोषण का सामना कर चुके 100 युवाओं से विस्तृत बातचीत भी की गई. यूनिसेफ ने कहा कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि बड़ी संख्या में बच्चे ऐसी घटनाओं की शिकायत नहीं करते.

अधिकतर बच्चे मदद नहीं मांगते

रिपोर्ट के अनुसार, 40 प्रतिशत से अधिक बच्चों ने शोषण की घटना के बारे में किसी को नहीं बताया. पुलिस, सामाजिक कार्यकर्ता या सहायता केंद्र को शिकायत करने वाले बच्चों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम रही. बच्चों के चुप रहने का सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्हें पता नहीं था कि मदद के लिए किससे संपर्क करें या घटना के बारे में किसे बताएं.

यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसेल ने कहा कि लाखों बच्चे उन डिजिटल स्थानों पर शोषण का सामना कर रहे हैं, जहां वे पढ़ते, खेलते और दोस्तों से जुड़ते हैं. उन्होंने कहा कि इन घटनाओं से बच्चों को गहरा भावनात्मक और मानसिक तनाव होता है और कई बच्चे मदद के अभाव में चुपचाप पीड़ित रहते हैं.

सामाजिक माध्यम और ऑनलाइन खेल बने प्रमुख माध्यम

रिपोर्ट में पाया गया कि करीब 60 प्रतिशत घटनाएं सामाजिक माध्यमों पर हुईं. इनमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक और व्हाट्सऐप जैसे मंच शामिल हैं. लगभग 14 प्रतिशत मामले ऑनलाइन खेलों से जुड़े थे. रिपोर्ट के अनुसार, इन मंचों की सुविधाओं, डिजाइन और संपर्क व्यवस्था का इस्तेमाल बच्चों का भरोसा जीतकर उनका शोषण करने के लिए किया गया.

मोंटेनेग्रो में 80 प्रतिशत से अधिक मामलों में सामाजिक माध्यमों की भूमिका सामने आई. कोलंबिया में भी आधे से अधिक मामलों का संबंध सामाजिक माध्यमों से था. रिपोर्ट ने डिजिटल मंचों की जिम्मेदारी पर सवाल उठाते हुए कहा कि बच्चों की सुरक्षा को उनके डिजाइन और संचालन का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

शोषण करने वाले अक्सर परिचित लोग

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि ऑनलाइन यौन शोषण करने वाला व्यक्ति हमेशा कोई अजनबी नहीं होता. सर्वेक्षण में 57 प्रतिशत मामलों में आरोपी बच्चे का परिचित था. इनमें सहपाठी, दोस्त, प्रेम संबंध में रहने वाले व्यक्ति और परिवार के सदस्य भी शामिल थे.

वहीं, 38 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि वे शोषण करने वाले व्यक्ति से पहली बार ऑनलाइन मिले थे. इससे यह धारणा कमजोर होती है कि डिजिटल यौन शोषण केवल अजनबियों द्वारा किया जाता है. बच्चों के परिचितों द्वारा किया गया शोषण भी गंभीर चुनौती बनकर सामने आया है.

मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर

रिपोर्ट के अनुसार, तकनीक के जरिए यौन शोषण का सामना करने वाले बच्चों में आत्महत्या के विचार या व्यवहार और खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति की संभावना अन्य बच्चों की तुलना में चार गुना अधिक थी. इन बच्चों में चिंता का स्तर भी काफी ज्यादा पाया गया.

मेक्सिको और उत्तर मैसेडोनिया में शोषण का सामना करने वाले बच्चों में आत्महत्या से जुड़े विचारों या व्यवहार का जोखिम आठ गुना से अधिक था. पाकिस्तान में खुद को नुकसान पहुंचाने का जोखिम सात गुना से ज्यादा पाया गया. ये आंकड़े बताते हैं कि ऑनलाइन शोषण का असर केवल डिजिटल दुनिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन पर लंबे समय तक पड़ सकता है.

सरकारों और कंपनियों से तत्काल कार्रवाई की मांग

यूनिसेफ ने सरकारों, तकनीकी कंपनियों और अन्य संबंधित संस्थाओं से बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की अपील की है. रिपोर्ट में डिजिटल मंचों को सुरक्षित डिजाइन अपनाने, बच्चों की निजता की मजबूत सुरक्षा करने, वयस्कों के अनचाहे संपर्क पर रोक लगाने और अनुशंसा प्रणाली को सुरक्षित बनाने की मांग की गई है.

इसके अलावा शोषण की पहचान, शिकायत दर्ज करने और कार्रवाई की व्यवस्था को भी बेहतर बनाने पर जोर दिया गया है. यूनिसेफ ने कहा कि बच्चों को यह भरोसा होना चाहिए कि यदि वे किसी घटना की जानकारी देते हैं तो उनकी बात सुनी जाएगी और उन्हें सहायता मिलेगी.

यह अध्ययन यूनिसेफ, ईसीपीएटी इंटरनेशनल और इंटरपोल की संयुक्त परियोजना के तहत किया गया. रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि डिजिटल तकनीक बच्चों के लिए शिक्षा, मनोरंजन और संपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन उनकी सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना यह वातावरण गंभीर जोखिम भी पैदा कर सकता है.

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