मोदी सरकार ने 2,000 रुपये से ऊपर के यूपीआई लेनदेन पर शुल्क की अनुमति दी, "ट्रंप के आगे झुकने" का तंज

'साउथ फर्स्ट' की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त मंत्रालय की नई अधिसूचना के बाद यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाए जाने की आशंका बढ़ गई है. 14 सितंबर को जारी अधिसूचना में कहा गया कि बैंक या भुगतान प्रणाली प्रदाता 2,000 रुपये तक के रुपे डेबिट कार्ड और यूपीआई भुगतान पर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं लगा सकते. मौजूदा समय में यूपीआई लेनदेन पूरी तरह शुल्क मुक्त हैं. खास बात यह है कि कुल यूपीआई लेनदेन की मात्रा का करीब 96 प्रतिशत 2,000 रुपये से कम के भुगतान का है.

इस अधिसूचना में 2,000 रुपये तक के भुगतान पर शुल्क लगाने पर रोक स्पष्ट है, लेकिन इससे ऊपर के लेनदेन के लिए ऐसी स्पष्ट सुरक्षा नहीं दी गई है. इसी वजह से यह आशंका पैदा हुई है कि भविष्य में बड़े भुगतान पर शुल्क लगाया जा सकता है.

वित्तीय विशेषज्ञ प्रोफेसर अनिल सूद ने इसे यूपीआई को सेवा प्रदाताओं के लिए व्यावसायिक रूप से आकर्षक बनाने की दिशा में पहला कदम बताया. उनका कहना है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था धीरे-धीरे व्यावसायिक ढांचे की ओर बढ़ रही है और आगे चलकर लाभ के लिए शुल्क निर्धारण एक विकल्प बन सकता है. 2,000 रुपये से कम के भुगतान पर शुल्क नहीं लगाने की स्थिति में सरकार को समर्थन जारी रखना होगा या फिर बड़े लेनदेन से होने वाली कमाई के जरिए छोटे भुगतान को सब्सिडी देनी होगी.

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि बैंक और भुगतान सेवा प्रदाता सिस्टम की लागत के ऊपर अपना मार्जिन जोड़ना शुरू करते हैं तो डिजिटल भुगतान की लागत बढ़ सकती है. गूगल पे और फोनपे जैसे प्लेटफॉर्म तथा बैंक भविष्य में डिजिटल भुगतान को राजस्व और मुनाफे के स्रोत के रूप में देख सकते हैं. खुदरा उपभोक्ता आधारित कारोबार होने के कारण शुल्क तय करने की ताकत भी इन्हीं संस्थानों के पास होगी.

"जैसा हमने चेताया था"

6 अगस्त 2026 को टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026 में संशोधन के समय ही यूपीआई को शुल्क के दायरे में लाए जाने की आशंका जताई गई थी. उस संशोधन ने यूपीआई लेनदेन को मुफ्त रखने वाली वैधानिक सुरक्षा को हटा दिया था.

रॉयटर्स ने भी 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर संभावित शुल्क की संभावना की ओर संकेत किया था. सीएनबीसी-टीवी18 ने सूत्रों के हवाले से अगले सप्ताह तक इस संबंध में दिशानिर्देश जारी होने की संभावना बताई.

कांग्रेस प्रवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि 6 अगस्त को जिस खतरे की चेतावनी दी गई थी, अब वही प्रक्रिया शुरू होती दिखाई दे रही है. उन्होंने कहा कि संशोधित भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 के तहत जारी अधिसूचना केवल 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेनदेन को शुल्क से बचाती है. 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान के लिए कोई स्पष्ट कानूनी सुरक्षा नहीं है.

रमेश ने आशंका जताई कि आगे चलकर 2,000 रुपये की सीमा भी बदली जा सकती है और रोजमर्रा के व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान पर भी शुल्क लगाया जा सकता है. उन्होंने सवाल किया कि क्या यह बदलाव अमेरिकी कंपनियों को डिजिटल भुगतान बाजार में जगह देने और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने के लिए किया जा रहा है.

अमेरिकी दबाव का आरोप

जयराम रमेश ने इस फैसले को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की 2026 की रिपोर्ट से भी जोड़ा है. इस रिपोर्ट में यूपीआई और रुपे के मुफ्त होने की आलोचना की गई थी और कहा गया था कि इनकी वजह से वीजा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी भुगतान कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कठिन हो रही है.

रमेश ने दावा किया कि भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई के पास यूपीआई व्यवस्था को बिना व्यापारियों और उपभोक्ताओं पर शुल्क लगाए लंबे समय तक वित्त पोषित करने की क्षमता है. वित्त वर्ष 2025-26 में आरबीआई ने केंद्र सरकार को 2.86 लाख करोड़ रुपये का अधिशेष हस्तांतरित किया था. उनका कहना है कि इस राशि का छोटा सा हिस्सा भी डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को बनाए रखने के लिए पर्याप्त हो सकता है.

कांग्रेस के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल ने आशंका जताई कि 2,000 रुपये से अधिक के हर भुगतान पर 0.5 प्रतिशत शुल्क लगाया जा सकता है. पत्रकार सुहासिनी हैदर ने भी सवाल उठाया कि यदि सरकार वेतनभोगी वर्ग पर इतना अतिरिक्त खर्च आधारित कर लगाने की योजना बना रही है तो आयकर को कम या खत्म क्यों नहीं किया जाता.

बड़े भुगतान पर एमडीआर का सवाल

यूपीआई समिति की बैठक इस सप्ताह होने की संभावना जताई गई है, जिसमें 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर तय करने पर चर्चा हो सकती है. एमडीआर वह शुल्क है जो बैंक और भुगतान गेटवे किसी भुगतान को संसाधित करने के लिए व्यापारी से लेते हैं. यदि यह शुल्क लागू होता है तो व्यापारी इसे ग्राहकों तक पहुंचा सकते हैं, जिससे बड़े डिजिटल भुगतान महंगे हो सकते हैं.

यूपीआई दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम भुगतान नेटवर्क है. जुलाई 2026 में यूपीआई के जरिए 2360 करोड़ लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 29.87 लाख करोड़ रुपये थी. इसका इस्तेमाल 55.49 करोड़ से अधिक भारतीय करते हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में यूपीआई पर कुल 24,160 करोड़ लेनदेन हुए, जिनका मूल्य करीब 314 लाख करोड़ रुपये था.

भारत के अलावा 11 अन्य देशों में भी यूपीआई भुगतान की सुविधा उपलब्ध है. गूगल पे और फोनपे इसके सबसे बड़े प्लेटफॉर्म हैं.

इसलिए 2,000 रुपये की सीमा से ऊपर शुल्क लगाने की संभावित व्यवस्था केवल बड़े भुगतान करने वाले लोगों तक सीमित मामला नहीं है. यूपीआई के विशाल इस्तेमाल को देखते हुए शुल्क की कोई भी व्यवस्था व्यापारियों, उपभोक्ताओं और पूरे डिजिटल भुगतान तंत्र की लागत को प्रभावित कर सकती है. फिलहाल सरकार ने 2,000 रुपये तक के यूपीआई भुगतान को शुल्क से सुरक्षित रखा है, लेकिन उससे ऊपर शुल्क लगेगा या नहीं, कितना लगेगा और इसका बोझ किस पर पड़ेगा, इस पर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है.

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