नदियां सीमा पार कर जाती हैं, मुर्दे नहीं: पाकिस्तान में बह गए लद्दाखियों के शवों का इंतजार

'आर्टिकल-14' में इरशाद हुसैन और मुबाशिर नाइक ने लिखा है कि लद्दाख के कारगिल क्षेत्र में सुरू और शिंगो नदियों में बहकर पाकिस्तान प्रशासित गिलगित-बाल्टिस्तान पहुंच जाने वाले शवों को वापस लाना परिवारों के लिए बेहद मुश्किल हो गया है. भारत-पाकिस्तान के बीच ऐसे मानवीय मामलों के लिए कोई आधिकारिक एक्सचेंज प्वाइंट नहीं होने के कारण कई परिवार हफ्तों, महीनों और कभी-कभी हमेशा के लिए अपने प्रियजनों के शव का इंतजार करते रह जाते हैं.

20 मार्च 2026 को कारगिल के हुंदरमन गांव में नौ वर्षीय जुलकरनैन अली और उसके छह वर्षीय चचेरे भाई अली अकबर सुरू नदी के किनारे खेलने गए थे. दोनों तेज बहाव में बह गए. अकबर का शव अगले दिन मिल गया, लेकिन जुलकरनैन का पता नहीं चला. दो दिन बाद सीमा पार रहने वाले रिश्तेदारों ने व्हाट्सऐप के जरिए परिवार को बताया कि उसका शव पाकिस्तान प्रशासित इलाके में मिल गया है.

छह सप्ताह की बातचीत के बाद 5 मई 2026 को जुलकरनैन का शव जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में स्थित टीटवाल पुल के रास्ते भारतीय अधिकारियों को सौंपा गया. करीब 46 दिन बाद उसका शव परिवार तक पहुंच सका. 2019 से बंद इस पुराने क्रॉसिंग को केवल इस मानवीय हस्तांतरण के लिए दोबारा खोला गया था.

जुलकरनैन का मामला अपवाद है. 21 जुलाई 2023 को द्रास के हुलयाल गांव के 35 वर्षीय ठेकेदार शबीर अहमद की कार काकसर पुल से द्रास नदी में गिर गई थी. उनके साथ मौजूद एक व्यक्ति का शव वाहन से मिल गया, लेकिन अहमद समेत तीन लोग बहकर नियंत्रण रेखा के पार चले गए. 13 दिन बाद परिवार को सोशल मीडिया के जरिए पता चला कि अहमद का शव पाकिस्तान प्रशासित गिलगित-बाल्टिस्तान के खरमांग में मिला है. परिवार ने अधिकारियों से शव लौटाने की अपील की, लेकिन वह कभी वापस नहीं मिल सका. परिवार ने ऑनलाइन अंतिम संस्कार देखा, लेकिन खुद उसमें शामिल नहीं हो पाया.

बार-बार सामने आती त्रासदी

कारगिल-द्रास क्षेत्र में बचाव अभियान चलाने वाले स्वयंसेवी संगठन अल मेहदी स्काउट्स के प्रमुख जावेद अली के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में कम से कम 10 से 12 ऐसे मामले हुए हैं जिनमें तेज नदी के बहाव के कारण शव सीमा पार चले गए और उन्हें वापस नहीं लाया जा सका.

सुरू और शिंगो नदियों में गर्मियों के दौरान बर्फ और हिम पिघलने से पानी का बहाव बेहद तेज हो जाता है. 2024 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार लद्दाख में डूबने से 12 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2023 में यह संख्या 9 थी. 2024 में लद्दाख में 83 लापता लोगों का भी पता नहीं चल सका था.

अल मेहदी स्काउट्स के अनुसार अप्रैल 2026 में सुरू नदी से 22 वर्षीय युवक का शव मिला और मई में 24 वर्षीय नेपाली व्यक्ति का शव बरामद किया गया. दूसरी ओर कई लोग अब भी लापता हैं. इनमें 2025 में शिंगो नदी में गिरे कारगिल के 18 वर्षीय युवक और द्रास की 22 वर्षीय महिला शामिल हैं. 19 जुलाई 2026 को कारगिल के बरसू निवासी 30 वर्षीय सज्जाद अली सुरू नदी में कपड़े धोते समय डूब गए. उनका शव अभी तक नहीं मिला है.

2023 से लेकर इससे भी पुराने कई मामले अनसुलझे हैं. 2018 में द्रास के हरदास के दो बच्चे शिंगो नदी में बह गए थे. 2022 में काकसर की 25 वर्षीय महिला और 2023 में चैनिगुंड की आठ वर्षीय बच्ची भी नदी में बहने के बाद नहीं मिली. बचाव दल का मानना है कि इनमें से कई शव बहकर नियंत्रण रेखा के पार पहुंच गए होंगे.

2023 में लद्दाख की 28 वर्षीय बेलकीस बानो का शव भी गिलगित-बाल्टिस्तान के खरमांग में मिला था, जहां उसे दफना दिया गया.

आधिकारिक व्यवस्था का अभाव

कारगिल में शवों की वापसी के लिए किसी मान्यता प्राप्त मानवीय एक्सचेंज प्वाइंट की अनुपस्थिति सबसे बड़ी समस्या है. कारगिल ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल के मुख्य कार्यकारी पार्षद मोहम्मद जाफर अखून ने बताया कि इस मुद्दे को भारत सरकार के सामने कई बार उठाया गया है, लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं निकला.

भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर में पहले पांच आधिकारिक सीमा पार मार्ग थे. इन रास्तों से परिवार एक-दूसरे से मिलते थे, व्यापार होता था और मानवीय मामलों में शवों का आदान-प्रदान भी संभव था. अप्रैल 2019 में भारत ने इन मार्गों से यात्रा और व्यापार रोक दिया था. इसके बाद कारगिल और कश्मीर के उन परिवारों के लिए स्थिति और कठिन हो गई जिनके रिश्तेदार नियंत्रण रेखा के पार चले गए या जिनके शव नदियों में बह गए.

फिलहाल कश्मीर के उरी क्षेत्र में स्थित कामान पोस्ट मानवीय हस्तांतरण के लिए एकमात्र सक्रिय रास्ता है. यह कारगिल से करीब 500 किलोमीटर दूर है. लद्दाख के लिए अलग एक्सचेंज प्वाइंट नहीं होने के कारण परिवारों को लंबी और जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है.

शवों पर राजनीति नहीं, मानवीय रास्ता जरूरी

कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के अध्यक्ष सज्जाद कारगिली ने कहा कि पाकिस्तान इस बात से इनकार नहीं करता कि भारत के लद्दाख क्षेत्र से शव उसके इलाके में पहुंचते हैं. लेकिन शवों की वापसी के लिए सकारात्मक और स्थायी व्यवस्था नहीं बन पाई है. उनके मुताबिक मृतकों के शवों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह मूल रूप से मानवीय मुद्दा है.

सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों के पारिवारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध पुराने हैं. लेकिन जब नदी में डूबे किसी व्यक्ति का शव गिलगित-बाल्टिस्तान पहुंचता है तो परिवारों को आधिकारिक व्यवस्था के बजाय व्हाट्सऐप, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया के जरिए जानकारी मिलती है. इसके बाद वे निजी संपर्कों के माध्यम से शव की पहचान और वापसी की कोशिश करते हैं.

कारगिल के सामाजिक और धार्मिक संगठनों के साथ-साथ कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस ने भी भारत और पाकिस्तान से ऐसे मामलों के लिए एक स्थायी आधिकारिक व्यवस्था और एक्सचेंज प्वाइंट बनाने की मांग की है.

मृतकों को सम्मान से अंतिम विदाई का अधिकार

मानवाधिकार वकील और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की सचिव वर्तिका मणि ने कहा कि सीमा पर लगातार होने वाली ऐसी घटनाओं को देखते हुए एक समर्पित मानवीय समन्वय केंद्र और शवों की सुरक्षित वापसी की मजबूत व्यवस्था जरूरी है.

मृतकों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार का अधिकार अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून में भी मान्यता प्राप्त है. 1929 के जिनेवा कन्वेंशन ने मृतकों के सम्मानजनक व्यवहार से जुड़े दायित्वों को पहली बार संहिताबद्ध किया था. 1949 के चार जिनेवा कन्वेंशन ने इन सिद्धांतों को और मजबूत किया. भारत और पाकिस्तान दोनों इनके पक्षकार हैं.

अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत मृतकों की पहचान, सम्मानजनक व्यवहार और जहां संभव हो, उनके शवों की वापसी की जिम्मेदारी को भी मान्यता मिली है. नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय वाचा भी मानव गरिमा के सम्मान को जीवन के बाद मृतकों और उनके परिवारों के साथ व्यवहार तक विस्तारित करती है.

सीमा चाहे राजनीतिक रूप से कितनी भी कठोर क्यों न हो, नदी में बहा शव किसी देश की सीमा देखकर नहीं रुकता. ऐसे मामलों में परिवारों को अपने प्रियजनों के शव पाने के लिए महीनों तक इंतजार न करना पड़े, इसके लिए भारत और पाकिस्तान के बीच एक स्पष्ट, स्थायी और मानवीय तंत्र की जरूरत है.

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