जाति जनगणना पर सरकार के भीतर टकराव, संशोधित किया गया नोट

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में श्यामलाल यादव की यह रिपोर्ट 2027 की जनगणना में जातियों की गिनती को लेकर पैदा हुए राजनीतिक विवाद, प्रशासनिक अंतर-मंत्रालयी मतभेदों और डेटा संग्रह के व्यावहारिक संकट का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है.

रिपोर्ट के अनुसार, 2027 की जनगणना में सरकार द्वारा 'ड्रॉप-डाउन सूची' (पूर्वनिर्धारित विकल्प) के बजाय 'ओपन-एंडेड प्रश्न' (खुले उत्तर) का विकल्प चुनने से राजनीतिक बहस छिड़ गई है. विपक्ष के नेताओं, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने तर्क दिया है कि बिना किसी निश्चित ढाँचे के सटीक डेटा जुटाना असंभव है, जिससे सामाजिक न्याय की नीतियाँ प्रभावित होंगी. वहीं, सरकार का मानना है कि राज्य को स्वयं जाति की पहचान का निर्धारक बनने से रोकने के लिए यह प्रारूप आवश्यक है.

यादव ने इसमें बताया है कि जनगणना प्रक्रिया में शामिल दो मुख्य निकायों — भारत के महारजिस्ट्रार कार्यालय (ओआरजीआई) और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय— के बीच प्रशासनिक सहमति नहीं बन सकी.

शुरुआती विवाद: 1 जून की बैठक में मंत्रालय ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा तैयार ओबीसी सूचियों को साझा करने की पेशकश की. हालाँकि, ओआरजीआई द्वारा तैयार बैठक के शुरुआती मिनट्स (नोट) में कहा गया कि मंत्रालय ने संवैधानिक जनादेश न होने के कारण जाति सूची उपलब्ध कराने में असमर्थता व्यक्त की है.

मंत्रालय की आपत्ति: मंत्रालय के अधिकारियों ने इस नोट को अपने ऊपर ज़िम्मेदारी डालने वाला "जाल" माना और स्पष्ट किया कि उनके पास अनुसूचित जाति (एससी की 1,258 प्रविष्टियाँ) और ओबीसी (2,483 प्रविष्टियाँ) की अधिकृत सूचियाँ उपलब्ध हैं, जो साझा की जा सकती हैं.  इसके अलावा किसी अन्य जाति सूची के रख-रखाव का जनादेश नहीं है.

मंत्रालय के कड़े रुख के बाद 30 जून को ओआरजीआई ने संशोधित नोट को स्वीकार कर लिया.

रिपोर्ट कहती है कि खुले उत्तर वाले प्रारूप के कारण 2011 की विफलताएँ दोहराए जाने की आशंका जताई जा रही है. 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना में ₹4,900 करोड़ खर्च हुए थे, लेकिन खुले उत्तर के कारण लोगों ने 46.7 लाख अलग-अलग जातियों के नाम दर्ज कराए.  वर्गीकरण के लिए अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति बनाई गई, किंतु यह डेटा आज तक सार्वजनिक नहीं हो सका.

केंद्र सरकार ने 2021 में सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर माना था कि 2011 का डेटा तकनीकी कमियों से भरा, अशुद्ध और पूरी तरह अनुपयोगी था. 30 अप्रैल 2025 को कैबिनेट समिति द्वारा स्वीकृत इस गणना के तहत देश भर में जनगणना फरवरी से आयोजित की जाएगी, जबकि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में यह प्रक्रिया 1 सितंबर से शुरू की जा चुकी है.

संक्षेप में, यह रिपोर्ट दर्शाती है कि जाति जनगणना का निर्णय नीतिगत स्तर पर तो लागू कर दिया गया है, किंतु प्रशासनिक स्पष्टता और सटीक डेटा संग्रह की तकनीक के अभाव में यह प्रक्रिया एक जटिल और विवादित मोड़ पर खड़ी है.

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