‘सीसीटीवी जारी करें’: दो मुस्लिम महिला पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस के मारपीट से इनकार को चुनौती दी
‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित बेतवा शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने 3 सितंबर 2026 को साकेत पुलिस थाने के भीतर दो मुस्लिम बहन पत्रकारों के साथ मारपीट के आरोपों से इनकार किया है. वहीं, पत्रकार शाहीन खान और उनकी छोटी बहन नफीसा खान का कहना है कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें थप्पड़ मारे, लात-घूंसों से पीटा और डंडे से हमला किया. दोनों बहनों ने मांग की है कि थाने के सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक किए जाएं, ताकि सच सामने आ सके.
27 वर्षीय शाहीन खान के अनुसार, घटना उस समय शुरू हुई जब वह और उनकी 24 वर्षीय बहन एक निजी अस्पताल के उद्घाटन कार्यक्रम की वीडियो बना रही थीं. कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के पहुंचने की जानकारी थी. पुलिस के मुताबिक, दोनों ने अपनी स्कूटी “वीवीआईपी” मार्ग पर खड़ी की थी और उसे हटाने से इनकार किया.
शाहीन का कहना है कि स्कूटी को लेकर थोड़ी देर के लिए विवाद जरूर हुआ, लेकिन इसके बाद पुलिस ने जिस तरह उन्हें जबरन पुलिस वाहन में बैठाया, मोबाइल फोन छीना और थाने ले जाकर कथित तौर पर पीटा, वह किसी भी स्थिति में उचित नहीं था.
उनके मुताबिक, पुलिसकर्मी लगातार उनका फोन छीनने की कोशिश कर रहे थे. उन्होंने पूछा कि किस कानून के तहत पुलिस उनका फोन ले सकती है और उन्हें थाने क्यों ले जाया जा रहा है. शाहीन ने आरोप लगाया कि थाने पहुंचने के बाद एक महिला पुलिसकर्मी ने उनका फोन छीन लिया.
मुस्लिम पहचान सामने आने के बाद बढ़ी कथित हिंसा
शाहीन का आरोप है कि पुलिस थाने में मारपीट के दौरान उनके मोबाइल फोन पर मोहम्मद खान नामक व्यक्ति का फोन आया. फोन करने वाले के नाम से पुलिसकर्मी को पता चला कि दोनों बहनें मुस्लिम हैं. इसके बाद कथित तौर पर महिला पुलिसकर्मी का व्यवहार और आक्रामक हो गया.
शाहीन ने कहा, “उसके हावभाव बदल गए. उसका चेहरा गुस्से और नफरत से लाल हो गया. उसने कहा, ‘तुम मुस्लिम हो. अब मैं तुम्हें और मारूंगी.’”
शाहीन के अनुसार, उनकी बहन नफीसा ने पुलिसकर्मी से पूछा कि मुस्लिम होना अपराध कैसे हो सकता है. शाहीन ने कहा कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें बंद कमरे में पीटा और इस दौरान उनके हाथ-पैरों पर चोटें आईं. उन्होंने बाद में वीडियो जारी कर अपने शरीर पर पड़े निशान दिखाए.
दिल्ली पुलिस के उपायुक्त अनंत मित्तल ने आरोपों को “तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक” बताया है. पुलिस का कहना है कि दोनों महिलाओं को सड़क पर यातायात व्यवस्था में बाधा डालने और पुलिस के निर्देशों का पालन नहीं करने के बाद थाने लाया गया था.
पानी मांगने पर भी नहीं मिली मदद
शाहीन ने बताया कि पुलिस थाने में दोनों बहनें लगातार पानी मांगती रहीं, लेकिन उन्हें पानी नहीं दिया गया. उन्होंने कहा कि यह अनुभव बेहद भयावह था. उनके अनुसार, उन्हें पहले थाने के रिसेप्शन के पास पीटा गया और फिर सीढ़ियों से ऊपर एक कमरे में ले जाकर मारपीट जारी रखी गई.
शाहीन का दावा है कि रिसेप्शन और सीढ़ियों के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों में पूरी घटना रिकॉर्ड हुई होगी. उनका कहना है कि यदि फुटेज के साथ छेड़छाड़ या उसे नष्ट नहीं किया गया है, तो वह पुलिस के दावे और उनके आरोपों के बीच सच स्पष्ट कर सकता है.
4 पीएम न्यूज नेटवर्क के संपादक संजय शर्मा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वह सीसीटीवी फुटेज हासिल करने और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का रुख करेंगे. पत्रकार संगठनों और राजनीतिक दलों ने भी कथित मारपीट की आलोचना की है.
शाहीन ने आरोप लगाया कि उन्होंने साकेत थाने में संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उनकी शिकायत लेने या प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि घटना के दो दिन बाद तक किसी पुलिस अधिकारी ने उनसे संपर्क नहीं किया.
बहन की हालत बिगड़ने पर खुद पुलिस से मदद मांगी
शाहीन के मुताबिक, एक कमरे में नफीसा की हालत बिगड़ने लगी और वह कुछ देर के लिए अर्धचेतन अवस्था में चली गईं. शाहीन ने उन्हें सहारा देकर वापस रिसेप्शन तक पहुंचाया. वहां उन्होंने पुलिस से फोन करने की अनुमति मांगी और चेतावनी दी कि यदि उनकी बहन को कुछ हुआ, तो इसकी जिम्मेदारी पुलिस की होगी.
उन्होंने थाने के लैंडलाइन फोन से परिवार को सूचना दी. इसके बाद परिवार के सदस्य वकीलों के साथ थाने पहुंचे. शाहीन ने यह भी बताया कि उन्होंने पुलिस थाने के भीतर से ही 112 पर फोन किया, ताकि दोनों को अस्पताल ले जाया जा सके और मेडिकल-लीगल सर्टिफिकेट यानी चिकित्सकीय-कानूनी रिपोर्ट बन सके. इस रिपोर्ट में डॉक्टर चोटों और घायल व्यक्ति के बताए घटनाक्रम को दर्ज करता है.
शाहीन ने कहा कि बाद में जब वह शिकायत लिखवाने थाने लौटीं और स्टेशन हाउस ऑफिसर का नाम लिया, तो पुलिस ने शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया. उनका कहना है कि पुलिस का कर्तव्य है कि वह शिकायत दर्ज करे और उसके बाद जांच करे, चाहे शिकायत में किसी भी व्यक्ति का नाम क्यों न हो.
सीसीटीवी की मांग का पुराना संदर्भ
दोनों पत्रकारों की सीसीटीवी फुटेज जारी करने की मांग दिल्ली के एक पुराने मामले की याद दिलाती है. 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान पांच मुस्लिम पुरुषों को पुलिसकर्मियों द्वारा सड़क पर पीटे जाने और राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किए जाने का आरोप लगा था. इनमें 23 वर्षीय फैजान को ज्योति नगर पुलिस थाने ले जाया गया, जहां कथित तौर पर उसके साथ दोबारा मारपीट हुई. दो दिन बाद उसकी मौत हो गई.
दिल्ली पुलिस ने शुरुआत में कहा था कि उस दिन थाने का सीसीटीवी सिस्टम खराब था. दिल्ली हाई कोर्ट ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया और मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दिया. सीबीआई ने निष्कर्ष निकाला कि कैमरों का सिस्टम unplug यानी जानबूझकर बंद किया गया था और यह कैमरों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो सकती है. छह साल से अधिक समय बाद भी किसी पुलिसकर्मी को सजा नहीं मिली है.
फैजान का मामला शाहीन और नफीसा के साथ क्या हुआ, यह साबित नहीं करता. लेकिन यह बताता है कि पुलिस हिरासत या थाने के भीतर हिंसा के आरोपों में सीसीटीवी फुटेज कितनी महत्वपूर्ण स्वतंत्र सामग्री हो सकती है.
शाहीन ने कहा कि यदि फुटेज उनके आरोपों को गलत साबित करती है, तो वह दिल्ली पुलिस और देश से माफी मांगेंगी. लेकिन यदि फुटेज उनके दावों की पुष्टि करती है, तो पुलिस को जवाब देना होगा.
उन्होंने कहा, “सीसीटीवी फुटेज जारी करें. अगर मैं झूठ बोल रही हूं, तो मैं देश और दिल्ली पुलिस से माफी मांगूंगी. वे मेरे खिलाफ जितनी चाहें प्राथमिकी दर्ज कर सकते हैं.”
शाहीन का कहना है कि शरीर पर लगी चोटें समय के साथ ठीक हो जाएंगी, लेकिन जिस तरह पुलिसकर्मी ने केवल मोबाइल फोन पर मोहम्मद खान का नाम देखकर कथित तौर पर अपना व्यवहार बदला, उसे दोनों बहनें कभी नहीं भूल पाएंगी.

