पहले 2022, फिर 2025, अब 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य भी पूरा नहीं कर पाई मोदी सरकार

‘द वायर’ के मुताबिक, भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का केंद्र सरकार का लक्ष्य एक बार फिर तय समयसीमा से चूक गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार 2018 में इस लक्ष्य का ऐलान किया था और इसके लिए 2022 की समयसीमा तय की गई थी.

20 सितंबर 2018 को नई दिल्ली में इंडिया इंटरनेशनल कन्वेंशन एंड एक्सपो सेंटर की आधारशिला रखने के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को जल्द ही 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा था. लेकिन 2022 तक यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सका.

इसके बाद सरकार ने नई समयसीमा वित्त वर्ष 2024-25 तय की. लेकिन वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जारी सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP के आंकड़े बताते हैं कि यह लक्ष्य भी पूरा नहीं हुआ है.

मौजूदा आंकड़ों के अनुसार भारत की GDP करीब 346.4 लाख करोड़ रुपये है, जो लगभग 3.6 ट्रिलियन डॉलर के बराबर है. लक्ष्य से काफी पीछे रहने के बाद प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रियों ने सार्वजनिक मंचों और सरकारी बयानों में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य का जिक्र करना लगभग बंद कर दिया है.

प्रधानमंत्री मोदी लंबे समय तक यह कहते रहे हैं कि भारत जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. सरकार के कुछ अधिकारियों ने तो यह दावा भी किया था कि भारत यह उपलब्धि हासिल कर चुका है.

लेकिन आधिकारिक आर्थिक आंकड़ों के अनुसार भारत अभी दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. इसी तरह भारतीय शेयर बाजार का आकार भी हाल के हफ्तों में गिरकर दुनिया में छठे स्थान पर पहुंच गया है. इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की तेजी से ऊपर जाने की उम्मीदों को झटका लगा है.

भारत की आर्थिक स्थिति की तुलना जब पिछली यूपीए सरकार के कार्यकाल से की जाती है तो तस्वीर और स्पष्ट होती है. आंकड़ों के अनुसार 2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के दौरान डॉलर के लिहाज से भारत की GDP में सालाना औसत वृद्धि दर यानी CAGR 11 प्रतिशत से अधिक रही थी.

वहीं प्रधानमंत्री मोदी के 12 साल के कार्यकाल में डॉलर के लिहाज से GDP वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत के आसपास रही है. इससे पता चलता है कि वैश्विक मुद्रा में मापने पर भारत की आर्थिक रफ्तार धीमी हुई है.

इस धीमी वृद्धि का एक बड़ा कारण भारतीय रुपये की लगातार कमजोर होती स्थिति भी है. पिछले एक दशक में रुपये के मूल्य में गिरावट ने डॉलर के मुकाबले भारत की अर्थव्यवस्था के आकार को प्रभावित किया है.

आलोचकों का कहना है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां विनिर्माण क्षेत्र के निर्यात को पर्याप्त गति नहीं दे पाईं, आधुनिक तकनीकों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में पर्याप्त निवेश नहीं हो पाया, ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम नहीं हुई और स्थायी विदेशी निवेश आकर्षित करने में भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली.

रुपये के कमजोर होने के कारण डॉलर में मापी जाने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार सीमित रहा, जिससे 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचना मुश्किल हुआ.

किसी अर्थव्यवस्था की वृद्धि को केवल घरेलू मुद्रा में मापना कई बार वास्तविक स्थिति को छिपा सकता है. रुपये में GDP बढ़ने का कारण महंगाई और घरेलू खर्च भी हो सकता है, लेकिन वैश्विक स्तर पर किसी अर्थव्यवस्था की ताकत उसकी डॉलर में कीमत और अंतरराष्ट्रीय खरीद क्षमता से तय होती है.

5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य को लेकर सरकार की भाषा में आया बदलाव भी इस बदलाव को दिखाता है. कई वर्षों तक यह लक्ष्य आर्थिक नीति और राजनीतिक संदेश का प्रमुख हिस्सा रहा था. लेकिन अब सरकार के बयान अधिकतर 2047 तक विकसित भारत जैसे लंबे समय के लक्ष्यों पर केंद्रित हैं.

इस तरह 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य, जो कभी मोदी सरकार की आर्थिक महत्वाकांक्षा का प्रमुख प्रतीक था, अब सार्वजनिक चर्चा से लगभग गायब हो चुका है.

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