खून बहाए बिना राजनीतिक नरसंहार : एसआईआर को लेकर मतदाता सूची पर क्यों छिड़ी जंग
‘काउंटरकरंट्स’ में मोहम्मद जियाउल्लाह खान लिखते हैं एसआईआर यानी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर देशभर में राजनीतिक और कानूनी बहस तेज है. जिन राज्यों में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है या जारी है, वहां प्रारूप मतदाता सूचियों से करीब 13.3 करोड़ नाम हटाए गए हैं. इनमें 71 प्रतिशत से अधिक नाम ऐसे मतदाताओं के हैं जिन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित या अन्य श्रेणियों में दर्ज किया गया था. करीब 2.7 करोड़ नाम मृत मतदाताओं के और लगभग 1.01 करोड़ नाम एक से अधिक बार दर्ज प्रविष्टियों के रूप में चिह्नित किए गए.
हालांकि, प्रारूप सूची से नाम हटना स्थायी रूप से मतदान के अधिकार से वंचित होना नहीं है. सत्यापन, दावे-आपत्तियों, अपील और नए फॉर्म 6 के जरिए कई मतदाता अपना नाम दोबारा जुड़वा सकते हैं. फिर भी इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के कारण प्रक्रिया की पारदर्शिता और सार्वजनिक निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है.
राजनीतिक अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर ने आशंका जताई है कि एसआईआर पूरा होने तक कुल हटाए गए नाम 14 करोड़ तक पहुंच सकते हैं और इसे उन्होंने “खून बहाए बिना राजनीतिक नरसंहार” बताया है. हालांकि, यह एक राजनीतिक टिप्पणी है, किसी अदालत या स्वतंत्र आयोग का निष्कर्ष नहीं. असली सवाल यह है कि हटाए गए नामों में कितने वास्तविक मतदाता हैं और उन्हें दोबारा मतदाता सूची में शामिल कराना कितना आसान है.
आंकड़ों को संदर्भ में देखना जरूरी
अलग-अलग राज्यों के आंकड़े बताते हैं कि प्रारूप सूची में हटाए गए नाम और अंतिम सूची में वास्तव में हटे नामों के बीच बड़ा अंतर हो सकता है. उत्तर प्रदेश में प्रारंभिक प्रारूप में 2.89 करोड़ नाम हटाए गए थे, लेकिन दावों और सत्यापन के बाद अंतिम सूची में करीब 2.04 करोड़ नाम ही हटे. तमिलनाडु में 97.37 लाख नाम प्रारूप से हटाए गए, जिनमें से 27.53 लाख से अधिक पात्र मतदाताओं के नाम वापस जोड़े गए.
मध्य प्रदेश में 42.74 लाख नाम हटाए गए थे और सुनवाई के बाद 10.85 लाख से अधिक नाम बहाल किए गए. गुजरात में करीब 77.6 लाख अंतिम विलोपन के साथ 9.5 लाख नए मतदाता जुड़े, जबकि राजस्थान में लगभग 44.28 लाख नाम अंतिम सूची से कम हुए.
पश्चिम बंगाल में फरवरी की अंतिम सूची तक करीब 63.66 लाख नाम हटाए गए और 60.06 लाख मतदाताओं के मामले सुनवाई के लिए भेजे गए. बाद की न्यायिक कार्यवाही में 27.16 लाख लोगों को अपात्र घोषित किया गया, जिससे राज्य में एसआईआर से जुड़े कुल विलोपन करीब 90.82 लाख हो गए.
नागरिकता और सुप्रीम कोर्ट की सीमा
एसआईआर को लेकर नागरिकता सत्यापन का सवाल भी उठा है. मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम चुनाव आयोग मामले में कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण का अधिकार है. नागरिकता मतदान की पात्रता की आवश्यक शर्त है, लेकिन आयोग नागरिकता पर अंतिम कानूनी फैसला देने वाली संस्था नहीं है.
अदालत के अनुसार, जहां नागरिकता का अलग से निर्धारण जरूरी हो, वहां मामला नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी को भेजा जाना चाहिए और संबंधित व्यक्ति को उचित नोटिस तथा सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए. इसलिए मतदाता सूची से नाम हटना अपने आप किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से गैर-नागरिक घोषित करना नहीं है.
गलत तरीके से नाम हटने का खतरा
मृत मतदाताओं, दोहराई गई प्रविष्टियों और स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों के नाम हटाना मतदाता सूची को अद्यतन रखने के लिए जरूरी है. लेकिन भारत में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर, ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में जाने वाले लोग, विवाह के बाद पता बदलने वाली महिलाएं और ऐसे अनौपचारिक कामगार हैं जिनके पास दस्तावेजी रिकॉर्ड सीमित हो सकता है. ऐसे में अत्यधिक दस्तावेजी प्रक्रिया वास्तविक मतदाताओं के लिए बाधा बन सकती है.
पश्चिम बंगाल इसका उदाहरण है, जहां करीब 60 लाख मतदाताओं के मामले सुनवाई में गए और 27.16 लाख लोगों को अपात्र घोषित किया गया. इसके बाद 22 लाख से अधिक हटाए गए मतदाताओं ने अपना नाम बहाल कराने के लिए अपील की. इससे स्पष्ट होता है कि नाम हटाने की प्रक्रिया जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण अपील की व्यवस्था भी है.
पारदर्शिता से ही भरोसा कायम होगा
एसआईआर के दौरान प्रवासी, दिहाड़ी मजदूर, कम आय वाले परिवार और महिलाओं जैसे समूहों पर असमान प्रभाव की आशंकाएं भी सामने आई हैं. इन आशंकाओं का जवाब राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि विस्तृत आंकड़ों से दिया जाना चाहिए. चुनाव आयोग को राज्य और विधानसभा क्षेत्र के स्तर पर यह बताना चाहिए कि कितने नाम मृत, डुप्लीकेट, स्थानांतरित या अन्य कारणों से हटाए गए और कितने नाम बाद में बहाल हुए.
13.3 करोड़ प्रारूप विलोपन को न तो स्थायी मताधिकार से वंचित करने का प्रमाण माना जा सकता है और न ही केवल राजनीतिक नारे के रूप में खारिज किया जाना चाहिए. जरूरत ऐसी प्रक्रिया की है जिसमें हर विलोपन के पीछे स्पष्ट आधार हो, प्रभावित मतदाता को सुनवाई का अवसर मिले और नाम दोबारा जुड़वाने की प्रक्रिया सरल और समयबद्ध हो.
परकला प्रभाकर का “खून बहाए बिना राजनीतिक नरसंहार” वाला वर्णन राजनीतिक रूप से विवादित है, लेकिन इसके पीछे उठाया गया सवाल गंभीर है. लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है. यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि हर पात्र नागरिक को चुनाव में भाग लेने का वास्तविक और आसान अवसर मिले.

