संजय हजारिका | सौंदर्य, सियांग नदी और बाँध का गहराता विवाद

पासीघाट को अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी के तट पर स्थित एक शांत कस्बे के रूप में याद किया जाता है. पहले यहाँ ठहरने के लिए केवल राज्य सरकार का सर्किट हाउस हुआ करता था, जहाँ बड़े कमरे और सुंदर नज़ारे तो थे, लेकिन मेनू सीमित था. हाल के वर्षों में बेहतर सड़कों और पुलों के कारण यह स्थान पूर्वोत्तर, देश और विदेश के पर्यटकों से गुलज़ार रहने लगा है. नदी किनारे नए रिसॉर्ट्स बन चुके हैं, जो 'अरुणाचल दर्शन' पर निकले यात्रियों के लिए प्रमुख पड़ाव का काम करते हैं. यहाँ से लोग निचले हिमालय की ऊँचाइयों और खूबसूरत ट्रैकिंग रूटों की ओर बढ़ते हैं.

लेखक संजय हजारिका के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश के बहुसंख्यक आदि समुदाय के लिए यह नदी ‘अने सियांग’ (माता सियांग) के रूप में पूजनीय है. चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में 'यारलुंग त्सांगपो' के नाम से बहने वाली यह नदी दुनिया की सबसे गहरी घाटी से होकर भारत में प्रवेश करती है. आदि भाषा में 'सि' का अर्थ जल और ‘आंग’ का अर्थ हृदय है, यानी ‘नदी का हृदय’.  ब्रह्मपुत्र में मिलने से पहले सियांग पर राफ्टिंग और कायाकिंग जैसे साहसिक खेल भी आयोजित होते हैं.

हालांकि, पासीघाट अब केवल एक शांत पर्यटन स्थल नहीं रहा. यह नदी पर बनने वाले विशाल बाँध ‘सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट’ (एसयूएमपी) के विरोध का मुख्य केंद्र बन गया है. मुख्यधारा का मीडिया और सरकार इसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा' और 'विकास' के विरोध के रूप में देख रहे हैं, जबकि स्थानीय समूहों का कहना है कि वे विकास के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि अपनी भूमि, संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा करना चाहते हैं.

इस विरोध के कारण हाल ही में अभूतपूर्व तनाव देखा गया.  प्रदर्शनकारियों ने सरकारी संपत्तियों, स्थानीय विधायकों के आवासों, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के घर और एक पुलिस स्टेशन पर हमले किए.  विवादित परियोजना का निर्माण कर रहे नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (एनएचपीसी) के कार्यालय को भी आग के हवाले कर दिया गया.

एसयूएमपी की योजना लगभग 20 साल पहले मनमोहन सिंह सरकार के दौरान तैयार की गई थी, लेकिन पिछले दशक में जब लोगों को इसके विशाल पैमाने का अहसास हुआ, तो जन-आक्रोश बढ़ गया. यह परियोजना न केवल लोगों को विस्थापित करेगी, बल्कि पवित्र स्थलों, चरागाहों और विशाल वनों को भी जलमग्न कर देगी. केंद्र सरकार ने तिब्बत में चीन द्वारा बनाए जा रहे दुनिया के सबसे बड़े बाँध के जवाब में इस परियोजना को गति दी, ताकि चीनी जल-दबाव से बचा जा सके.  यद्यपि एसयूएमपी भारत का सबसे बड़ा बाँध होगा, फिर भी यह चीन के मेडोग बाँध के पांचवें हिस्से के बराबर ही होगा.

हिमालयी क्षेत्र में दोनों ओर हो रहा विशाल निर्माण पूरे ग्रह के लिए घातक साबित हो रहा है. पर्यावरण संरक्षण के विपरीत वनों की कटाई, सुरंगें और राजमार्ग बनाए जा रहे हैं. अगस्त में नेपाल की त्रिशूली नदी में ग्लेशियर टूटने से आई तबाही इसका ताजा उदाहरण है.

चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी तनाव और घुसपैठ की रिपोर्टों के बीच यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। भारत और राज्य सरकार को यह समझना होगा कि अरुणाचल में स्थानीय असंतोष को उग्र रूप न लेने दिया जाए.

आगजनी के दोषियों पर कानूनी कार्रवाई जरूरी है, लेकिन संवाद को सफल बनाने के लिए साहसी पत्रकारों और कार्यकर्ताओं पर मनमानी कार्रवाई रोकनी होगी. उपमुख्यमंत्री चौना मीन द्वारा आपसी समझ और खुले वातावरण में बातचीत की पेशकश एक सकारात्मक कदम है. इस रणनीतिक और शांतिप्रिय राज्य के स्थायी हित के लिए आंतरिक सद्भाव बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है. 

(संजय हजारिका एक लेखक हैं जो पूर्वोत्तर के मामलों में विशेषज्ञता रखते हैं और इस क्षेत्र में व्यापक यात्राएं करते हैं. यह हिंदी में अनूदित और संपादित है. अंग्रेजी में मूल लेख यहां पढ़ सकते हैं.)

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