उमर खालिद की गिरफ्तारी के छह साल: इतिहासकार और कार्यकर्ता की विरासत

'काउंटरकरंट्स' में डेबोर्शी चक्रवर्ती ने उमर खालिद की गिरफ्तारी के छह वर्ष पूरे होने के मौके पर उनके राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष को याद किया है. अक्टूबर 2020 में जब लेखक इतिहास में पीएचडी शुरू करने के लिए भारत से बाहर गए, उससे कुछ दिन पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से इतिहास में पीएचडी पूरी कर चुके उमर खालिद को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. छह साल बाद भी केंद्र सरकार ने उनका मुकदमा शुरू नहीं किया है और वह लगातार जेल में हैं.

उमर खालिद की आदिवासी प्रतिरोध पर लिखी पीएचडी थीसिस हाल ही में एक किताब के रूप में प्रकाशित हुई है. पूर्वी भारत में आदिवासी प्रतिरोध के अपेक्षाकृत कम अध्ययन किए गए इतिहास पर उनका शोध आने वाले समय में विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जा सकता है और छात्रों को इतिहास के शोध की ओर प्रेरित कर सकता है. लेकिन यहां ध्यान इतिहासकार उमर से ज्यादा उस कार्यकर्ता उमर पर है, जिसने पिछले एक दशक के भारतीय छात्र और लोकतांत्रिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

2016: छात्र आंदोलन से शुरुआत

उमर खालिद पहली बार 2016 में जेएनयू के दूसरे छात्र कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा सरकार के निशाने पर आए. उन पर परिसर में देशद्रोही नारे लगाने का आरोप लगाया गया और गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. बाद में यह आरोप झूठा साबित हुआ. उनकी गिरफ्तारी ने देशभर में बड़े छात्र आंदोलनों को जन्म दिया. यह आंदोलन हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र कार्यकर्ता रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के खिलाफ चल रहे विरोध से भी जुड़ गया.

भारत में मोदी सरकार के दौर के छात्र आंदोलनों का इतिहास लिखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए फरवरी 2016 में जेएनयू और हैदराबाद विश्वविद्यालय से शुरू हुए आंदोलन को समझना जरूरी होगा. गिरफ्तारी, पुलिस हिरासत, हमलों और मीडिया के दबाव के बावजूद उमर और दूसरे छात्र पीछे नहीं हटे. रिहाई के बाद उन्होंने जेएनयू लौटकर बड़े छात्र प्रदर्शन का नेतृत्व किया और संदेश दिया कि छात्र दमन के सामने झुकेंगे नहीं.

गोदी मीडिया को चुनौती

2016 में "गोदी मीडिया" शब्द अभी प्रचलन में नहीं आया था, लेकिन मीडिया के एक हिस्से की सरकार के प्रति बढ़ती नजदीकी साफ दिखाई देने लगी थी. अंग्रेजी और क्षेत्रीय मीडिया के कई हिस्सों पर भाजपा सरकार के प्रति चापलूसी और असहमति को दबाने के आरोप लग रहे थे.

इस दौर में अर्नब गोस्वामी भारतीय टेलीविजन मीडिया के सबसे प्रभावशाली चेहरों में उभरे. लाइव कार्यक्रमों में मेहमानों को अपमानित करने और सरकार विरोधी आवाजों को कठघरे में खड़ा करने की उनकी शैली चर्चित रही. इसी दौर में उमर खालिद ने टेलीविजन पर उनके सामने सरकार और मीडिया के फैलाए जा रहे गलत और भ्रामक नैरेटिव को चुनौती दी.

आज जब बड़ी संख्या में छात्र और युवा मुख्यधारा के टेलीविजन समाचार चैनलों का बहिष्कार करते हैं, उस समय की उमर की भूमिका को याद करना महत्वपूर्ण है. उन्होंने लाखों दर्शकों के सामने एक बेहद शक्तिशाली मीडिया चेहरे को चुनौती दी और असहमति की आवाज को टीवी स्टूडियो तक पहुंचाया.

छात्र कार्यकर्ता से राजनीतिक कार्यकर्ता तक

समय के साथ उमर का राजनीतिक सफर कैंपस तक सीमित नहीं रहा. वह देशभर में घूमने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता बने. उनकी राजनीति भी समय के साथ बदली और उन्होंने नीतियों, सत्ता और लोगों के साथ संवाद के अलग-अलग तरीके अपनाए.

किसी स्थापित विपक्षी राजनीतिक दल का हिस्सा न होने के बावजूद वह राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाने वाला नाम बन गए. दक्षिणपंथी हमलावरों ने उन पर गोली चलाने की कोशिश भी की, लेकिन आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सवाल उठे.

2019 के अंत में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ आंदोलन उमर के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण दौर बना. नागरिकता संशोधन अधिनियम को संविधान विरोधी बताते हुए देशभर में विरोध शुरू हुआ. शाहीन बाग में महिलाओं के नेतृत्व में आंदोलन खड़ा हुआ, जिसने संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा को केंद्र में ला दिया.

उमर खालिद शाहीन बाग पहुंचे, देश के अलग-अलग शहरों में गए, भाषण दिए और लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया. नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ आंदोलन ने मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ उन लोगों को भी एकजुट किया जो भारतीय संविधान और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की रक्षा के लिए खड़े थे.

महामारी के बीच गिरफ्तारी

उमर खालिद को ऐसे समय गिरफ्तार किया गया जब देश कोरोना महामारी के पहले दौर से उबर रहा था. दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए सांप्रदायिक दंगों के मामले में उन पर साजिश रचने का आरोप लगाया गया. हालांकि, हिंसा से पहले भड़काऊ भाषण देने वाले कई दूसरे लोगों और वास्तविक हिंसा में शामिल लोगों की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल उठे.

सितंबर 2020 में उनकी गिरफ्तारी ऐसे समय हुई जब महामारी, लॉकडाउन और सरकार की नीतियों को लेकर देश पहले ही गंभीर संकट से गुजर रहा था. बड़े पैमाने पर विरोध की संभावना सीमित थी और गिरफ्तारी के खिलाफ व्यापक आंदोलन खड़ा करना मुश्किल था.

उमर का मानना था कि देश के मुसलमान भी भारत से उतना ही प्रेम करते हैं जितना कोई अन्य नागरिक. 2019 के आंदोलन में उनकी देशभक्ति की व्याख्या संविधान और समान नागरिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ी थी. उनकी गिरफ्तारी को मुस्लिम युवाओं के लिए एक संदेश के रूप में भी देखा गया कि सरकार की नीतियों को चुनौती देने और अपने संवैधानिक अधिकारों की आवाज उठाने की एक सीमा है.

समाजवाद और जाति उन्मूलन का सवाल

उमर की राजनीति केवल नागरिकता या मुस्लिम अधिकारों तक सीमित नहीं रही. वह सामाजिक और आर्थिक समानता के पक्षधर रहे. उनका सपना ऐसा भारत था जहां 99 प्रतिशत लोगों के श्रम और संसाधनों से केवल एक प्रतिशत लोगों की संपत्ति न बढ़े.

वह जाति व्यवस्था और जातिगत शोषण के उन्मूलन की भी वकालत करते रहे. मजदूरों, किसानों, दलितों, मुसलमानों और महिलाओं के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ न्याय की मांग उनकी राजनीति का हिस्सा रही.

यही व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण उनकी गिरफ्तारी के पीछे सरकार के डर का आधार बताया जाता है. जेल में रखकर उन्हें देशभर में घूमने, लोगों से संवाद करने और अपने विचारों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने से रोका जा सकता है, लेकिन उनकी राजनीति को समाप्त करना संभव नहीं हुआ.

जेल से बना प्रतिरोध का प्रतीक

उमर को जेल में रखकर सरकार ने उन्हें एक उदाहरण बनाने की कोशिश की, लेकिन छह साल बाद वह एक प्रतीक बन चुके हैं. वह निडरता, सपने देखने और सत्ता के सामने सवाल खड़े करने की छवि से जुड़े हैं.

उनकी गिरफ्तारी और लंबी कैद ने भारत से बाहर भी मानवाधिकार और राजनीतिक स्वतंत्रता के सवालों को जन्म दिया है. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी रिहाई की मांग उठती रही है. उनका नाम दुनिया के दूसरे राजनीतिक कैदियों, जैसे मरवान बरगूती, के साथ लिया जाता है.

इतिहास में सत्ता अक्सर यह मान लेती है कि किसी व्यक्ति को जेल में डालकर उसके विचारों और संघर्ष को खत्म किया जा सकता है. लेकिन मानव इतिहास संघर्षों का इतिहास भी है. उमर खालिद की छह साल की कैद इसी संघर्ष की एक मिसाल बन गई है.

वह अभी जेल में हैं, लेकिन उनके संघर्ष की कहानी जेल की दीवारों से बाहर पहुंच चुकी है. भविष्य में जब भारत के हालिया छात्र आंदोलनों, नागरिकता आंदोलन और लोकतांत्रिक प्रतिरोध का इतिहास लिखा जाएगा, तो उमर खालिद का नाम उस इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों में शामिल हो सकता है.

(डेबोर्शी चक्रवर्ती बर्लिन की फ्री यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हैं. )

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