वर्ष 2025 में राज्य विधानसभाओं की बैठकें कम हुईं, लेकिन अधिक विधेयक पारित हुए: रिपोर्ट
'पीआरएस एनुअल रिव्यू ऑफ स्टेट लॉज़ 2025' की रिपोर्ट के अनुसार, भारत भर की राज्य विधानसभाओं ने वर्ष 2025 में 600 से अधिक विधेयक पारित किए, जो हाल के वर्षों में उनकी सबसे बड़ी संख्या है. इसके बावजूद, विधानसभाएं औसतन केवल 24 दिनों के लिए ही बैठीं और समीक्षा के लिए समितियों के पास 20 में से एक से भी कम विधेयक भेजे गए. इस रिपोर्ट में 27 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया था.
इस रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड विधानसभा ने बिना किसी डिप्टी स्पीकर (उपाध्यक्ष) के पूरे 21 साल तक काम किया. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 178 के अनुसार, सभी विधानसभाओं के लिए सभी सत्रों के दौरान एक पूर्णकालिक डिप्टी स्पीकर का होना अनिवार्य है.
इसके अलावा, रिपोर्ट से पता चला कि 2025 में विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की बैठकें औसतन 24 दिन हुईं. इस सूची में ओडिशा 43 बैठकों के साथ सबसे ऊपर रहा. वहीं नागालैंड विधानसभा केवल 7 बैठकों के साथ सूची में सबसे नीचे थी. 24 दिनों का राष्ट्रीय औसत, वर्ष 2024 के 21 दिनों और 2023 के 23 दिनों के मुकाबले एक सुधार है, लेकिन ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में विस्मय बसु के अनुसार, यह अभी भी उन लक्ष्यों से काफी पीछे है जो राज्यों ने कानून या प्रक्रिया के तहत अपने लिए तय किए हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 30 प्रतिशत विधेयक सदन के पटल पर पेश किए जाने के दिन ही पारित कर दिए गए. आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, झारखंड, मिजोरम, पुडुचेरी और पंजाब की विधानसभाओं ने प्रत्येक विधेयक को या तो उसी दिन या फिर अगले ही दिन पारित कर दिया. कर्नाटक ने एक ही बैठक में 17 विधेयक पास कर दिए.
बजट निगरानी की चर्चा में भी इसी तरह का अंतर देखा गया। देश भर की विधानसभाओं ने औसतन 8 दिनों तक अपने बजट पर बहस की. तमिलनाडु ने इस पर 27 दिनों तक चर्चा की, जबकि पंजाब ने इसे दो दिनों के भीतर ही समेट दिया.
गोवा, हरियाणा और तमिलनाडु ऐसे राज्य थे जहाँ प्रस्तावित खर्च का 100 प्रतिशत हिस्सा चर्चा के लिए सदन के सामने रखा गया था. लेकिन, असम में खर्च की योजनाओं के केवल 23 प्रतिशत हिस्से पर ही बहस हुई.
राज्यों ने 2025 में 127 अध्यादेश जारी किए, जो 2024 के 100 अध्यादेशों से 27 प्रतिशत अधिक हैं. कुल अध्यादेशों में स्थानीय शासन का हिस्सा 31 प्रतिशत रहा, जिसके बाद शिक्षा 13 प्रतिशत पर थी.
कई राज्यों ने 'जन विश्वास' की तर्ज पर कानून बनाए, जो आपराधिक दंड को दीवानी दंड में बदलते हैं. कर्नाटक ने 'हेट स्पीच और हेट क्राइम' (नफरती भाषण और अपराध) विधेयक तथा 'क्राउड कंट्रोल' (भीड़ नियंत्रण) विधेयक दोनों पेश किए. असम ने बहुविवाह विरोधी कानून पारित किया और निजी विश्वविद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें राज्य के छात्रों के लिए आरक्षित कीं.

