अर्थशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक पराकला प्रभाकर ने मतदाता सूचियों के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को आबादी के कई वंचित वर्गों को मताधिकार से वंचित करके भारतीयों की दो श्रेणियां बनाने की एक कवायद करार दिया.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, जिसमें उन्होंने हटाए गए तीन करोड़ मतदाताओं को 'बांग्लादेशी अवैध घुसपैठिया' घोषित किया था, प्रभाकर ने सवाल उठाया कि क्या 2014, 2019 और 2024 के चुनावों के बाद बने विधानमंडल और चुनी गई सरकारें गैर-कानूनी थीं?
वी. स्वाति की रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार (3 नवंबर) को तेलंगाना वोटर राइट्स फोरम द्वारा आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए उन्होंने चुनौती दी, "यदि यह सच है, तो कृपया इस्तीफा दें और मतदाता सूची के शुद्धिकरण के बाद चुनाव कराएं."
उन्होंने कहा कि जिन नागरिकों को 'स्थायी रूप से स्थानांतरित' के रूप में चिह्नित किया गया है, वे कहीं न कहीं तो गए ही होंगे, जिससे वहां की संख्या बढ़नी चाहिए थी, लेकिन सभी राज्यों और निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या घट रही है.
एसआईआर में पहचाने गए अवैध अप्रवासियों की सूची चार महीने के भीतर सौंपने के 27 मई के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का जिक्र करते हुए प्रभाकर ने कहा कि आदेश के पांच महीने बीत जाने के बाद भी एक छोटी सी सूची भी पेश नहीं की गई है.
उन्होंने कहा, "गृह मंत्री को राज्यवार अवैध अप्रवासियों की संख्या का उल्लेख करना चाहिए था. इसके बजाय गैर-जिम्मेदाराना बयानबाज़ी करके उन्होंने अपने पद की गरिमा को कम किया है."
शिक्षाविद और कार्यकर्ता जी. हरगोपाल ने कहा कि साखहीन (विश्वसनीयता रहित) चुनाव लोकतंत्र को खतरे में डालेंगे और उन्होंने एसआईआर प्रक्रिया को रद्द करने की मांग की.
उन्होंने कहा कि एसआईआर की प्रक्रियाएं खामियों से भरी थीं, और सवाल उठाया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को भारत के निर्वाचन आयोग के सदस्य चयन पैनल से क्यों हटाया गया.
शिक्षाविद पद्मजा शॉ ने बताया कि त्रिमुलगिरी के एक मतदान केंद्र के 1,062 मतदाताओं में से केवल 163 सदस्यों को ही बिना किसी नाम हटाए और बिना नोटिस दिए मंजूरी दी गई थी. उन्होंने कहा कि वर्तमान अराजकता की जड़ 2018 के तेलंगाना विधानसभा चुनावों में है जब मतदाता सूची से 22 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए थे.
उन्होंने एसआईआर की तुलना नोटबंदी और कोविड महामारी से की, जिसका उद्देश्य सरकार से मंजूरी पाने की आस लगाए लोगों को लाचार बनाना है.
कार्यकर्ता एस.क्यू. मसूद ने कहा कि हटाए गए मतदाताओं को फिर से जोड़ने के लिए 'फॉर्म 6' की व्यवस्था एक बैकडोर एंट्री (चोर दरवाजा) है, जिसे चुनाव आयोग द्वारा की गई मनमानी कटौतियों को छिपाने के लिए लाया गया है. उन्होंने आशंका जताई कि इस डेटा का इस्तेमाल मतदाताओं की प्रोफाइलिंग और निगरानी के लिए किया जा सकता है.
तेलंगाना वोटर राइट्स फोरम के सदस्य किरण कुमार विस्सा ने बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के लिए बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) को दोषी ठहराए जाने पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया ही नाम हटाने के हिसाब से डिज़ाइन की गई थी, और मांग की कि हर मतदान केंद्र की सीमा में जनसुनवाई आयोजित की जानी चाहिए.

