सुप्रिया शर्मा | क्या 2026 मोदी युग के अंत की शुरुआत है?

‘स्क्रोल’ में सुप्रिया शर्मा लिखती हैं कि 2026 में दिल्ली में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में बढ़ती भागीदारी और पुलिस कार्रवाई का सामना करने के बावजूद लोगों का सड़कों पर उतरना सरकार के खिलाफ बढ़ते असंतोष का संकेत माना जा सकता है. लेख में 2011 के उन आंदोलनों से तुलना की गई है, जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ राजनीतिक माहौल बनाने में भूमिका निभाई थी.

2011 में जंतर-मंतर पर अप्रैल से शुरू हुए प्रदर्शनों के बाद जून और अगस्त में रामलीला मैदान में बड़े आंदोलन हुए थे. 2026 में भी जून में युवाओं के जंतर-मंतर पहुंचने के कुछ ही समय बाद विरोध की दूसरी लहर दिखाई दे रही है. इस बार प्रदर्शन परीक्षा पत्रों में कथित गड़बड़ी और चुनावी व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर हो रहे हैं. लेख के अनुसार, इस साल गर्मियों में हुए प्रदर्शनों के बाद शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, जबकि अब प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं.

लेख में कहा गया है कि बड़े पैमाने पर लोगों का पुलिस हिरासत और मारपीट का जोखिम उठाकर प्रदर्शन में शामिल होना सत्ता के खिलाफ असंतोष का संकेत माना जाता है. लेखिका के अनुसार, मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार को अपने दूसरे कार्यकाल में ऐसी ही सत्ता-विरोधी भावना का सामना करना पड़ा था, जबकि नरेंद्र मोदी सरकार ने अब तक इसे अलग-अलग राजनीतिक और संस्थागत उपायों के जरिए संभाला है.

2026 में केंद्र सरकार को परीक्षा पत्र लीक, मजदूरी में ठहराव, इथेनॉल मिश्रण, यूपीआई शुल्क और एसआईआर जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक नाराजगी का सामना करना पड़ा है. ग्रामीण इलाकों में सूखे के कारण खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ने की बात भी लेख में कही गई है.

सुप्रिया शर्मा लिखती हैं कि जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम पर युवाओं तक पहुंचने और अपनी छवि को नए तरीके से पेश करने की कोशिश की, लेकिन विरोध की दूसरी लहर के बीच सरकार का रुख अलग दिखाई दिया. बुधवार को जब विपक्षी नेता दिल्ली में प्रदर्शन के लिए आगे बढ़ रहे थे, उसी समय प्रधानमंत्री अपने सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने और 2047 तक भारत के विकास की बात कर रहे थे.

लेख में मीडिया और संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाया गया है. लेखिका का आरोप है कि पिछले एक दशक में मीडिया पर सरकार का प्रभाव बढ़ा है और जांच एजेंसियों के इस्तेमाल तथा राजनीतिक दबाव ने स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका को कमजोर किया है. हालांकि, ये लेखिका के राजनीतिक विश्लेषण और आरोप हैं, किसी स्वतंत्र जांच या न्यायिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत तथ्य नहीं.

लेख के मुताबिक, संस्थागत टकराव के बावजूद सड़कों पर विरोध बढ़ रहा है. एसआईआर के जरिए मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर बदलाव और चुनाव आयोग की भूमिका इस असंतोष के प्रमुख कारणों में शामिल हैं.

अंत में लेख 2011 और 2026 के बीच समानताओं को रेखांकित करते हुए सवाल उठाता है कि क्या मौजूदा विरोध प्रदर्शन आगे भी बढ़ेंगे और क्या विपक्षी दल इस असंतोष को चुनावी समर्थन में बदल पाएंगे. हालांकि, लेख खुद भी मानता है कि 2011 और 2026 की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां पूरी तरह समान नहीं हैं. इसलिए 2026 को मोदी सरकार के राजनीतिक भविष्य का निर्णायक मोड़ मानना अभी एक विश्लेषणात्मक प्रश्न है, स्थापित तथ्य नहीं.

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