टी.एम. कृष्णा | मोदी को सवाल पूछे जाने से डर लगता है

प्रमुख भारतीय संगीतकार और विद्वान टी.एम. कृष्णा ने ‘द टेलीग्राफ’ में लिखा है कि 2014 के बाद से प्रधानमंत्री का प्रेस कॉन्फ्रेंस न करना और सीधे सवालों से बचना उनकी प्रशासनिक कमजोरी को दिखाता है, जिसे प्रचारकों द्वारा 'राजा की तरह सीधे जनता से संवाद' की खूबी बताकर पेश किया जाता है. वर्तमान में मीडिया का दमन अपने सबसे निर्लज्ज रूप में है, जहां मुख्यधारा का मीडिया सत्ता का जयकार करने में लगा है. कृष्णा लिखते हैं कि भारत में आज जो मीडिया का दमन दिख रहा है, वह असल में हमारे गहरे पदानुक्रमित समाज, उम्रवाद और पितृसत्तात्मक सोच का ही परिणाम है, जहां हम उपनिषदों की तर्कशीलता की दुहाई तो देते हैं, लेकिन असलियत में न तो हमें सवाल पूछना पसंद है और न ही सवाल पूछने वाले. मूल लेख अंग्रेजी में है, जिसको यहां हिंदी में अनुदित कर प्रस्तुत किया जा रहा है:

कृष्णा के मुताबिक, एक युवा नॉर्वेजियन पत्रकार (हेले लिंग) द्वारा नरेंद्र मोदी से यह पूछना कि वह भारत में प्रेस के सवालों के जवाब क्यों नहीं देते, ने एक बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया. हेले लिंग को ट्रोल किया गया और उनकी राजनीतिक प्राथमिकताओं तथा फंडिंग को लेकर तरह-तरह की साजिशों की कहानियां फैलाई गईं. उन्हें बदनाम करने की हर संभव कोशिश की गई. कई भारतीय इस बात से परेशान नहीं थे कि मोदी ने कोई सवाल नहीं लिया, बल्कि वे इस बात से परेशान थे कि किसी और नेता ने ऐसा क्यों किया.

मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के बाद से प्रेस से कोई सवाल नहीं लिया है. उन्होंने केवल नागरिकों को सीधे संबोधित किया है या कुछ चुनिंदा पत्रकारों या अभिनेताओं के साथ पहले से तय (क्यूरेटेड) बातचीत में भाग लिया है. यह स्पष्ट है कि उन्हें सवाल पूछे जाने या चुनौती दिए जाने से डर लगता है. हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि उनके 'स्पिन डॉक्टरों' (प्रचारकों) ने इस कमजोरी को एक खूबी में बदल दिया है. हमें बताया जाता है कि मोदी सीधे जनता से बात करना पसंद करते हैं, ठीक एक राजा की तरह. पूरे भारतीय प्रेस को खलनायक बना दिया गया है, और प्रधानमंत्री द्वारा उनके हाशिए पर धकेले जाने को सही ठहराया गया है. भारतीय प्रेस, विशेष रूप से टेलीविजन मीडिया, इतना पक्षपाती हो गया है कि उसने विपक्ष के लिए सारे सवाल सुरक्षित रख लिए हैं, जबकि मोदी के लिए वह अग्रिम पंक्ति का चीयरलीडर (जयकार करने वाला) बन गया है.

दुर्भाग्य से मोदी के लिए, यह बंद और सुरक्षात्मक माहौल हर जगह मौजूद नहीं है, खासकर स्कैंडिनेवियाई देशों में. नतीजतन, वह और उनका स्टाफ हैरान रह गए और उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी.

मोदी के आलोचक पिछले प्रधानमंत्रियों के मीडिया और कार्यकर्ताओं द्वारा इंटरव्यू लिए जाने के वीडियो और तस्वीरें साझा कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि मोदी द्वारा प्रेस से बचना एक नया चलन है.  हालांकि मैं इस आकलन से सहमत हूं, लेकिन अतीत को आदर्श मानकर उसका महिमामंडन करना गलत है. हम हमेशा से एक ऐसा देश रहे हैं जहां राजनेता सवाल पूछे जाने पर असहज महसूस करते रहे हैं. सभी दलों के राजनेताओं द्वारा प्रेस को प्रताड़ित किए जाने या उन पर चिल्लाने की अनगिनत घटनाएं हैं. प्रकाशनों पर मामले दर्ज करना और पत्रकारों की मनमानी गिरफ्तारी कोई नई बात नहीं है. आज हम जो अनुभव कर रहे हैं, वह मीडिया दमन का एक पूर्ण और निर्लज्ज रूप है. लेकिन इस रवैये के बीज हमारी सामाजिक चेतना में ही निहित हैं.

हम एक गहरे पदानुक्रमित समाज रहे हैं और आज भी हैं, जो वर्ग, जाति, लिंग और जेंडर द्वारा निर्धारित होता है, जहां सामंतवाद फलता-फूलता है. ऐसे माहौल में, किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और उसकी शक्ति का पैमाना ही उसकी स्वतंत्रता को निर्धारित करता है. सोचने की स्वतंत्रता भी सीमित है. ये सीमाएं जन्म के समय से ही तय हो जाती हैं. किसी व्यक्ति की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि के कारण बाद में कुछ लचीलापन जरूर आता है. यह सब सवाल पूछने के दायरे को नियंत्रित करता है. लेकिन जब विचार की वास्तविक स्वतंत्रता ही न हो, तो कोई सवाल नहीं हो सकता. वास्तव में, हमें अपने घरों और स्कूलों में सवाल पूछना सिखाया ही नहीं जाता. डर और आज्ञाकारिता को हमारे भीतर बिठाया जाता है.

एक राजनेता ऐसे ही समाज का उत्पाद होता है. सत्ता में बैठा व्यक्ति महसूस करता है कि उसे दूसरों के प्रति अहंकारी और नीचा दिखाने का अधिकार है. व्यक्ति से गंभीरता से सवाल पूछना उस सामाजिक व्यवस्था को तोड़ता है जिसने उसे वह शक्ति दी है जिसका वह आनंद लेता है. यह केवल सवाल का ही नहीं, बल्कि इस बात का भी मामला है कि सवाल कौन पूछ रहा है. जेंडर और जाति इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. पत्रकार लिंग के मामले में, तथ्य यह है कि वह एक महिला थीं, जिससे यह प्रतिक्रिया और भी अधिक हिंसक हो गई. आखिर मोदी ने खुद को एक 56 इंच के सीने वाले ऐसे 'अल्फा पुरुष' के रूप में पेश किया है जो विश्व नेताओं से मुकाबला करता है. उनके हर वीडियो में उन्हें अकेले चलते और लोगों की तरफ हाथ हिलाते हुए दिखाया जाता है. इस आदर्श पुरुष को पूरी दुनिया के सामने एक महिला ने कोने में धकेल दिया. मोदी खुद भले ही परेशान न हुए हों, लेकिन उनके प्रशंसकों को लगा जैसे उनका अपमान हुआ है. उन्होंने उनके बचाव में आने और उस महिला पर हमला करने की आवश्यकता महसूस की. जब महिलाओं पर हमला किया जाता है, तो भाषा तुरंत अभद्र स्तर पर उतर आती है. यदि वह प्रश्न किसी पुरुष ने पूछा होता, तो भी प्रतिक्रिया तीखी होती, लेकिन इतनी शर्मनाक नहीं होती.  यदि लिंग एक अश्वेत महिला होतीं, तो मुझे पूरा विश्वास है कि हमलों में एक नस्लवादी कोण भी शामिल होता.

वहाँ एक और समस्या थी: लिंग की उम्र! भारतीयों के लिए उम्र एक बड़ा कारक है. बुजुर्गों का सम्मान करना सभ्य होने की पूर्व शर्त माना जाता है. हालांकि, व्यवहार में इस सम्मान का वास्तव में क्या अर्थ है, यह स्पष्ट नहीं है. अक्सर इसका अर्थ बड़ों की आज्ञा का बिना सोचे-समझे पालन करना होता है - 'जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करो, जब तुम बड़े हो जाओगे तो समझ जाओगे।' युवाओं को बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता. जो लोग इन बेड़ियों को तोड़ने की हिम्मत करते हैं, उन्हें तिरस्कृत किया जाता है. ऐसे युवाओं के लिए एक तमिल अभिव्यक्ति है - 'अदिगप्परासंगी' या एक अति-उत्सुक, ढीठ व्यक्ति जो बहुत अधिक बोलता है या अनावश्यक प्रश्न पूछता है. लिंग इस परिभाषा में बिल्कुल फिट बैठती हैं!

उन पर हुए हमलों में भारत के बारे में उनके ज्ञान पर सवाल उठाना भी शामिल था. विदेश मंत्रालय के सचिव ने उनके सवाल का जवाब देने के बजाय, लिंग को इतिहास का पाठ पढ़ा दिया. वह यह भी जता रहे थे कि वह युवा हैं और भारत के बारे में कुछ नहीं जानतीं. यह एक 'एजइस्ट' (उम्र के आधार पर भेदभाव करने वाला) हमला था. अगर वह बड़ी उम्र की होतीं, तो लोग इस रास्ते पर नहीं जाते.

फिर बात आती है कि सवाल किस तरह से पूछा गया था. लिंग ने सचमुच प्रधानमंत्री का रास्ता रोका था. लेकिन उनके पास कोई और विकल्प नहीं था. वह जा रहे थे और वह अपना सवाल पूछना चाहती थीं. इसका तात्पर्य यह है कि इस तरह से आमने-सामने की पत्रकारिता काम करती है. भारतीय संदर्भ में, सवाल 'सम्मानपूर्वक' पूछे जाने चाहिए.  इसका सीधा मतलब यह है कि जिस व्यक्ति से सवाल पूछा जा रहा है, उसे असहज नहीं किया जाना चाहिए. आपको सीमाओं से बाहर जाने की अनुमति नहीं है. इन अलिखित शर्तों का परिणाम यह होता है कि कई सवाल दायरे से बाहर हो जाते हैं. दूसरे शब्दों में, उत्तरदाता को पहले से ही उन सवालों के दायरे का पता होता है जो उसे मिलने वाले हैं. यह गंभीर पत्रकारिता के लिए हानिकारक है. लेकिन कुछ सवाल बिना किसी लाग-लपेट के सीधे पूछे जाने चाहिए. यदि हम किसी को ठेस पहुँचाने के डर से सच के इर्द-गिर्द दबे पाँव चलने के आदी हो चुके हैं, तो हम कभी भी सच तक नहीं पहुँच सकते.

इस पूरे प्रकरण ने न केवल मोदी और उनके तंत्र की कमज़ोरी को उजागर किया है, बल्कि एक बहुत गहरे सामाजिक संकट को भी सामने लाया है. हालांकि भारतीय परंपराओं के रक्षक हमारे आलोचनात्मक स्वभाव के प्रमाण के रूप में उपनिषदों का हवाला देंगे, लेकिन वास्तविकता हमें दूसरी कहानी बताती है. हम नहीं जानते कि सवाल कैसे पूछा जाता है. हमें सवाल पूछा जाना पसंद नहीं है. हम सवाल पूछने वाले की निंदा करेंगे. 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में से 157वें स्थान पर है.  यह न केवल राज्य (सरकार) के दमनकारी स्वभाव को दर्शाता है, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे के संकीर्ण स्वरूप को भी उजागर करता है.

(टी.एम. कृष्णा एक प्रमुख भारतीय संगीतकार और जाने-माने सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं.)

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