जम्मू-कश्मीर में कॉन्स्टेबल की हत्या के बाद 2 घर ध्वस्त, 2,500 हिरासत में

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में 22 जुलाई 2026 को लाल चौक के पास हेड कॉन्स्टेबल आशिक हुसैन कुरैशी की गोली मारकर हत्या के कुछ घंटों बाद सुरक्षा बलों ने दो संदिग्ध आतंकियों से जुड़े घरों को ध्वस्त कर दिया. इस कार्रवाई के साथ घाटी भर में बड़े पैमाने पर छापेमारी की गई और 2,500 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया. कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 2024 के “बुलडोजर न्याय” संबंधी दिशा-निर्देशों के उल्लंघन के आरोप लगे हैं.

‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के मुताबिक, कुरैशी की दोपहर करीब 12:30 बजे एक बंदूकधारी ने हत्या कर दी थी. उसी रात अनंतनाग के गुरी गांव में आदिल अहमद ठोकर का नवनिर्मित तीन मंजिला मकान सुरक्षा बलों ने ध्वस्त कर दिया. ठोकर करीब नौ साल से लापता है और जांच एजेंसियों ने उसे अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले के आरोपियों में शामिल बताया था. ग्रामीणों के मुताबिक, रात में सुरक्षा बलों ने इलाके में पहुंचकर घरों की तस्वीरें लीं और 23 जुलाई तड़के करीब 3:15 बजे विस्फोट से मकान गिरा दिया. विस्फोट में आसपास के कुछ मकानों को भी नुकसान पहुंचा.

इसी दौरान करीब नौ किलोमीटर दूर हसनपोरा गांव में हारून राशिद गनई का मकान भी ध्वस्त किया गया, जिसे अधिकारियों ने लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी बताया. दोनों कार्रवाइयां जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने संयुक्त रूप से कीं.

स्थानीय लोगों का आरोप है कि गुरी में मकान ध्वस्त करने से पहले कोई निकासी या औपचारिक नोटिस नहीं दिया गया. हसनपोरा के लोगों के मुताबिक आसपास के परिवारों को घर खाली करने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्हें किसी औपचारिक ध्वस्तीकरण नोटिस की जानकारी नहीं थी. हालांकि, आर्टिकल 14 स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि नहीं कर सका कि दोनों मामलों में नोटिस जारी किए गए थे या नहीं.

इस कार्रवाई ने सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2024 के फैसले को लेकर कानूनी सवाल खड़े किए हैं. अदालत ने देशभर में संपत्तियों के ध्वस्तीकरण के लिए प्रक्रिया निर्धारित करते हुए कहा था कि कार्यपालिका किसी आरोपी की संपत्ति को सजा के तौर पर नहीं गिरा सकती. प्रभावित पक्ष को पहले नोटिस और कार्रवाई को चुनौती देने का अवसर दिया जाना चाहिए. अदालत ने सुबह बहुत जल्दी या देर रात मकान गिराने से भी स्पष्ट रूप से मना किया था.

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट के अधिवक्ता सजाद फारूक राथर के मुताबिक, 22-23 जुलाई की रात हुई कार्रवाई इन दिशा-निर्देशों के संदर्भ में सवाल पैदा करती है. उनका कहना है कि संवैधानिक व्यवस्था में जवाबदेही सामान्यतः व्यक्तिगत होती है. किसी रिश्तेदार पर लगे आरोप के कारण ऐसे परिवार के सदस्यों को परिणाम भुगतने पड़ें, जिन पर न आरोप है और न अपराध सिद्ध हुआ है, तो संवैधानिक और कानूनी प्रश्न उठते हैं.

अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में कथित आतंकियों, संदिग्धों और हाल के वर्षों में कथित मादक पदार्थ तस्करों से जुड़ी संपत्तियों को गिराने की कई कार्रवाइयां हुई हैं. अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले के बाद भी संदिग्ध आतंकियों से जुड़े कम से कम नौ-दस मकान गिराए जाने की खबरें आई थीं. इनमें ठोकर का गुरी स्थित घर भी शामिल था.

हेड कॉन्स्टेबल कुरैशी की हत्या के बाद कार्रवाई केवल मकानों के ध्वस्तीकरण तक सीमित नहीं रही. श्रीनगर, अनंतनाग, बारामूला, बडगाम, शोपियां और गांदरबल समेत कई जिलों में छापेमारी कर करीब 2,500 लोगों को हिरासत में लिया गया. इनमें कथित ओवर ग्राउंड वर्कर, आतंकियों के संदिग्ध समर्थक और पहले एफआईआर में नामित लोग शामिल थे.

कुछ युवाओं ने आरोप लगाया कि बड़े आतंकी हमलों के बाद उन्हें बार-बार पूछताछ के लिए हिरासत में लिया जाता है, जबकि उनका संबंधित घटनाओं से कोई संबंध नहीं होता. अनंतनाग के 28 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर ने बताया कि उसे कुरैशी की हत्या के बाद 24 घंटे हिरासत में रखा गया था और अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले के बाद भी उसे उठाया गया था. अन्य युवाओं ने भी बार-बार हिरासत में लिए जाने के कारण डर, रोजगार पर असर और मानसिक तनाव की बात कही.

पीडीपी विधायक वहीद पारा ने कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर देश के दूसरे हिस्सों में युवाओं के साथ मेल-मिलाप का रास्ता अपनाया जा सकता है, तो कश्मीर के युवाओं के लिए अलग मानक क्यों हैं. उनके मुताबिक, कश्मीर और देश के बाकी हिस्सों के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाने से अलगाव की भावना और गहरी हो सकती है.

इस पूरे घटनाक्रम ने दो सवाल फिर सामने रखे हैं—आतंकवाद से निपटने के लिए सुरक्षा बलों की कार्रवाई की सीमा क्या होनी चाहिए और क्या किसी संदिग्ध या आरोपी के कारण उसके परिवार की संपत्ति पर कार्रवाई की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के मद्देनजर अनंतनाग में रात के समय हुए ध्वस्तीकरण की कानूनी प्रक्रिया और नोटिस को लेकर उठे सवाल इस मामले के केंद्र में हैं.

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