भारत में 2024 में बच्चों के खिलाफ हर दिन दर्ज हुए 512 अपराध, एक दशक में मामले दोगुने

‘इंडिया स्पेंड’ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2024 के दौरान बच्चों के खिलाफ अपराध के 1,87,702 मामले दर्ज किए गए, यानी औसतन हर दिन 512 मामले. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार यह पिछले दस वर्षों में दर्ज सबसे बड़ी संख्या है. 2015 में ऐसे 94,172 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2024 तक यह आंकड़ा लगभग दोगुना हो गया. कोविड-19 महामारी के पहले वर्ष 2020 को छोड़कर हर साल मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई.

2024 में दर्ज कुल मामलों में से लगभग दो-पांचवां हिस्सा अपहरण और भगाकर ले जाने के मामलों का था, जबकि एक-तिहाई से अधिक मामले लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) के तहत दर्ज किए गए. 2023 की तुलना में 2024 में ऐसे मामलों में करीब 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई.

पिछले एक दशक में बिहार में बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई, जहां मामलों की संख्या छह गुना तक बढ़ गई. तमिलनाडु, झारखंड और ओडिशा में भी मामलों में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी हुई. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते आंकड़े केवल अपराध बढ़ने का संकेत नहीं हैं. शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया आसान होने और जागरूकता बढ़ने से भी अधिक मामले सामने आ रहे हैं.

बाल संरक्षण संस्था मुस्कान की सह-संस्थापक और निदेशक शर्मिला राजे के अनुसार आज माता-पिता, शिक्षक और किशोर पहले की तुलना में अधिक जागरूक हैं. ऐसे में बच्चों द्वारा बताए गए शोषण या हिंसा के मामलों को दर्ज कराने की संभावना भी बढ़ी है.

दिल्ली ने देश के 20 लाख से अधिक आबादी वाले 19 महानगरों में दर्ज बच्चों के खिलाफ अपराधों के लगभग एक-तिहाई मामलों का हिस्सा दर्ज किया. वहीं कोयंबटूर और लखनऊ में 2015 के बाद मामलों में पांच गुना से अधिक वृद्धि देखी गई.

97 प्रतिशत पॉक्सो मामलों में आरोपी परिचित व्यक्ति

2024 में देशभर में पॉक्सो कानून के तहत 69,191 मामले दर्ज किए गए. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि अनेक मामले कभी पुलिस रिकॉर्ड तक पहुंच ही नहीं पाते.

शर्मिला राजे कहती हैं कि कई छोटे बच्चे यह समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ क्या हुआ है. कई बार बच्चे अपनी बात कहने की कोशिश करते हैं, लेकिन परिवार या समाज उनकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लेता.

पॉक्सो के तहत दर्ज 44,126 मामले गंभीर यौन उत्पीड़न और गंभीर दुष्कर्म से संबंधित धाराओं के अंतर्गत थे. पीड़ितों में लगभग आधे बच्चे 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग के थे.

आंकड़े बताते हैं कि इन मामलों में 97 प्रतिशत आरोपी बच्चे के परिचित थे. पिछले दस वर्षों में यह अनुपात लगातार 94 से 97 प्रतिशत के बीच बना हुआ है. यानी अधिकांश मामलों में खतरा किसी अजनबी से नहीं, बल्कि परिवार, रिश्तेदारी या परिचित दायरे से आता है.

राजे के अनुसार पारिवारिक प्रतिष्ठा, सामाजिक दबाव और लड़कियों के भविष्य को लेकर चिंताओं के कारण कई परिवार ऐसे मामलों को सार्वजनिक नहीं करना चाहते. यही वजह है कि यौन शोषण के अनेक मामले दर्ज ही नहीं हो पाते.

2024 में अपहरण और भगाकर ले जाने के 75,108 मामले दर्ज किए गए. इनमें से लगभग 59 प्रतिशत मामले ऐसे थे जिनमें लापता बच्चों को अपहृत मानकर दर्ज किया गया. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे वास्तविक अपहरण और गरीबी, तस्करी या घरेलू परिस्थितियों के कारण घर छोड़ने वाले बच्चों के मामलों में अंतर करना मुश्किल हो जाता है.

कोविड के बाद तेजी से बढ़े मामले

2015 से 2024 के बीच बच्चों के खिलाफ अपराध की दर भी लगातार बढ़ी है. प्रति एक लाख बच्चों पर अपराध दर 21.1 से बढ़कर 42.3 हो गई.

बिहार ने एक दशक में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की. वहीं 2024 में कुल मामलों की संख्या के लिहाज से महाराष्ट्र पहले स्थान पर रहा, उसके बाद उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का स्थान रहा. अपराध दर के मामले में दिल्ली सबसे ऊपर रही, जहां प्रति एक लाख बच्चों पर 138.3 मामले दर्ज किए गए.

बाल श्रम और बाल विवाह जैसे अपराध भी चिंता का विषय बने हुए हैं. 2024 में बिहार में बाल श्रम के 551 मामले दर्ज हुए, जो राष्ट्रीय कुल का 45 प्रतिशत थे. वहीं असम और तमिलनाडु मिलकर देश में दर्ज बाल विवाह के लगभग 60 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार रहे.

यूनिसेफ की 2024 रिपोर्ट के अनुसार बाल श्रम करने वाले अधिकांश बच्चे ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं. इनमें बड़ी संख्या कृषि क्षेत्र में काम करती है और लगभग आधे बच्चे अपने ही परिवारों के लिए श्रम करते हैं.

महानगरों में बच्चों के खिलाफ अपराध में दिल्ली सबसे आगे

2015 से 2024 के बीच देश के 19 बड़े महानगरों में दर्ज बच्चों के खिलाफ अपराधों में दिल्ली की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत रही. इसके बाद मुंबई का स्थान रहा, जहां 16 प्रतिशत मामले दर्ज हुए, जबकि बेंगलुरु की हिस्सेदारी 8 प्रतिशत रही.

हालांकि दिल्ली में 2015 की तुलना में मामलों में 5 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है. दूसरी ओर कोयंबटूर और लखनऊ में सबसे अधिक वृद्धि हुई, जहां मामलों में क्रमशः 539 प्रतिशत और 529 प्रतिशत का उछाल आया.

ये आंकड़े बताते हैं कि बच्चों की सुरक्षा का संकट केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि तेजी से विकसित हो रहे दूसरे शहरी क्षेत्रों में भी गंभीर रूप ले रहा है.

जांच और सुनवाई के लिए लंबित रहते हैं अधिकांश मामले

बच्चों के खिलाफ अपराधों में केवल मामले दर्ज होना ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि न्याय प्रक्रिया की धीमी गति भी बड़ी समस्या बनी हुई है.

2024 में पुलिस ने 1,81,446 मामलों का निपटारा किया, लेकिन केवल 1,11,426 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किया गया. आरोपपत्र दाखिल करने की दर 61.4 प्रतिशत रही, जो पिछले एक दशक में सबसे कम है.

सबसे अधिक मामलों वाली श्रेणी अपहरण और भगाकर ले जाने के मामलों में आरोपपत्र दाखिल करने की दर केवल 25.3 प्रतिशत रही. इसके विपरीत पॉक्सो मामलों में 95 प्रतिशत, बाल श्रम मामलों में 93 प्रतिशत और बाल विवाह मामलों में 89 प्रतिशत मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए गए.

राज्यों के बीच भी बड़ा अंतर दिखाई देता है. दिल्ली में आरोपपत्र दाखिल करने की दर केवल 32 प्रतिशत रही, जबकि तमिलनाडु में यह 94 प्रतिशत थी.

जांच लंबित मामलों की संख्या 2015 के 35,921 से बढ़कर 2024 में 85,058 हो गई. अदालतों में स्थिति और भी गंभीर है. 2024 के दौरान बच्चों के खिलाफ अपराधों से जुड़े 7,07,523 मामले विचाराधीन थे, जिनमें से 6,44,887 मामले यानी 91 प्रतिशत वर्ष के अंत तक लंबित रहे.

एक दशक पहले अदालतों में लंबित मामलों की संख्या 1,65,853 थी. 2024 तक यह बढ़कर 6,44,887 हो गई, यानी लगभग चार गुना वृद्धि.

शर्मिला राजे कहती हैं कि विशेष अदालतों और न्यायाधीशों की कमी न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है. मामलों के वर्षों तक लंबित रहने से गवाहों का भरोसा कमजोर पड़ता है और बच्चों के लिए बार-बार दर्दनाक घटनाओं को दोहराना मुश्किल हो जाता है.

2024 में अदालतों ने 20,513 लोगों को दोषी ठहराया और राष्ट्रीय दोषसिद्धि दर 33.9 प्रतिशत रही. वहीं एक अध्ययन के अनुसार पॉक्सो मामलों के निपटारे में औसतन 510 दिन लगते हैं. न्यायिक रिक्तियों, बाल-अनुकूल बुनियादी ढांचे की कमी और विशेष प्रशिक्षण के अभाव के कारण फास्ट ट्रैक अदालतों में भी बड़ी संख्या में मामले वर्षों तक लंबित बने रहते हैं.


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