एपीसीआर ने लॉन्च किया 'हेट क्राइम ट्रैकर'; 2014 से अब तक धर्म आधारित हिंसा की 3,576 घटनाएं दर्ज 

मकतूब मीडिया के मुताबिक,भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और नफरत भरे भाषणों (हेट स्पीच) पर लगाम लगाने और उनका सटीक डेटा रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है. एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) ने बुधवार को नई दिल्ली के 'कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया' में एक ऑनलाइन 'हेट क्राइम ट्रैकर' लॉन्च किया है. यह प्लेटफॉर्म 2014 से अब तक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर की गई हिंसा और नफरत की घटनाओं का एक सार्वजनिक और सत्यापित डेटाबेस है.

डेटा के मुख्य आंकड़े: 2014 से अब तक का सफर

एपीसीआर द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2014 से अब तक भारत में धर्म आधारित नफरत की 3,576 घटनाएं दर्ज की गई हैं. संगठन द्वारा किए गए प्रारंभिक विश्लेषण में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं.कुल घटनाओं में से 747 मामले सीधे शारीरिक हमले हैं जबकिलगभग 376 घटनाओं में अल्पसंख्यकों की संपत्तियों को निशाना बनाया गया.  रिपोर्ट के मुताबिक, 908 मामलों में 'धार्मिक पहचान' (जैसे पहनावा या हुलिया) हमले का मुख्य कारण बनी. इसके अलावा, मांसाहार की बिक्री या सेवन से जुड़े 547 मामले और धार्मिक त्योहारों के दौरान हुई हिंसा के 166 मामले दर्ज किए गए हैं.

सरकारी डेटा की कमी को पूरा करने की कोशिश

एपीसीआर के एडवोकेट फवाद शाहीन ने बताया कि इस पहल की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि 'नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो' जैसी सरकारी एजेंसियां नफरती अपराधों का व्यवस्थित डेटा जारी नहीं करती हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह ट्रैकर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और जमीनी सत्यापन पर आधारित है. हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि रिपोर्टिंग की कमी के कारण वास्तविक आंकड़े इससे कहीं अधिक हो सकते हैं.

वर्तमान में, इस ट्रैकर पर 2024 से 2026 के बीच की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है, जिसमें 1,153 नफरती अपराध और 761 हेट स्पीच की घटनाएं दर्ज हैं. पुराने डेटा को चरणों में अपलोड किया जा रहा है.

नागरिक समाज और बुद्धिजीवियों का समर्थन

इस लॉन्च कार्यक्रम में हर्ष मंदर, प्रशांत भूषण, पामेला फिलिपोज और अपूर्वानंद जैसे प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी शामिल हुए. वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि नफरत भरे भाषण और शारीरिक हिंसा के बीच गहरा संबंध है. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र दस्तावेजीकरण उन समुदायों के लिए न्याय की उम्मीद जगाता है जो संस्थागत निष्क्रियता का सामना कर रहे हैं.

यह ट्रैकर शोधकर्ताओं, पत्रकारों और नागरिक समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन साबित होगा, जो भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और कानूनी हस्तक्षेप की दिशा में काम कर रहे हैं.एपीसीआर ने प्रतिबद्धता जताई है कि नई घटनाओं के सत्यापन के साथ इस डेटाबेस को नियमित रूप से अपडेट किया जाता रहेगा.


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