हाई कोर्ट ने असम से बांग्लादेश भेजी गई एक और महिला को 2 लाख रुपये मुआवजा देने को कहा
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने असम सरकार को बांग्लादेश भेजी गई बंगाली मूल की मुस्लिम महिला जहांआरा बेगम के बेटे को 2 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है. अदालत ने कहा कि जहांआरा को विदेशी न्यायाधिकरण के आदेश की प्रति दिए बिना निर्वासित किया गया, जिससे उन्हें फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने का अवसर नहीं मिला. इसी दिन अदालत ने एक अन्य महिला मुमताज बेगम के मामले में भी राज्य सरकार को 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया.
ये ऐसे पहले मामले हैं, जिनमें अदालत ने किसी व्यक्ति को निर्वासन नियमों का उल्लंघन कर बांग्लादेश भेजने के लिए असम सरकार पर आर्थिक दंड लगाया है.
जहांआरा बेगम को 2019 में असम के विदेशी न्यायाधिकरण ने विदेशी नागरिक घोषित किया था. उन्होंने इस फैसले को गुवाहाटी हाई कोर्ट में चुनौती दी. अप्रैल में अदालत ने न्यायाधिकरण का आदेश रद्द कर दिया, क्योंकि उसने मामले में पेश किए गए चार में से तीन गवाहों के साक्ष्यों पर विचार नहीं किया था. हाई कोर्ट ने मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए न्यायाधिकरण को वापस भेज दिया.
जहांआरा 29 मई को न्यायाधिकरण के सामने पेश हुईं. उन्होंने सुनवाई स्थगित करने की मांग की, लेकिन उनकी याचिका खारिज कर दी गई. इसके बाद सीमा पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. उनका परिवार शुरुआत में उनका पता नहीं लगा सका. बाद में उनके बेटे को जानकारी मिली कि उन्हें हिरासत केंद्र भेज दिया गया है. उसे न्यायाधिकरण के नए आदेश की प्रमाणित प्रति 5 जून को मिली.
सीमा सुरक्षा बल के अनुसार, सीमा पुलिस ने जहांआरा को 13 जून को बीएसएफ के हवाले किया. इसके बाद 13 और 14 जून की दरम्यानी रात उन्हें बांग्लादेश भेज दिया गया.
जहांआरा के बेटे ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी मां की हिरासत और निर्वासन की प्रक्रिया को चुनौती दी थी. अदालत ने पाया कि अधिकारियों ने जहांआरा या उनके परिवार के किसी वयस्क सदस्य को विदेशी न्यायाधिकरण के आदेश की प्रति उपलब्ध नहीं कराई. इससे उन्हें आदेश के खिलाफ कानूनी उपाय अपनाने का अवसर नहीं मिला.
विदेशी न्यायाधिकरण असम में काम करने वाली अर्ध-न्यायिक संस्थाएं हैं, जो दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर किसी व्यक्ति की नागरिकता से जुड़े मामलों का फैसला करती हैं. हालांकि, इन न्यायाधिकरणों की प्रक्रिया पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं. उच्च अदालतों ने कई मामलों में इसे मनमाना और गरीब तथा हाशिए के लोगों के खिलाफ बताया है.
पिछले चार वर्षों में असम के विदेशी न्यायाधिकरण करीब 1.30 लाख लोगों को भारतीय नागरिकता से वंचित कर चुके हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो लंबे समय से असम में रह रहे हैं, जिनके परिवार और संपत्ति राज्य में हैं, लेकिन वे पर्याप्त दस्तावेजों के जरिए अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए.
पिछले वर्ष मई में असम की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने “घोषित विदेशियों” के खिलाफ अभियान तेज किया था. आरोप है कि ऐसे लोगों को उनके घरों से उठाकर रातोंरात हिरासत में लिया गया और बाद में बांग्लादेश भेज दिया गया.
मुमताज बेगम के मामले में भी हाई कोर्ट ने इसी तरह की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए मुआवजे का आदेश दिया. अदालत के दोनों फैसले इस बात को रेखांकित करते हैं कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने की प्रक्रिया में भी कानूनी अधिकारों और न्यायिक उपायों का पालन अनिवार्य है. निर्वासन से पहले आदेश की प्रति देना और चुनौती का अवसर उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है.
इन मामलों में अदालत का मुआवजा आदेश केवल दो महिलाओं के लिए राहत नहीं है, बल्कि असम में नागरिकता निर्धारण और निर्वासन की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है.

