भारत ने तस्करों को रोकने के लिए एक बाड़ बनाई थी; 2024 से, पाकिस्तान 1,200 से अधिक बार इसके ऊपर से निकल गया है

31 जनवरी की सुबह 11:18 बजे, पंजाब के तरनतारन जिले के सीमावर्ती गांव गिलपण के राजस्व अधिकारी पिशौरा सिंह अपनी पगड़ी बांध रहे थे, तभी उन्हें आसमान से एक जानी-पहचानी भनभनाहट सुनाई दी.  बाहर निकलकर देखा तो पाकिस्तान की ओर से आया एक ड्रोन उनके घर की रसोई के बगीचे में आ गिरा. बाड़ से महज 700 मीटर दूर गिरे इस ड्रोन पर उर्दू में नीली मुहर लगी थी और उसमें दो पैकेटों में बंद एक किलोग्राम नशीला पदार्थ बंधा था. पिशौरा सिंह ग्राम रक्षा समिति के सदस्य हैं. उन्होंने पुलिस को सूचना देनी चाही, लेकिन स्थानीय अधिकारियों से संपर्क नहीं हो सका. आखिरकार तरनतारन के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के हस्तक्षेप के बाद ही पुलिस और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की टीम मौके पर पहुंची.

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में मन अमन सिंह छिना और कमलदीप सिंह बरार की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना पंजाब की 550 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रोजाना खेले जा रहे चूहे-बिल्ली के खेल की एक बानगी भर है.  सुरक्षा एजेंसियों द्वारा 2024 से अब तक इंटरसेप्ट किए गए 1,200 से अधिक ड्रोन के आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि पाकिस्तान से होने वाली नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी अब तकनीकी रूप से बेहद उन्नत हो चुकी है.

आधुनिक 'मैगिनॉट लाइन' बनी 462 किमी लंबी बाड़

1980 और 90 के दशक में उग्रवाद दौर के दौरान घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए पंजाब में 462 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा (जीरो लाइन) पर 8 से 12 फीट ऊंची बहुस्तरीय कटीली और हाई-वोल्टेज तारों की बाड़ लगाई गई थी. लेकिन अब जब घुसपैठ का तरीका हवाई हो चुका है, तो यह बाड़ काफी हद तक एक आधुनिक 'मैगिनॉट लाइन' साबित हो रही है—द्वितीय विश्व युद्ध की वह फ्रांसीसी किलेबंदी जिसे जर्मन सेना ने आसानी से दरकिनार कर दिया था.

सुरक्षा विश्लेषण के मुताबिक, 2024 में बीएसएफ़ और सहयोगी एजेंसियों ने पंजाब में लगभग 300 ड्रोन रोके थे, 2025 में 287 और चालू वर्ष के अगस्त तक भी लगभग इतने ही ड्रोन पकड़े जा चुके हैं. एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि तस्करों को ड्रोन तकनीक का प्रशिक्षण देने में पाकिस्तानी सेना की सक्रिय भागीदारी के स्पष्ट सबूत मिले हैं.

तकनीक का उभार: सैटेलाइट लिंक और 'रिटर्न-टू-होम'

2019 में जब पंजाब सीमा पर पहली बार ड्रोन देखे गए थे, तब वे साधारण रेडियो-फ्रीक्वेंसी नियंत्रण से चलते थे. लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. तस्कर अब 'स्टारलिंक' सैटेलाइट कम्यूनिकेशन, एंटी-जैमिंग क्षमता और जीपीएस-नेविगेटेड सिस्टम से लैस चीनी ड्रोन (जैसे DJI माविक 4 प्रो और भारी पेलोड क्षमता वाला DJI मैट्रिस 300 RTK) का इस्तेमाल कर रहे हैं.

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पाकिस्तानी तस्करों ने अपने ड्रोन में 'रिटर्न-टू-होम' सुरक्षा तंत्र स्थापित कर दिया है. जब भारतीय एंटी-ड्रोन सिस्टम (जैसे पंजाब सरकार का 'बाज़ आँख' या बीएसएफ के पोर्टेबल जैमर) कंट्रोल सिग्नल में बाधा डालते हैं, तो ड्रोन तुरंत इस हस्तक्षेप को पहचान लेते हैं और बेअसर होने से पहले ही स्वचालित रूप से पाकिस्तान स्थित अपने लॉन्च पैड की ओर वापस उड़ जाते हैं.

पाकिस्तान के आठ प्रमुख 'लॉन्च पैड' और भारत में 'ड्रॉप ज़ोन'

सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तानी पंजाब में आठ प्रमुख ठिकानों की पहचान की है जहाँ से भारत में ड्रोन उड़ाए जाते हैं: जाहमन: तरनतारन के खालरा सेक्टर के ठीक सामने, मस्तेकी: सेहजरा एन्क्लेव में, जो खेमकरण के विपरीत स्थित है, अन्य ठिकाने: कसूर, किला जीवन सिंह (अटारी के सामने), वाघा और नरोवाल (गुरदासपुर के सामने).

भारत में ये ड्रोन मुख्य रूप से भिंडी सैदां, अटारी, राजाताल, ढल्ल, दलेरी, मारी मेघां, वां और खेमकरण के आसपास के गांवों में खेप गिराते हैं.

सीमावर्ती ग्रामीणों का संघर्ष और सुरक्षा चुनौतियां

अमृतसर का महावा गांव जीरो लाइन से महज एक किलोमीटर दूर है.  गांव की 2,800 एकड़ जमीन में से 150 एकड़ बाड़ के पार है. ग्राम रक्षा समिति के सदस्य हरचंद सिंह महावा के अनुसार, ड्रोन अक्सर भारतीय सीमा के अंदर 6 किलोमीटर तक आकर सीधे आवासीय बस्तियों और खेतों के ऊपर से गुजरते हैं. कई बार नेविगेशन गलती के कारण खेप सीधे किसानों के घरों या खेतों में गिर जाती है, जिससे निर्दोष ग्रामीणों को कानूनी पचड़ों का डर सताता है.

डेटा के अनुसार, ड्रोन गतिविधियां मुख्य रूप से गुरुवार और शनिवार को रात 10 बजे से सुबह 4 बजे के बीच सबसे अधिक (12 से 15 ड्रोन प्रति घंटा) होती हैं. इन ड्रोन की औसत उड़ान अवधि 15 से 45 मिनट के बीच होती है और ये 500 से 2,500 फीट तक की ऊंचाई पर उड़ते हैं.

पंजाब सरकार ने 51.4 करोड़ रुपये की लागत से 'बाज़ आँख' एंटी-ड्रोन ग्रिड तैनात किया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि 550 किमी लंबी सीमा को पूरी तरह सुरक्षित करने के लिए कम से कम 100 अतिरिक्त जैमिंग इकाइयों, एआई-आधारित ट्रैकिंग, और स्थानीय ग्राम समितियों के साथ त्वरित ज़मीनी प्रतिक्रिया बल के मजबूत तालमेल की सख्त आवश्यकता है.

Previous
Previous

उमर खालिद की गिरफ्तारी के छह साल: इतिहासकार और कार्यकर्ता की विरासत

Next
Next

सुरजीत एस भल्ला | ‘ब्रिक्स’ को भूल जाइए; यूरोप और अमेरिका के वैश्विक भागीदार के रूप में है भारत का भविष्य